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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1154

१४)

बांधसागर

यह पिपील मत कहिये भाई । हरे हरे वह मार्ग जाई ॥
तेहि मार्ग कोइ विघ्न न लागै । कमहि कम धर्म तब जागै ॥
स्वर्गवास पावै सो प्राणी । कबहीं ताको होय न हानी ॥
तासों मैं बहु प्रीति जनावौं । संशय दुख सब दूरि बहावौं ॥
धनसम्पति सुख बहु विधि देऊँ । आपन करि मैं ता कह लेऊँ ॥
ताते प्रवृति अधिक फल भाई । लोकाचार समीप बताई ॥
तुम क्षत्री रणपति हो आगर । गहो धनुष तुम जक्त उजागर ॥
ऐसो कहो जब कृष्ण सुजाना । अर्जुन पुनि पूछो भगवाना ॥
कैसे कर्म लिप्त नहिं होई । कर्म धर्म तुम थापेउ सोई ॥
कहै कृष्ण अर्जुन सुन लीजै । सेवा सुमिरण मैं चित दीजै ॥
करि करि कर्म मोहि सब अपै । कबहुँ न पाप दोष सो डपै ॥
ताके शिर नहिं लागै भारा । सत्य भाव मो ऐसे विचारा ॥
पांच हत्या नित गेही करई । अंध भावते गेही फिरई ॥
नित नित हत्या शिर पर लेही । बांचे जन कोइ परम सनेही ॥
कहै अर्जुन यह हत्या कैसी । गेहीको तिन लागै सौसी ॥
सो तो वनिकै मोहि सुनावौं । दुविधा भावसो मोहि मिटावौं ॥
कहै कृष्ण अर्जुन सुनु वैना । हत्या पंच निरखि कै लेना ॥
प्रथम हत्या जो पीसेपिसाना । दूसर कुट्टे आनि जो धाना ॥
तिसरै बढ़नी जो घर देई । चौथे कलशा भरै जो कोई ॥
पंचये रसोई चूलहा वारै । हत्या पांच जीवहुँ मारै ॥
कहै अर्जुन यहि विनु को रहई । यह पातक कैसे परिहरई ॥
यह पातक जो देह सनेही । कैसे उधरनी इनसो लेही ॥
सुनु अर्जुन जिव कर्म न लगै । नित नित करि प्रभु चरणन पागै ॥
जो कछु करै सो प्रभुके कारण । ताहक दोष न कछु विचारण ॥
करै रसोई प्रभुके नामा । पुनि अपै जल लै सब सामा ॥