कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
(७१)
श्वेत मिठाई कदली मेवा । अजर आरती हंसक मेवा ॥
सदा आरती हंस जो करई । अपने पुरुष चरणन रई ॥
असंख्यकमलश्वेत तहँ रहिया । सप्त पाखुरी कमल जो रहिया ॥
पुरुष गुप्त होइ रहे समाई । सूक्ष्म शीश तहां दरसाई ॥
संपुट पञ्च लाख है भाई । बानि उठै संपुट बिहराई ॥
उघरे संपुट दर्शन पावै । अजर हंस तहवाँ सन्तु पावै ॥
करत अनन्द सदा सुख भोगा । जरा मरण नहिं संशय सोगा ॥
जग मग जोति सदा उजियारा । कोटि सूर्यते वर्ण अपारा ॥
जहँ देखो तहँ शोभा छाजै । पूर्ण शोभा पुरुष विराजै ॥
कहा बखानौ पुरुष सरूपा । वरणि न जाइ वह रूप अनूपा ॥
जब लग तियापुरुष नहिं परसै । कहा बखाने सुख बिनु तरसै ॥
तिया पुरुष जब मिलिया भाई । तब सुख कछू कही न जाई ॥
जिन जाना तिनही पहिचाना । जैसे गूंगा सपना जाना ॥
कहा बखानौ वरणि न जाई । गूंगा गूंगे सैन लखाई ॥
ऐसा सतगुरु भेद लखावै । सुरतिवंत हंसा सन्तुपावै ॥
वाहू नदी अठारह गंडा । जेते तारा है ब्रह्मंडा ॥
एते सूर्य जो वसै अकाशा । तऊ न पुरुषके सम परकाशा ॥
पटतर तहां पुरुषकी दीजै । सतगुरु सैन समुझिकै लीजै ॥
छन्द-पुरुष शोभा कह बखानो कछु नहीं सम तूल हो ।
असंख्य सूर्य प्रकाशते वहँ जोति अगम स्थूल हो ॥
सैन करि करि नैन भरि भरि शब्द सतगुरु पर्व हो ।
पुरुष अवर न रूप जाको शोभा हंस लग दर्श हो ॥
सोरठा-उग्रगीत यह सार, गुप्त अध्याय उन्नीसमें ।
शब्द सुरति आधार, हंसा पहुँचे लोकको ॥
इति श्रीमदुग्रगीतायां एकौनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥