कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
तीन लोकका राज जो देई । हत्या बंधु तबहु नहिं होई ॥
जो तुम कहो उन अवगुन कीन्हा । छवहु प्रकार भारऊ लीन्हा ॥
तिन्द प्रकारन मारा चाही । तौ यह मोहि दोष नहिं आही ॥
छौमें एक प्रकार जो होई । ताके मारे दोष न सोई ॥
धर्मदास उवाच
तब धर्मदास विनय अनुसारी । छौ प्रकार कवन कह भारी ॥
तेहि प्रकारन मारा चहिये । सो सब स्वामी मोसे कहिये ॥
कवीर उवाच
देखो हत्या को अब बरना । बहु संग्राम किये का सैना ॥
प्रथमें अग्नि देई घर कोई । मारत तासु दोष नहिं होई ॥
दूजे औरको जहर खवावै । हने ताहि कछु दोष न पावै ॥
तिसरे छत्र जो लेई छुड़ाई । राज काजमें पाप न भाई ॥
चौथे नारि पराई लेही । मारे ताहि पाप नहिं तेही ॥
पंचये धन चोरावन आवै । तेहि मारे कछु दोष न आवै ॥
छठये शस्त्र लै मारन धावै । मारे ताहि विलम्ब न लावै ॥
यह अपराध मारिये जोई । मारत हत्या कबहु न होई ॥
अर्जुन उवाच
छ अपराध हमहिंकू लागै । तऊ न हतों कर्म सब त्यागै ॥
मोसों यह अपराध न होई । जो मोकहैं इहि मारि विगोई ॥
अर्जुन धनुष बान गहि डारा । सबका अपने बंधु बिचारा ॥
सब कह कुल परिवार निहारा । उपजो मोह अस्त्र गहि डारा ॥
मुनहु सन्त अर्जुनको विखादा । इह लगि कीन्हो वाद विवादा ॥
अर्जुन मोह सम्पूर्ण भयऊ । कृष्ण अपन मनमत जो ठयऊ ॥
कीजै छल यक मता विचारा । अर्जुन बुद्धि हतौ यहि वारा ॥
ब्रह्मज्ञानते यहि समुझावउ । काल रूप अपने देखलावउ ॥
तब यह मानै कहा हमारा । मारौ फोरि सकल परिवारा ॥