कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अध्याय अठारह कहा बखानी । योग सन्यास नाम तेहि जानी॥
अर्जुन गीता भयो समापति । जो कछु कही आपुकमलापति॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुन धर्मनि हीता । तुम्हरे लिये बखानेउँ गीता ॥
तुम तौ भक्त जत्तते न्यारा । आवागमनके बीज तुम्हारा ॥
अब तुम परम भक्ति चितलावौ । निशिदिनसतगुरुशब्द समावौ ॥
धर्मदास बिनती इठि लाई । सुनि गीता संशय उपजाई ॥
गीता कही कृष्ण केहि कारण । अर्जुन उठे कुटुम्ब संचारण ॥
ज्ञान सुने मति निर्मल होई । मित्र औ दुष्ट एक सम होई ॥
ज्ञान सुने कछु कोध न आवै । परम पुरुषते मन चितलावै ॥
गीता कृष्ण जो कहेउ बखाना । ज्ञान सुनाइ कोध मन आना ॥
कोधविना सो युद्ध न होई । नर्क द्वार कृष्ण कहेउ सोई ॥
कोध किये अज्ञान कहावै । यह सब भेद मोहि समुझावै ॥
कृष्णमता कहि प्रकट देखाऊ । ज्ञान सुने अज्ञान न आऊ ॥
कबीर उवाच
सुनि धर्मनि यह भेद है बंका । जानत नहीं राउ औ रंका ॥
कृष्ण ठगौरी जत्त लगाई । ताते भेद न बूझौ भाई ॥
यह प्रपंच कृष्णकर आही । तीनिहु लोक सदा भर्माई ॥
चाहै छल बल युद्ध करावै । अर्जुन कैसे धनुष उठावै ॥
महामोह तेहि रहा समाई । और भांति नहि मानै भाई ॥
छलहि मता किन्हौ आपै सोई । ज्ञान सुनाइ मोह कह खोई ॥
यह तौ ज्ञान कहो परमारथ । जेहिते युद्ध होइ पुनि स्वारथ ॥
जैसी इच्छा करै जो ज्ञाना । फल पावै सेवा अनुमाना ॥
नहिं अर्जुन मनपुरुष मिलापा । कैसे कर्म होइ निष्पापा ॥
पुरुष मिलाय न कृष्ण सुनावै । कैसे अगम अगोचर पावै ॥