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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1208

( ६८ )

बोधसागर

अथ उपसंहार

धर्मदास उचाव

धर्मदास विनवै कर जोरी । तुम दयालु बंदी मोरि छोरी ॥
गीता जो तुम कही बखानी । पांडवकी गति सब मैं जानी ॥
ऐसे सब जीव भरमाई । कैसेहु भांति मुक्ति नहिं थाई ॥
सोइ ज्ञान मोहिकहि समुझावौ । जरा मरण को बीज नसावौ ॥

कबीर उचाव

सुनु धर्मदास हंस पतिराया । हंसन कारण पुरुष की दया ॥
अंकुरी जिव आपु बोलाया । ताते हम कह लेन पठाया ॥
सत्य शब्द अब करौ प्रकाशा । पावै हंसा लोक निवासा ॥
उग्र ज्ञान है मता निनारा । सुक्ष्म वेद जो पुरुष संचारा ॥
पुरुष दया आनेउ संसारा । जेहिते पावै मुक्ति दुवारा ॥
अध्याय उनइस कहौं ये भाई । सुर नर मुनि जाने नहिं ताई ॥
मुक्त होइ सत्यलोकहि जावै । आदि पुरुषके दर्शन पावै ॥
प्रथमै रहनी हंस बखानो । निशि दिन रहै नाम लपटानो ॥
तीनों गुण है विषके मूला । ताते दुख सुख भये स्थूला ॥
दुइ गुण कबहीं चित नहिं धारै । रज तमको परंपच विसारै ॥
वासा करै सत्यके माहीं । आसा ताकी राखै नाहीं ॥
प्रकृति पचीस पंच तत्त्व रहई । तीनिउ गुण कारण यह वहई ॥
जो तीनिउ गुण वश करै आपै । पंच पचीस कोइ नहिं व्यापै ॥
तीनिउ गुणते न्यारा खेले । मनुआ सत्य सुमिरनमें मेले ॥
श्वास मुर्ति एक डोरी लावै । अजर अमर होइ हंस मिलावै ॥
मन पवना ले सुख मनि राखै । सोहं हंस अमीरस चाखै ॥
तहवां अनहद होइ झनकारा । विन दीपक मंदिर उजियारा ॥
अनहद सुने अकह गुप्त गावै । मन चित गहि २ सुरति लगावै ॥
तहवां रैन दिवस नहिं होई । पुरुष २ सो सुरति समोई ॥