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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1204

( ६४ )

बोधसागर

व्यास कृष्ण मिलि मत अर्थाई । कुल हत्या कैसे मुक्ताई ॥
करो विचार अश्वमेध जो करई । यज्ञ करत हत्या परिहरई ॥
सब मिलि ऐसा मता विचारा । बहुत भांति यज्ञ करौ संभारा ॥
ताते पाप मोक्ष होइ भाई । यज्ञ करनको मता हटाई ॥
करौ यज्ञ मन भयो विश्रामा । राज मनोरथ पूर्ण कामा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनवै कर जोरी । संशय उपजी मेटेउ मोरी ॥
पांडव कृष्णहि बहुत पियारे । किया यज्ञ तब कहाँ सिधारे ॥
कैसे गति मति उन पुनि पाई । कृष्ण सरीखो रहै समाई ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम चतुर सुजाना । पूछेउ सो अब करौ बखाना ॥
कृष्ण देह जब छांडन लागे । तिनसों कहो ताहिंते आगे ॥
अवधि हमारि आय नियराई । तुम हूँ गरो हेवारे जाई ॥
अर्जुन कहहु सुनौ गोसाई । कारण कवन हेवारे जाई ॥
कृष्ण कही तब ऐसी बाता । तुम तौ बंधु कीन्ह है घाता ॥
पातक बहुत जो तुमसे भयऊ । गरै हेवारे ताते कहेऊ ॥
कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराना । मारण बंधु न हम चित आना ॥
गीता ज्ञान मोहि समुझाया । युद्ध करनको अस्त्र बँधाया ॥
तुमको पातक नाहीं लागे । कर्ता करै आपु अनुरागे ॥
तुम्हरे कहे युद्ध हम कीन्हा । पातक हम शिर काहे दीन्हा ॥
पुनि तुम कह अश्वमेधहि करहू । सब पातक पाछिल परिहरहू ॥
तापर हम अश्वमेध जो कीन्हा । तबहू पातक हम शिर दीन्हा ॥
कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु भाई । कर्म रेख मेटो नहिं जाई ॥
कर्म रेखते सब जग आवै । बार बार दुख सुख भुक्तावै ॥
चारिउ युग फिरि याहै आई । हम तुम ऐसे संग रहाई ॥