कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन उमापति ईशा । नरतन त्रिगुण पांच पचीसा ॥
चार खान महैं नर तन ईशा । सकल भेद जानहु जगदीशा ॥
नरपिंडज चौरासी नारा । नाम भक्त बिन यमके चारा ॥
पिंडज गौ गज चौपग पहिषा । अरना बाध सिंह बनगोहिषा ॥
श्वान मंजार अजिया सुत बीगा । पृथ्वी आप वाय तेज अंगा ॥
त्रिगुण भेराय सकल जिव दीन्हा । सतगुण रज तम भासे चीन्हा ॥
रजगुण बहु छल झूद परबंदा । रोग वियोग भोग यमदंडा ॥
मिथ्या बोल सोग संतापा । छुतहिँ छूत जिव छूतहिँ थापा ॥
वैष्णवसे नहिं नवीहिं अभागे । वैष्णवन असंखहिं द्विज नागे ॥
तिनहु भागह बड वैष्णो बखाना । जीव दया कथि जग पतिथाना ॥
बहुर युद्ध महाभारथ करावा । तब करता हरि धका दियावा ॥
कृष्ण सीस जब वसे कबीरा । तबलग्ण राम कृष्ण मत धीरा ॥
निरंजन अधा परवेसा । तब से कृष्ण कालकर भेसा ॥
दोहा—जबलग्ण जाकर नाम लिख्य, तब लहि तेह यह सोय
कहैं कबीर मोहिं सुमेर, एकमत सब सुख लोय ॥
पांच तीनकी काया कांची । अमरपुरी अमर तन सांची ॥
सतगुण सत्यकबीरके आसा । निरंजन अवा रज तम फांसा ॥
जैसे तुलसी भांमे राई । औ गुर राम तुलसी सार लाई ॥
रज तम गुंभा भांग बखाना । भांग महादेव अज गुमा जाना ॥
तुलसी विष्णु अंस विनाशी । औ अविनाशी कबीर सुखराशी ॥
दोहा—कहैं महादेव विष्णु अज, सुन सतनाम कबीर।
निराकार डहनसे, राख लेहु गुरु पीर ॥