कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ७ )
सो मैं तुमसन कथा सुनावों । तत्त्व भेदका मता बुझावों ॥
शास्त्र वेद पुराणन माँहीं । गीता मता तत्त्व जो आहीं ॥
तत्त्व मता जो कृष्ण सुनाया । सद्वर तो कछु अगम बताया ॥
तत्त्व निरतत्त्व दो होते न्यारा । धर्मदास तुम करहु विचारा ॥
जो संशय गीताके होही । सो अब सकल सुनावों तोही ॥
गीताका अब गम्य बतावों । सार शब्दका भेद सुनावों ॥
जहाँ देखौ तहाँ आप निवासा । सबते न्यारा सबमें बासा ॥
समै-तत्त्व मता है गीता, वेद पुराणमें सार ।
ताते अगम अपार है, पूरण शब्द हमार ॥
अथ श्रीभगवद्गीताप्रथमोऽध्यायप्रारम्भः
कवीर उवाच
अब गीता मैं कहौ बखानी । कृष्ण कहा सो अर्जुन मानी ॥
ताते न्यारा शब्द बतावों । तत्त्व माँहि निहतत्त्व लखावों ॥
जब यह सृष्टि भई महि भारा । तेहि मारण हरि मता विचारा ॥
बंधु विरोध कियो हरि जबहीं । कौरों पाण्डु जुरे दल तबहीं ॥
अर्जुन रथ चढ़ि आये तहवां । दोउ दल युद्ध रचो है जहवां ॥
कृष्ण सारथी रथ जब हांका । तासों अर्जुन ऐसो भाषा ॥
अर्जुन उवाच
दोऊ दलमें लै रथ राखों । दूनों देखौ अपनी आँखों ॥
सुनिकै कृष्ण ऐसे ही कीन्हा । दोउ दल बिच रथ राखै लीन्हा ॥
रथ जब दोऊ दलमें राख्यो । भयो मोह अर्जुन अस भाख्यो ॥
ये सब बन्धु हमारे आही । हे प्रभु मैं मारौं कहु काही ॥
भाई चचा भतीजा सारा । कैसे मारौं कुल परिवारा ॥
जहाँ लग देखों दोऊ सेना । आपन कुल मारौं केहि लेना ॥
विधवा होय है सकला नारी । ऐसो दोष लेत को भारी ॥
राज पाट मैं कछू न चाहों । सुखसम्मति कुलधर्म निबाहों ॥