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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1068

( २०० )

अमरमूल

तुम सतगुरु घर बैठे तारा । आवागमन मोरे निर्बारा ॥
मन अरु जीव भेद बतलाओ । अबजिनमोसन अन्तर लाओ ॥
समझो तबै जीव मुक्ताऊँ । वही डोर गहलोक पठाऊँ ॥

सद्गुरु वचन

पावन पचासी सकल पसारा । जीव पवनसों आहि निसारा ॥
ब्रह्म रूप सब माँहिँ समार्ई । सूक्ष्म रूप जीव दरसारई ॥
दसवां भाग राई कर जाना । आतम रूपी देह समाना ॥
अरु योगिनमें बरते भाऊ । मानस देहमें मुक्ति प्रभाऊ ॥
पांच तत्त्व दस इन्द्री संग । प्रकृति पचीस कहेउ प्रसंगा ॥
यह प्रमान मन करे बखाना । जीव ब्रह्मसों भये उत्पाना ॥
मन करता यह देह समाना । सूक्ष्म रूप नाहिँ पहिचाना ॥
अंक चीन्ह स्थिर होये सोई । ताकी आवागमन न होई ॥
ताकौ बरन भेद जब पावे । मुक्ति होय जग बहुरि न आवे ॥
चौरासी कब बन्धन छूटे । काल जंजाल ताहि नहिँ लूटे ॥
मुक्ति भेद कोइ बिरले जाना । काल फांस जग सब लपटाना ॥
अमर मूल है मुक्ति पसारा । ताकौ संतो करौ विचारा ॥
आतम ब्रह्म एक है भाई । परमातम मिल ब्रह्म कहाई ॥
ज्यों जलमधि सों लहरि उगाई । तिमि परमातम आतम आई ॥
जिमि किसान चिनगी संचारा । इमि जिव भयउ ब्रह्म विस्तारा ॥
जिमि कंचन आभूषण कीन्हा । ऐसे जीव ब्रह्म कहँ चीन्हा ॥
उमैं अंश दीपक इक फूटै । जीव ब्रह्म संग न छूटै ॥
जिमिरविज्योतिकिरणपरकाशा । ऐसे ब्रह्म कर मोहिँ जिवबासा ॥
यहि विधि ब्रह्म जीवहिँ गाई । समझे तबही एक होजाई ॥
शिव शक्ती एकहिँ मतकीन्हा । तारक भेदको बिरले चीन्हा ॥
जे जाना ते मुक्ति समाना । प्रेम भाव सद्गुरु पहिचाना ॥