कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २०१ )
सारखी-जिन जाना निज प्रेम कहैं, सोईं जन परवान ।
तासों कहिये सूरमा, कहैं कबीर बखान ॥
चौपाई
केवल ज्ञान पाय है सोईं । जिहि पर कृपा गुरुकी होई ॥
केवल ज्ञान प्रगट समझाऊँ । भिन्न २ कर तोहि लखाऊँ ॥
प्रथमहि सुनो ज्ञान कर भेदा । निर्माही होय हंस अछेदा ॥
सुर्तवंत अक्षर पहिचाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥
सुखदाई सबही कहैं भावै । बाल रूप होय अग्नि बुझावै ॥
समदृष्टी एकहि कर जानै । भला बुरा कछु मन नहिं आनै ॥
हृदय पुनीत शुद्ध मन होई । पाखण्ड भर्म डार सब खोई ॥
ब्रह्म वियोग सदा अनुरागी । दसहूँ दिशा झूठ तिन त्यागी ॥
झूठ सकल जग देखौ जानी । जैसे अहै बुदबुदा पानी ॥
अस मति जाकर होय सुहाई । केवल ज्ञान ताहि समुझाई ॥
माया बिना मोह नहिं आवै । नाम पदारथ निश्चय ध्यावै ॥
यह विधि केवल ज्ञान कहावै । जो सुमिरत सतलोक सिधावै ॥
केवल काम निःअक्षर आई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥
निःअक्षर तो करै नवेरा । कहैं कबीर सोईं जन मेरा ॥
अमर मूल मैं बरन सुनाई । जिहिते हंसा लोक सिधाई ॥
शब्द भेद जाने जो कोई । सार शब्द मैं रहै समोई ॥
शब्द ज्ञानका लख जिन पाया । समदृष्टि सब माहिं समाया ॥
जेतक जीव देह धर आए । शब्दहिं सों ते सकल उपाए ॥
शब्द अखण्डा और सब खंडा । सार शब्द गरजे ब्रह्मंडा ॥
निःअक्षर की परिचय पावै । सत् लोक महाँ जाय समावै ॥
धर्मदास उवाच-छन्द
बिन्ती करै कर जोर धर्मन, सुनहु सत गुरु सार हो ।
सत्तलोक है कौन शोभा, तहाँ कौन व्योहार हो ॥