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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1149

उग्रगीता

( ९ )

कबीर उवाच

धर्मदास यह काल सुभावा । जाके जपन सृष्टि मन लावा ॥
सुर नर मुनि सब छलि २ मारा । कोई न छूटो यह संसारा ॥
ताते सतगुरु शब्द पुकारा । चीन्हो तत्त्व भेद टकसारा ॥
मूरख सत्य शब्द नहि जाने । झूठहि झूठ सदा सुख मानै ॥
परपंजी यह जग को रचना । बिन सतगुरु कोई नाहीं बचना ॥
छन्द-यहि भांतिकै हरि युद्ध ठानो भाव कोई ना लहै ।
सकल बंधु विरोध करिकै तासु को मारन चहै ॥
ज्ञान औ अज्ञान करि भरमाइ डारो चित्तको ।
तबहु मूरख नहीं बूझै देख फंदि उस बरतको ॥
सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, शब्द एक संसार है ॥
हंस होइ निरवान, मन बच कै निश्चय गहै ॥

इति श्रीउग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमतकबीरधर्मदाससंवादे

अर्जुनविषादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ।

अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

कृष्ण जो मन में मता विचारा । अर्जुन सो पुनि बचन उचारा ॥
तुम काहे मोहै गहि लीन्हा । केहि कारण तुम होहु अधीना ॥
क्षत्री धर्म लाज बढि होई । तुम कह दोष न लैहै कोई ॥
जो तुम जानु सदा ये जीहैं । येई तौ जन्म फेरि फेरि लेहैं ॥
अमर तुमहु मैं नाहीं कोई । फिरि २ आवागवन समाई ॥
मैं हूँ अमर नहीं हौं भाई । हम तुम यहिविधि फिरि २ आई ॥
जब २ पाप प्रगट मोहि होई । धरि अवतार करौं क्षय सोई ॥
जब २ द्रापर आवै भाई । हमतुम यहि विधि फिरि २ आई ॥
कौरव पाण्डव फिरि २ लडि हैं । आपहि आपु मारि कै मरिहैं ॥