कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( १५ )
अंत कार काहैं परसादा । दीन दुखित जो पोषै सादा ॥
ता पाछे ब्रसाद जो पावै । ताको हत्या निकट न आवै ॥
ऐसे कारज प्रभु सनमानै । ताहि दोष नहि वेद बखानै ॥
त्रै अध्याय तोहि सन कहेऊं । कर्म योग परकट कै सहेऊं ॥
कहै कबीर सुनु धर्मसुनि आगर । सत्य सुकृतको ज्ञान उजागर ॥
यह तौ कर्म ज्ञान दृढ़ावै । फल भोगै फिरि योनिहि आवै ॥
निवृति कहै त्रिवृति ले आवै । फिरि फिरि लेके कर्म दृढ़ावै ॥
ताते मैं संसारहि आवा । सत्य शब्द कहि बहु गोहरावा ॥
बूझेगा कोइ सन्त विवेकी । ज्ञान दृष्टि ते सब कछु छेकी ॥
हम तौ तीनि लोकते न्यारा । जो बूझैं सो हंस हमारा ॥
यह रीझै तौ स्वर्ग देह वासा । कर्म भोगि मृतुलोक निवासा ॥
छन्द-धर्मदास मैं कहौं तोसौं सार शब्द जो भेद है ।
हंस मन बच गहैं ताकु पालक ना विछुरार है ॥
विश्वास देखो प्रीति करि मैं निकट प्रकटो तासुको ।
यम फंद शंसा भटी चौथो लोक देख निवासको ॥
सोरठा-अगम भेद है सार, भेद कोइ नहीं पावई ।
उत्तरे भव जल पार, शब्द गहै विश्वास कै ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
कर्मयोगारूढ्यानां नाम तृतीयोऽध्यायः
अथ चतुर्थोऽध्यायः
श्री कृष्ण उचाव
अर्जुन सो अस कहेउ भगवाना । अगम भेद बतावै ज्ञाना ॥
यह गीता काहू नहिं पाई । सो मैं तोसों वाक्य सुनाई ॥
प्रथम मैं गीता सूर्य सुनावा । उन वैवस्वत पुत्र पढ़ावा ॥