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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1153

उग्रगीता

( १३ )

अथ तृतीयोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन पूछे सुनु भगवाना । निर्मल ज्ञान सुनावो काना ॥
तुम तो कहौ कि युद्ध मचावौ । सब पलको तुम मारि गिरावौ॥
ज्ञान कही कहि मोहि समझावौ । फिरि कुलधर्म मोहि बतलावौ॥
जेहि ते मोर अकाज न होई । मोहि ज्ञान प्रभु दीजै सोई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु अर्जुन बीरा । तुम तौ क्षत्रिय हो रणधीरा ॥
मारग दोइ ज्ञान हैं भाई । ताते तेहि कहौ समुझाई ॥
निवृत्ति मारग आहि निरासा । सदा ब्रह्ममें रहैं निवासा ॥
तत्त्व प्रकृति लित नहीं होई । सदा रहै निलेपी सोई ॥
नाम विना कछु बात न बोले । मन वच क्रम अंतरपट खोले ॥
निष्कर्मो निर्मल निर्माही । नहिं इच्छा मननाम समोई ॥
जगमें रहै कमल सम भाऊ । ऐसे लित होइ नहिं काऊ ॥
दान पुण्य जो यह कछु करई । ताकर फल मनमें नहिं धरई ॥
दाता भुक्ता प्रभु कह जानै । कर्म धर्म कछु मनहिं न आनै ॥
मारग निवृत्ति साखि जो अहई । महाकठिन मारग तेहि कहई ॥
कठिन विहंगम मारग होई । पहुँचै कोटिन्ह महाँ पुनि कोई ॥
तेहि मारग कोइ चलने न पावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥
पूरण सिद्ध हुवा नहिं जाई । ताते तोहि प्रवृत्ति दृढाई ॥
कुलके कर्म सदा चित धारै । कबहु न छोड़ै लोकाचारै ॥
दान पुण्य जप तप व्रत करई । संध्या तर्पण मन चित धरई ॥
नियम धर्म औ करै जो स्नाना । सवा सुमिरन धारै ध्याना ॥
उद्यम अपने कुलको करई । यह मारग जौ लागा रहई ॥
सो तो कर्मके कश्मल धावै । धीरा तन मन मैल जो खोवै ॥