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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १४४ )

कबीरबानी

चौपाई-गुरुवाईको जुगति-सदगुरु कहै ।

सुनो धर्मदास कहों मैं बानी । बात हमारी तुम निश्चय मानी ॥
वचन वंश नहीं लगै भारा । लेखा देखि चले कडिहारा ॥
बिन लेखा गुरुवाई करहीं । आसाबन्ध कालमुख परहीं ॥

चौथा बिसथारकी जुगति

प्रथम लेखा जब चौका पोतावै । तब निकुत मंत्र ले नीर मँगावै ॥
दुसरे चौका पूरौ भाई । काया मूलको मन्त्र जगाई ॥
तिसरे आसन करौ विस्तारा । पुरुष शब्द निज करौ पुकारा ॥
चौथे कलश ले आगे राखौ । पंचतत्वको मन्त्र मुख भाखौ ॥
पाँचमो नारियर स्नान करावौ । सोहं शब्द ले भद्र करावौ ॥
छठवें स्वेत मिठाई आनौ । मानसरोवर मन्त्र बखानौ ॥
सातवें उत्तम पान मँगावो । पक्ष पालना मन्त्र गोहरावो ॥
आठवें दलकी जुगति सुधारी । दयाशब्द धोखौ अधिकारी ॥

सारखी-अरु कपूर लौंग इलायची, दल निरनेकी जुगति ।

विधि विल छानि केन्द्रहुँ, दीन्हा गुरु जिव मुक्ति ॥

चौपाई

नौमे नया वस्त्र ले आवो । अमर चीरको मन्त्र जपावो ॥
दसवें सोरा सुपारी धरहु । पाताल अंशको मन्त्र उचारहु ॥
ग्यारवें पाँच बरतन आनौ । आदि नामको मन्त्र-बखानौ ॥
बारहें आनि धरो परवाना । संधिकमन्त्र कहो परवाना ॥
तेरहें चँदवा छत्र बनाया । समरथ मन्त्र छत्रपति आया ॥
चौदहें आरति आनि बनाई । सोहँग मन्त्र निर्णय गोहराई ॥
पंद्रहें तिनका अर्पण कीन्हा । चौदा यमका मन्त्र तब चीन्हा ॥
सोरहें षोडश मन्त्र प्रवाना । कदली दल तहाँ उत्तम आना ॥
सत्रह सतगुरु करे निशानी । सो नरियर मों डारो पानी ॥