कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अमरमूल
कवन रूप जो पुरुष रहहीं, कवन सुख हँसा करै ।
कामिनी किहि रूप राजै, तहाँ सुख विस्तार हो ॥
सोरठा-सो मोहे प्रगट सुनाव, दया करौ निज दास कहैं ।
बार बार बलि जाँव, अब जिन मोहि छिपावहु ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनहु धर्मदासू । सतलोक को कहों प्रकासू ॥
है सतलोकहि अम्बर काया । एक रूप सबही त्रय माया ॥
षोडश भान हंस की कांती । अमर चीर पहिरे बहु भांती ॥
शोभा पुरुष कही नहिं जाई । कोटिन रवि इक रोम लजाई ॥
अमर लोक अमर है काया । अमर पुरुष जहां आप रहाया ॥
अमर पुरुष का पावै भेदा । कहै कबीर सों हंस अछेदा ॥
सतलोक सत शब्द पसारा । सत् नाम है हंस अधारा ॥
अमृत फल के भोजन करहीं । युगन २ की क्षुभ्या हरहीं ॥
पीवत सुधा भर्म मिट जाई । जन्म २ की तृषा बुझाई ॥
कामिनी रूप वरन उजियारा । चार भान की ज्योति पसारी ॥
शोभा बहुतक प्राण पियारी । प्रेम भाव सब हंस निहारी ॥
अनहित वचन बोल नहिं बानी । प्रेम भाव अमृत रसरानी ॥
शोभा बहुत जहां मन भावन । हंस कामिनी रंग बढावन ॥
अमृत नाम हृदयमें लावे । प्रेम भाव पुरुषहि मन भावे ॥
आशा बस मन कोऊ नाहीं । भयो प्रकाश शब्दके माहीं ॥
बूझे संत ज्ञानी जो होई । सतगुरु शब्द हृदय समाई ॥
है निहशब्द शब्द सौ कहेऊ । ज्ञानी सोई जो वह पद लहेऊ ॥
धर्मदास मैं तोहि सुझावा । सार शब्दका भेद बतावा ॥
सार शब्द का पावै भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥