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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1203

उग्रगीता

( ६३ )

पावै अगम कृष्ण को मानै । तीनि लोकको भूपति जानै ॥
ताते ज्ञान कहि कर्म दृढ़ावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहैं सुनो गोसाई । मारग साधु जो अगम सुनाई ॥
कर्म धर्म कह पाछे मेलै । ज्ञान रूप अभ्यन्तर खेलै ॥
परम अनंद पुरुषको दर्शै । सेवक स्वामी चरण न पशैं ॥
गीता कहै औ कर्म दृढ़ावै । केहि कारण इनको भटकावै ॥
कौन ज्ञान जो भर्म बतावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥

कवीर उवाच

धर्मदास मैं कहौ बुझाई । मूरुख लोग नहीं पतिआई ॥
तीनिउ लोक पुरुषपहि दीन्ह। राजे काज करावन कीन्ह। ॥
जो चाहै सो रचे बनावै । तीनि लोकते जान न पावै ॥
ज्ञानोपदेश देह जो भाई । तौ यह सृष्टि वैराग उठाई ॥
तब यह रचना सबही थाके । इनको कौन गोसाईया थापे ॥
तेहि कारण इन कर्म दृढ़ाई । अरुझी सृष्टि सकल भर्माई ॥
सतगुरु शब्द सुना कहैं दरसै । जाते प्रभु पूरण कहैं परसे ॥
गीता कहि जो कृष्ण सुनाई । तबहु न अंधा मोहि पतिआई ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु मैं तव बलिहारी ॥
जब कर अर्जुन धनुष संभारा । कहा कीन्ह सो कहौ विचारा ॥

कवीर उवाच

सुनो संत धर्मनि निर्वाना । अंत युद्ध सब करों बखाना ॥
बहुते भांति युद्ध तिन कीन्ह। युद्ध जीति राजहि मन दीन्ह। ॥
राज युधिष्ठिर मनहि विचारा । बहुते भांति बंधु हम मारा ॥
कस प्रायश्चित्त मोक्षण होई । कहो व्यास हमसों तुम सोई ॥