काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( ८० )
द्वितीय पक्ष
यह सत्य है कि भीष्म निर्वाण से सम्बन्धित 'मास मात्रं' 'पञ्चाशतं षट्'
'पञ्चाशत्' और 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः' इन चारों का निर्विरोध सामञ्जस्य बिठाने
के लिए चारों का ही गौणार्थ स्वीकार करना होगा । नहीं तो पौषकृष्ण तृतीया
को भीष्मपतन मानकर माघी तक भीष्म जी के अट्ठावन दिन भी पूर्ण होंगे
और तीस दिन उसी के अन्तर्गत गंगा तट पर पाण्डवों के यद्यपि पूर्ण हो जायेंगे,
परन्तु इस तरह दो वचनों को यथार्थ स्वीकार करने पर 'पञ्चाशतं षट् च'
और 'पञ्चाशत्' ये दो वचन पूर्ण रूप से उपेक्षित रह जायेंगे । परन्तु ऐसा अभीष्ट
नहीं, अतः चारों का गौणार्थ यद्यपि पूर्व रीति से सुन्दर ढंग से घटित होता है,
फिर भी इस सम्बन्ध में यह विचार करना आवश्यक है कि श्रीगीता जयन्ती
की प्रसिद्ध तिथि यद्यपि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी है, परन्तु उसकी प्रसिद्धि
अर्वाचीन सिद्ध होती है, जब कि माघ शुक्लाष्टमी भीष्माष्टमी के रूप में
उसकी अपेक्षा प्राचीन काल से प्रसिद्ध है । 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः'
का अन्वय करते समम श्रीनीलकण्ठाचार्य ने भी इसे स्वीकार किया है । अतः
इसके अनुगुण ही शेष वचनों के समन्वय का सामञ्जस्य बिठाना आवश्यक है,
इसी दृष्टि से यह द्वितीय गणना है—
माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर ।
त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥
( अनुशा० १६७।२८ )
इस श्लोक में यद्यपि 'पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति' के साथ 'त्रिभागशेषः'
पठित है । इस दृष्टि से माघ शुक्ल दशमी की सिद्धि होती है । क्योंकि दशमी के
बाद पक्ष का त्रिभाग ( पाँच दिन ) शेष रहता है । परन्तु माघ शुक्ला दशमी
भीष्म जी के देहत्याग की तिथि रूप में प्रसिद्ध नहीं है । साथ ही ऐसी वैज्ञानिक
प्रक्रिया का अनुशीलन करना चाहिए जिसके द्वारा तिथि एवं दिन दोनों का
ग्रहण हो । तिथि का ग्रहण हो जाने से शुक्ल पक्ष के साथ 'त्रिभागशेषः' के
अन्वय की आवश्यकता नहीं रह जाती । साथ ही दिन का समय निश्चित हो
जाने पर दिवस के साथ 'त्रिभागशेषः' के अन्वय की आवश्यकता नहीं रह
( ८१ )
जाती । 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः' का अन्वय करने से एक महीना का
साढ़े सात-सात दिन का चार भाग होता है । साढ़े सप्तमी अर्थात् अष्टमी के
बाद महीने का त्रिभाग शेष रहता है । 'पक्षोऽयं शुक्लः' का अभिप्राय शुक्लादि
माघ महीना स्वीकार करना आवश्यक है । क्योंकि तभी माघ शुक्लाष्टमी के
बाद महीने का त्रिभाग शेष सम्भव है । साथ ही साढ़े सप्तमी का अभिप्राय
अष्टमी को दिन का त्रिभाग शेष सिद्ध होता है । अतः 'माघोऽयं' के साथ
'त्रिभागशेषः' ग्रहण करने से तिथि एवं दिन दोनों का ग्रहण हो जाता है । साथ
ही 'सौम्यः' इस चान्द्रमास की सार्थकता भी हो जाती है । सौम्य का अभिप्राय
सुखद अथवा सौम्यायन ( उत्तरायण ) भी है ।
इस तरह 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभाग शेषः' का अन्वय करने, पर पक्ष
और दिवस का मध्यभाग सिद्ध होता है । परन्तु 'पक्षोऽयं' के साथ अन्वय करने
पर दिवस का मध्यभाग सिद्ध नहीं होता । 'माघोऽयं' एवं 'पक्षोऽयं' के मध्य
'त्रिभाग शेषः' पठित होने पर भी दिवस का अध्याहार कर उसके साथ 'त्रिभाग
शेषः' का अन्वय करने में क्लिष्ट कल्पना करनी पड़ती है, साथ ही दिवस का
मध्य भाग सिद्ध होने पर भी पक्ष की तिथि सिद्ध नहीं होती ।
अस्तु ! माघशुक्लाष्टमी भीष्म निर्वाण की तिथि सिद्ध होती है । अब शेष
वचनों की इसी के अनुकूल संगति लगाना आवश्यक है ।
अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए पद शेष एवं वाक्य शेष का अध्याहार कर
सन्दर्भ पूर्ति की प्रथा पूर्वाचार्यों द्वारा अनुमोदित एवं आविष्कृत है । प्रसङ्गानुसार
उसी का अनुसरण यहाँ भी अपेक्षित है ।
'मासमात्रं' का पूर्व रीति से युद्ध काल के अतिरिक्त बारह दिन अर्थ करना
उपयुक्त है ।
अब क्योंकि पौषकृष्ण अष्टमी से माघशुक्ल अष्टमी तक छियालीस दिन होते
हैं; इसलिए 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः' का कूटार्थ 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः, द्वादश
न्यूनाः इति शेषः' ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् अट्ठावन घटे बारह बराबर
छियालीस ( ५८—१२=४६ ) ।
६
( ८२ )
इस तरह पौष कृष्ण अष्टमी से पौष शुक्ल प्रतिपदा तक युद्ध काल में पिता-
मह के नौ दिन शरशय्या पर हुए । पौष शुक्ला द्वितीया से पौषशुक्ला त्रयोदशी
तक बारह दिन शुद्धि काल में शरशय्या पर हुए । पुनः पौष शुक्ला चतुर्दशी
से माघ कृष्ण तृतीया तक धर्मराज के राज्याभिषेक काल में भीष्माचार्य के
पाँच दिन शरशय्या पर हुए । अब ९ + १२ + ५ = २६ दिन कुल हुए । अतः
४६ — २६ = २० दिन जीवन के शेष रहे ।
तृतीया से पूर्व राज्याभिषेकादि अत्यावश्यक कृत्यों में लग जाना स्वाभाविक
था और भीष्माचार्य से मिलकर पुनः रात्रि विश्राम के उद्देश्य से हस्तिनापुर
लौटते समय स्फुट चन्द्रोदय का उल्लेख देखते हुए माघ कृष्ण चतुर्थी के आगे
बढ़ना, अधिक रात्रि की क्लिष्ट कल्पना में हेतु होने के कारण अनुपयुक्त है ।
अस्तु !
माघ कृष्ण चतुर्थी को भगवान् श्रीकृष्ण ने भीष्माचार्य से कहा—
पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर
शेषं दिनानां तव जीवितस्य ।
अतः 'षड्विंशत् न्यूनाः षट् पञ्चाशतं' ऐसा भाव ग्रहण करने पर
५६ - ३६ = २० दिन शेष रहे ।
अब मुख्य प्रश्न उठता है कि बीस दिनों में आदि ( उपदेश आरम्भ के एक
दिन पूर्व ) और अन्त ( भीष्म के देह त्याग का दिन ) छोड़कर अठारह दिन
रहे । इनमें कितने दिन उपदेश श्रवण में और कितने ही हस्तिनापुर में
लगना चाहिए ?
वाच्यार्थ में 'पञ्चाशतं षट्' अर्थात् छप्पन दिन शेष रहते हैं और 'पञ्चाशत्'
पचास दिन हस्तिनापुर में व्यतीत होते हैं । अतः छप्पन से आदि-अन्त के दो
दिन घटा देने पर चौवन दिन शेष रहते हैं । चौवन दिनों में माघकृष्ण पञ्चमी
सहित पाँच दिन उपदेश में और नवमी को रात्रि विश्राम हस्तिनापुर में मान
लेने पर माघकृष्ण नवमी से माघ शुक्ल सप्तमी तक चौदह रात्रियाँ हस्तिनापुर
में व्यतीत होती हैं । माघ शुक्लाष्टमी को भीष्म का निर्वाण सिद्ध होता है ।
( ८३ )
अतः 'पञ्चाशत् नगरोत्तमे' के साथ 'षट् त्रिंशत् न्यूना, इति शेषः' का
अध्याहार करने पर ५०-३६=१४ रात्रियां हस्तिनापुर में व्यतीत होती हैं।
शुक्लादि एवं कृष्णादि मास में शुक्ल पक्ष में कोई अन्तर न होने पर भी
कृष्ण पक्ष में एक महीने का अन्तर हो जाता है। परन्तु इस दृष्टि से भी
शुक्लादि मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से माघ शुक्लाष्टमी तक छयालीस दिन ही सिद्ध
होते हैं।
महाभारत के दाक्षिणात्य प्रतियों में माघशुक्लाष्टमी रोहिणी नक्षत्र और
मध्याह्न का वर्णन है--
(शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिवं ।
प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥ )
निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे।
समावेश यदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥
( शान्तिपर्व ४७।३ )
उक्त श्लोकों में प्रथम दाक्षिणात्य है। दोनों का सम्मिलित अर्थ इस
प्रकार है--
'राजन् ! जब दक्षिणायन पूर्ण हुआ और सूर्य उत्तरायण में आ गये, तब
माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्याह्न काल में
भीष्म जी ने ध्यान मग्न होकर ( देह त्याग के अभिप्राय से ) अपने मन को
आत्मा में लगा दिया ।।'
इस तरह माघ शुक्लाष्टमी को भीष्म निर्वाण और मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी
को गीता जयन्ती एवं युद्धारम्भ की सिद्धि होती है ।
भीष्म निर्वाण के सम्बन्ध में भांडारकर संस्था की टिप्पणी के अनुसार
भीष्म निधन तिथि--माघ कृष्ण चतुर्थी है। 'त्रिभागशेषः पक्षोऽयं' की संगति
इस प्रकार लगाते हैं--उस दिन कृष्ण पक्ष के केवल चार ही 'दिन अर्थात् करीब
एक चौथाई हिस्सा ही बीता था तथा तीन चौथाई शेष था, अतः उस समय
( प्रकाश की दृष्टि से ) शुक्ल पक्ष का प्रारंभ माना जा सकता है।
श्री के० व्ही० अभ्यंकर ने भीष्म निधन माघ कृष्ण पञ्चमी में माना है ।
( ८४ )
परन्तु महाभारत में शुक्ल पक्ष का स्पष्ट उल्लेख और भीष्माष्टमी की प्रसिद्ध
तिथि के सर्वथा विरुद्ध उक्त विचार हैं ।
टिप्पणी--
सनत्कुमार संहिता के कार्तिक माहात्म्य में बीसवें अध्याय में शुक्ल पक्ष के
संदर्भ में लिखा है--'एकादश्यां कार्तिकस्य याचितं च जलं त्वया', इस वचन
के अनुसार शरशय्या पर आसीन भीष्मपितामह ने अर्जुन से कार्तिक शुक्ल
एकादशी के दिन जल मांगा ।
महाभारत भीष्मपर्व में ११९ वें अध्याय में श्रीभीष्मपितामह के शरशय्या
लाभ का वर्णन है । १२० वें अध्याय में अर्जुन द्वारा उन्हें बाणों की तकिया
देने का उल्लेख है । पुनः रात्रि विश्राम के पश्चात् प्रातःकाल उन्हें धनुर्धर
धनंजय ( अर्जुन ) द्वारा दिव्य जल प्रदान करने का उल्लेख १२१ वें
अध्याय में हैं ।
व्युष्टायां तु महाराज शर्वर्यां सर्व पार्थिवाः ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च उपतिष्ठन् पितामहम् ॥
( भीष्मप० १२१।१ )
आदि उक्तियों में उक्त तथ्य का प्रकाश द्रष्टव्य है । अतः महाभारत के
अनुसार कार्तिक शुक्ल दशमी को भीष्म पतन मान्य होगा । ऐसी स्थिति में
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से युद्धारम्भ मान्य होगा । शुक्लादि मासानुसार कार्तिक
कृष्ण तृतीया में युद्धान्त मान्य होगा । कृष्णादि मासानुसार मार्गशीर्ष कृष्ण
तृतीया में युद्धान्त मान्य होगा । ऐसी स्थिति में 'कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते
हिमागमे' इस महाभारत वचन का यह अर्थ लगाना पड़ेगा कि श्रीभगवान् ने
आश्विन में उपप्लव्य से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया । फिर 'अमावास्या
भविष्यति, संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम् ।' इस श्रीकृष्ण वचन
से संगति लगाने के लिए आश्विन की अमावास्या ज्येष्ठा नक्षत्र में मानना
पड़ेगा, परन्तु यह भी उपयुक्त नहीं । साथ ही आश्विन की पूर्णिमा उससे एक
पक्ष पूर्व लगभग रोहिणी में मानना होगा, परन्तु यह भी उपयुक्त नहीं । साथ
ही कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा मूल नक्षत्र में युद्धारम्भ और कार्तिक कृष्ण तृतीया
( ८५ )
आश्लेषा में युद्धान्त मान्य होगा, परन्तु 'पुष्येण संप्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः'
इस बलदेव वाक्यानुसार युद्धान्त श्रवण में होना चाहिए ।
साथ ही शुक्ल प्रतिपदा से युद्धारम्भ मानने पर 'अमावास्या भविष्यतिः
संग्रामो युज्यतां तस्यां' इस भगवद्वचन की यद्यपि इस प्रकार संगति लग
जायगी—'अमावास्या को सैन्य प्रशिक्षण और शुक्ल प्रतिपदा को युद्धारम्भ
हुआ' परन्तु शुक्ल चतुर्दशी को चौदहवें दिन का युद्ध सिद्ध होने के कारण
उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय वाला वचन तथा आठवें-नवें दिन के युद्ध में सन्ध्याकाल
एवं रात्रि में घोर अन्धकार आदि के संकेत व्यर्थ जायेंगे ।
यद्यपि इस रीति से भीष्मपितामह के शरशय्या पर कार्तिक शुक्ल १० से
माघ शुक्ल ८ तक लगभग ९० दिन हो जायेंगे, अतः भीष्मनिर्वाण सम्बन्धी
दिनों की संगति में सुगमता रहेगी, परन्तु युद्धकाल ही महाभारत के प्रतिकूल
होने पर भीष्मनिर्वाण की अनुकूलता भला कैसे ग्राह्य होगी ?
अतः सनत्कुमार संहिता का उक्त वचन महाभारत के प्रतिकूल होने के
कारण 'कल्पभेद' से मान्य है । अभिप्राय यह कि जिस ग्रन्थ का श्रीमद्भागवत
आदि की तरह स्वतन्त्र प्रामाण्य है, उसमें कल्पभेद मान्य है और जो ग्रन्थ
महाभारत के अनुसार बना है, वह महाभारत के विरुद्ध होने पर उतने अंशों में
प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता ।
'महाभारत युद्ध को लेकर कल्पभेद की बात नहीं बन सकती', ऐसा मानना
भी अनुचित है । क्योंकि महाभारत के अनुसार युद्धकाल उपस्थित होने पर
श्रीबलरामजी तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चले और गदायुद्ध के समय बयालीसवें
दिन लौट आये, जबकि श्रीमद्भागवत के अनुसार गदायुद्ध के समय पहुँचने तक
उनके कई महीने बीत चुके थे । ( नैमिषारण्य में सूतवध के पश्चात् बारह
महीने की शेष यात्रा का भागवत में उल्लेख है—'चरित्वा द्वादश मासांस्तीर्थ-
स्नायी विशुद्ध्यसे' ( भाग० १०।७८।४० )
✤ युद्ध-दीपिका ✤
वर्ष--द्वापर के सन्ध्यंश और कलि की सन्धि
अयन--दक्षिणायन
( ८६ )
ऋतु -- हेमन्त
मास -- मार्गशीर्ष एवं पौष
पक्ष -- मार्गशीर्ष शुक्ल एवं पौष शुक्ल
तिथि -- मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी से पौष शुक्ल प्रतिपदा
नक्षत्र -- मृगशिरा से श्रवण
विशेष -- मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष तेरह दिनों का था
भीष्म-पतन -- पौषकृष्ण अष्टमी
भीष्म-निर्वाण -- माघ शुक्लाष्टमी
✽ युद्ध-पूर्विका ✽
कार्तिक शुक्ल ११ रेवती — श्रीकृष्ण का उपप्लव्य नगर से हस्तिनापुर के लिए
प्रस्थान
मार्गशीर्ष कृष्ण ५ पुष्य — श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर से उपप्लव्य के लिए प्रस्थान
मार्गशीर्ष कृष्ण ५ पुष्य — कौरव-सेना का कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान
मार्गशीर्ष कृष्ण ६ पुष्य — ( १ ) पाण्डवों से मिलने के लिए श्रीबलदेवजी का
शुभागमन
( २ ) पाण्डव-सेना का कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान
मार्गशीर्ष शुक्ल १३ रोहिणी — ( १ ) सैन्य-शिक्षण, युद्ध-मर्यादा निर्धारण
( २ ) श्रीवेदव्यास द्वारा हस्तिनापुर में संजय
को दिव्य-शक्ति एवं दिव्य-दृष्टि प्रदान
✽ युद्ध-सारिणी ✽
मार्गशीर्ष शुक्ल १४ मृगशिरा युद्धारम्भ : गीताजयन्ती
मार्गशीर्ष १५ आर्द्रा दूसरे दिन का युद्ध
पौषकृष्ण १ पुनर्वसु तीसरे दिन का युद्ध
पौषकृष्ण २ पुष्य चौथे दिन का युद्ध
पौषकृष्ण ३ आश्लेषा पाँचवें दिन का युद्ध
पौषकृष्ण ४ मघा छठे दिन का युद्ध
पौषकृष्ण ५ पूर्वाफाल्गुनी सातवें दिन का युद्ध
( ८७ )
पौषकृष्ण ६ उत्तरा फाल्गुनी आठवें दिन का युद्ध
पौषकृष्ण ७ हस्त नवें दिन का युद्ध
पौषकृष्ण ८ चित्रा दशवें दिन का युद्ध : भीष्मपतन
पौषकृष्ण ९ स्वाति ग्यारहवें दिन का युद्ध
पौषकृष्ण १० विशाखा बारहवें दिन का युद्ध
पौषकृष्ण ११ अनुराधा १३वें दिन का युद्ध : अभिमन्युवध
पौषकृष्ण १२ ज्येष्ठा १४वें दिन का युद्ध : जयद्रथवध
पौषकृष्ण १३ मूल १५वें दिन का युद्ध : द्रोण-वध
पौषकृष्ण १४ पूर्वाषाढ़ा १६वें दिन का युद्ध
पौषकृष्ण अमा० उत्तराषाढ़ा १७वें दिन का युद्ध : कर्णवध
पौषशुक्ल १ श्रवण १८वें दिन का युद्ध : दुर्योधन हनन
अश्वत्थामा द्वारा सौप्तिक संहार
- नक्षत्र-सारिणी *
नक्षत्र मास-पूर्णिमा देवता
१. अश्विनी अश्विनीकुमार
२. भरणी आश्विन यम
३. कृत्तिका अग्नि
कार्तिक
४. रोहिणी ब्रह्मा
५. मृगशिरा चन्द्र
मार्गशीर्ष
६. आर्द्रा शिव
७. पुनर्वसु अदिति
पौष
८. पुष्य बृहस्पति
९. आश्लेषा सर्प
माघ
१०. मघा पितर
११. पूर्वा फाल्गुनी भग
फाल्गुन
१२. उत्तरा फाल्गुनी अर्यमा
१३. हस्त सूर्य
( ८८ )
१४. चित्रा चैत्र विश्वकर्मा
१५. स्वाति वायुः
१६. विशाखा वैशाख अग्नि-इन्द्र
१७. अनुराधा मित्र
१८. ज्येष्ठा ज्येष्ठ इन्द्र
१९. मूल निऋर्ति
२०. पूर्वाषाढ़ा आषाढ़ उदक
२१. उत्तराषाढ़ा विश्वेदेवाः
†२२. श्रवण श्रावण विष्णु
२२. धनिष्ठा वसु
२४. शतभिषा वरुण
२५. पूर्वाभाद्रपदा भाद्रपद अजचरणः
२६. उत्तराभाद्रपदा अहिर्बुध्न्य
२७. रेवती आश्विन पूषा
परिशिष्ट
श्री० ग० वा० कवीश्वर 'महाभारत युद्ध के कालगणनात्मक रहस्य' नामक
पुस्तक में भगवान् श्रीकृष्ण के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति'
( उद्योग० १४२।१८ ) इस वचन को प्रमाण मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या को
युद्धारम्भ मानते हैं। उसके बाद एक-एक दिन अवकाश देकर पौष शुक्ल
पञ्चमी को श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त मानते हैं। इस मत में पौष कृष्ण द्वादशी
को जयद्रथवध के बाद रात्रियुद्ध के कारण अवकाश का क्रम खण्डित होता है।
कवीश्वर जी शल्यवध के दूसरे दिन ( युद्ध के उन्नीसवें दिन ) दुर्योधन-
वध और सौप्तिक संहार मानते हैं। क्योंकि श्रीबलरामजी की तीर्थयात्रा के
प्रसंग में महाभारत की कुछ प्रतियों के अनुसार शल्यवध का समाचार गदायुद्ध
के एक दिन पूर्व ही श्रीबलरामजी को प्राप्त होता है। उसके बाद वे एक रात
तीर्थ में निवास कर देवर्षि नारद से प्रेरित होकर भीमसेन और दुर्योधन के
गदायुद्ध में दर्शक के रूप में सम्मिलित होते हैं।
† अभिजित् विधि
( ८९ )
परन्तु महाभारत में सर्वत्र 'अठारह दिनों तक युद्ध हुआ' ऐसा ही
उल्लेख है ।
चौदहवें दिन के रात्रियुद्ध में जब कर्ण की शक्ति से घटोत्कच मारा गया,
प्राणों को संकट में डालकर शोकग्रस्त धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण से युद्ध करने जा
रहे थे, तब दिव्यशक्ति सम्पन्न दिव्यदर्शी वेदव्यास ने प्रकट होकर उनसे
कहा—'पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति ।'='हे तात ! पाँचवें दिन
पृथिवी तेरी हो जायगी ।' ( द्रोणपर्व १८३।६५ )
कवीश्वर के मत में कृष्ण द्वादशी को रात्रियुद्ध था तथा शुक्ल पञ्चमी को
गदायुद्ध । अतः पांच दिनों के स्थान पर नौ दिनों की सिद्धि कैसे संभव है ?
अस्तु, यह निर्विवाद सत्य है कि जब उसके बाद लगातार युद्ध हो और अठारहवें
दिन युद्ध की समाप्ति हो, तभी श्रीवेदव्यास भगवान् का उक्त वचन सार्थक
हो सकता है ।
कहा जा सकता है कि शल्यवध के बाद लगभग सायंकाल दुर्योधन के
द्वैपायन सरोवर को माया से स्तम्भित कर उसमें छिपने का वर्णन है । उसके
घंटों बाद पाण्डवों से उसके संभाषण का वर्णन है; फिर रात बीतने पर
बलरामजी के गदायुद्ध में सम्मिलित होने का उल्लेख है, इन सबकी संगति
कैसे संभव है ?
ध्यानपूर्वक इस प्रश्न का उत्तर हृदयंगम करने योग्य है । जिस तरह
चौदहवें दिन के रात्रियुद्ध का और सौप्तिक संहार का भी पुष्पिका में रात्रि-
युद्ध के रूप में उल्लेख हुआ है, उसी तरह यदि गदायुद्ध रात्रि में हुआ
होता तो पुष्पिका में उसका उल्लेख भी 'रात्रियुद्ध' के रूप में ही होता ।
अथवा दुर्योधन का पता लग जाने पर गदायुद्ध से पूर्व एक रात्रि बीती होती
तो उसका उल्लेख भी अवश्य होता ।
अस्तु ! सन्दर्भ का आद्योपान्त अनुशीलन करने पर यह सिद्ध होता है कि
दुर्योधन, भीम, युधिष्ठिर और अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञापूर्वक सर्वत्र 'अद्य' (आज)
का ही प्रयोग किया है। साथ ही दुर्योधन के धराशायी होने तक 'सायंकाल'
का ही उल्लेख किया गया है । इतना ही नहीं, दुर्योधनवध का समाचार
( ९० )
वातिकों से सुनकर जब कृतवर्मा और कृपाचार्य सहित अश्वत्थामा उसी दिन
सर्व पाञ्चालों के वध की प्रतिज्ञा कर घोर जंगल में प्रवेश कर गये, तब
सूर्यास्त हो रहा था—'सूर्यास्तमनवेलायां' (सौप्तिक० २।१८), 'शर्वरी सम-
पद्यत' (सौप्तिक० २४)। अश्वत्थामा ने आधी रात तक सौप्तिक संहार कर
दिया—'तस्या रजन्यास्त्वर्धेन' (सौप्तिक ८।३२)। फिर ऊषाकाल में दुर्योधन
से मिला। सौप्तिक संहार का समाचार सुनकर सुयोधन ने प्रसन्नता से देह-
त्याग किया। दुर्योधन से मिलकर संजय हस्तिनापुर की ओर चला—'प्रत्यूषे
काले शोकार्ताः'
दुर्योधन के धराशायी होने पर भगवान् श्रीकृष्ण का वचन है—
कृतकृत्याश्च सायाह्ने निवासं रोचयामहे ।
साश्वनागरथाः सर्वे विश्रमामो नराधिपाः ॥
( शल्यपर्व ६१।६९ )
'अब हम लोगों का कार्य पूर्ण हो गया, अतः सायंकाल के समय विश्राम
करने की इच्छा हो रही है। राजाओं ! हम लोग घोड़े, हाथी एवं रथसहित
विश्राम करें।'
अतः दुर्योधनवध सूर्यास्त के सन्निकट हुआ। उसी घायल दशा में उसने
रात्रि बिताई—
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः ।
तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ॥
( शल्य० ६५।४५ )
'राजेन्द्र ! रक्त में सने हुए दुर्योधन ने सम्पूर्ण भूतों के मन में भय उत्पन्न
करनेवाली वह रात वहीं व्यतीत की॥'
श्रीकवीश्वर का कहना है—
शल्यवध की सूचना के बाद श्रीबलभद्रजी ने 'वृद्धा कुमारी कन्या' तीर्थ
से चलकर 'प्लक्षप्रस्रवण' और वहाँ से 'कारपवन' नामक उत्तम तीर्थ में जाकर
रात्रि विश्राम किया। उसके पश्चात् उन्हें देवर्षि नारद से जयद्रथ, कर्ण एवं
( ९१ )
शल्यादि के वध की सूचना तथा भीम-दुर्योधन के गदायुद्ध में दर्शक के रूप में
सम्मिलित होने की प्रेरणा मिली । अतः शल्यवध के दूसरे दिन गदायुद्ध में
दुर्योधनवध सिद्ध होता है ।
इसका उत्तर यह है कि यद्यपि निम्नलिखित उक्तियों से रात्रिविश्राम के
पूर्व शल्यवध की सूचना सिद्ध होती है—
‘तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः ।
शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तस्तदा ॥’
( शल्यपर्व ५२।२६, २७ )
“वहीं रहकर श्रीबलरामजी ने पाण्डवों द्वारा शल्य के मारे जाने का
समाचार सुना ॥”
और निम्नलिखित वचन से रात्रिविश्राम भी सिद्ध होता है—
सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् ।
हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥
आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ ।
संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥
तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह ।
मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥
( शल्यपर्व ५४।१२-१४ )
“फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थ में गये । हलधर ने वहां के निर्मल,
पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जल में गोता लगाकर ब्राह्मणों को दान
दे देवताओं और पितरों का तर्पण किया । तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी
यतियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुण के पवित्र
आश्रम पर गये ॥”
साथ ही—
ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥
किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।'
श्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन ॥
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे।
( शल्य० ५४।२३-२४½ )
“तब रोहिणीनन्दन बलराम ने दीनवाणी में नारदजी से पूछा—'तपो-
धन ! जो राजा लोग वहां उपस्थित हुए थे, उन सब क्षत्रियों की क्या
अवस्था हुई है, यह सब तो मैंने पहले ही सुन लिया था। इस समय कुछ
विशेष और विस्तृत समाचार जानने के लिये मेरे मन में अत्यन्त उत्सुकता
हुई है।।”
श्री नारदजी के प्रति बलभद्रजी की उक्त उक्तियों से यह भी सिद्ध होता
है कि उन्हें युद्ध सम्बन्धी सूचना विश्वस्त व्यक्तियों से प्राप्त होती थी।
तथापि किन्हीं-किन्हीं प्राचीन प्रतियों में भी रात्रि विश्राम से पूर्व शल्यवध
की सूचना वाला श्लोक नहीं है। अतः उसे क्षेपक माना जा सकता है। देवर्षि
द्वारा प्राप्त सूचना शल्यवध के बाद उसी दिन हो सकती है, अतः उसे प्रामा-
णिक मानने में कोई आपत्ति नहीं है।
अथवा अठारह दिनों तक लगातार युद्ध और ‘पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते
भविष्यति’ इस महर्षि वेदव्यास के वाक्य को देखते हुए शल्यवध सम्बन्धी
वचन सत्य नहीं माना जा सकता। कदाचित् क्षेपक सिद्ध न भी हो सके तो
गौणार्थ की कल्पना इस तरह कर लेनी चाहिये—
श्रीकृष्ण प्रेरित धर्मराज ने जब सायंकाल शल्यवध का निश्चय कर लिया,
तब धर्म और ब्रह्म को प्रमाण मानने वाले दैवज्ञ ब्राह्मणों की दृष्टि में वह
मारा ही जा चुका। जैसे कृष्ण भगवान् से मारे हुओं को ही अर्जुन ने मारा,
वैसे ही श्रीभगवान् के अमोघ प्रताप से समन्वित निज संकल्प के प्रभाव से उसी
समय मारे ही गये शल्य को ही प्रत्यक्ष युद्ध में धर्मराज ने मारा।
इस तरह उन्नीस दिनों तक युद्ध की बात और द्रोणनिधन से दुर्योधन
निधन तक अवकाशयुक्त युद्ध की बात निःसार सिद्ध होती है।
इसी सन्दर्भ में यह भी समझ लेना चाहिये कि द्रोणाचार्य के नेतृत्व में
लगातार युद्ध हुआ—
( ९३ )
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता ।
तस्य चाह्निभागेन क्षयं जग्मुः पतत्त्रिणः ॥
( द्रोण० १९१।९ )
अतः अभिमन्युवध के बाद जयद्रथवध से पूर्व अवकाश मानना अर्जुन की
अमोघ प्रतिज्ञा को और संजय के उक्त वचन को मिथ्या सिद्ध करना है । जो
किसी प्रकार उचित सिद्ध किया ही नहीं जा सकता ।
अभिमन्युवध जो कि द्रोणाचार्य के नेतृत्व में तेरहवें दिन हुआ, उसके
बाद चौदहवें दिन अवकाश इसलिये भी संभव नहीं था, क्योंकि अर्जुन ने रात
बीतने के बाद दूसरे ही दिन सूर्यास्त तक जयद्रथवध की घोर प्रतिज्ञा कर ही
ली थी—
धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः ।
ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम् ॥
यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम् ।
इमां चाप्यपरां भूयः प्रतिज्ञां मे निबोधत ॥
यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुपयास्यति ।
इहैव सम्प्रवेष्टाऽहं ज्वलितं जातवेदसम् ॥
( द्रोणपर्व ७३।४५-४७ )
'ऊपर जिन पापियों का नाम मैंने गिनाया है तथा जिन दूसरे पापियों
का नाम नहीं गिनाया है, उनको जो दुर्गति प्राप्त होती है, उसी को शीघ्र ही
मैं भी प्राप्त करूँ; यदि यह रात बीतने पर कल जयद्रथ को न मार डालूँ ॥'
'अब आप लोग मेरी यह दूसरी प्रतिज्ञा भी पुनः सुन लें । यदि इस पापी
जयद्रथ के मारे जाने से पहले ही सूर्यदेव अस्ताचल को पहुँच जायेंगे तो मैं यहीं
प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा ॥'
अभिमन्युवध के दिन ही अर्जुन की प्रतिज्ञा मानना और एक दिन युद्ध बन्द
रखना, श्रीकृष्णार्जुन दोनों को मिथ्याभाषी सिद्ध करना है । भगवान् श्रीकृष्ण
ने उसी रात देवी सुभद्रा से कहा —
( ९४ )
यत् पार्थेन प्रतिज्ञातं तत् तथा न तदन्यथा ।
चिकीर्षितं हि ते भर्तुर्न भवेज्जातु निष्फलम् ।।
यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा
रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च ।
रणगतमभियान्ति सिन्धुराजं
न स भविता सह तैरपि प्रभाते ॥
( द्रोण० ७७।२५, २६ )
'अर्जुन ने जिस बात के लिए प्रतिज्ञा कर ली है, वह उसी रूप में पूर्ण
होगी । उसे कोई पलट नहीं सकता । तुम्हारे स्वामी जो कुछ करना चाहते हैं,
वह कभी निष्फल नहीं होता ।।'
'यदि मनुष्य, नाग, पिशाच, निशाचर, पक्षी, देवता और असुर भी रण-
क्षेत्र में आये हुए सिन्धुराज जयद्रथ की सहायता के लिए आ जायें तो भी वह
कल उन सहायकों के साथ ही जीवन से हाथ धो बैठेगा ।।'
वीर अर्जुन की प्रतिज्ञा के अनुरूप ही उसी रात श्री भगवान् का उक्त
वचन होना चाहिये, तभी पार्थ की प्रतिज्ञा सत्य सिद्ध होगी ।
अर्जुन की प्रतिज्ञा से संत्रस्त स्वयं जयद्रथ का वचन भी इसमें प्रमाण है—
मामसौ पुत्रहन्तेति श्वोऽभियाता धनञ्जयः ।
प्रतिज्ञातो हि सेनाया मध्ये तेन वधो मम ॥
तां न देवा न गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः ।
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥
( द्रोण० ७५।१३, १४ )
'राजन् मुझे अपने पुत्र का घातक समझकर अर्जुन कल सबेरे मुझपर
आक्रमण करने वाला है, क्योंकि उसने अपनी सेना के बीच में मेरे वध की
प्रतिज्ञा की है ।।'
'सव्यसाची अर्जुन की उस प्रतिज्ञा को देवता, गन्धर्व, असुर, नाग और
राक्षस भी अन्यथा नहीं कर सकते ।।'
( ९५ )
प्रतिज्ञा के अनन्तर ही अर्जुन के गाण्डीव धनुष की टंकार से, श्रीकृष्णार्जुन
के दिव्य शङ्खघोष से तथा पाण्डव वीरों के सिंहनाद से संत्रस्त कौरव-गुप्तचरों
द्वारा पार्थ की जयद्रथवध सम्बन्धी प्रतिज्ञा सुनने से पूर्व यह समझकर कि
अभिमन्युवध के समाचार से क्रुद्ध अर्जुन रात्रि में ही युद्ध के लिए निकल
पड़ेंगे, युद्ध की तैयारी करने लगे । ( द्रोणपर्व ७५।६-८ )
इतना ही नहीं, जब संग्राम भूमि से श्रीकृष्णार्जुन शिविर की ओर आ
रहे थे तब अभिमन्युवध से प्रसन्न घमण्ड में भरे धृतराष्ट्र के पुत्रों का उन्होंने
सिंहनाद सुना । अभिमन्युवध का ज्ञान न होने पर भी पार्थ का हृदय धड़क-
धड़क कर विधाता की ओर से उसे किसी अनर्थ की सूचना दे रहा था । इधर
युयुत्सु को कौरववीरों की भर्त्सना करते श्रीकृष्ण भगवान् ने सुना । परन्तु
उन्होंने अर्जुन को उस समय कुछ नहीं बताया । केवल इतना कहा कि तुम्हारे
अपशकुन का फल कोई और ही अमंगल हो सकता है, भाइयों की ओर से
निश्चिन्त रहो ।
बाद में जब अर्जुन ने शिविर में अभिमन्यु को नहीं देखा और सभी भाइयों
को अत्यन्त व्यथित देखा तथा श्रीकृष्ण ने भी युयुत्सु द्वारा कौरवों को उपालम्भ
( उलाहना ) का समाचार कह सुनाया, तब अर्जुन ने कहा--
किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वया कृष्ण रणे मम ॥
अधाक्षं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान् महारथान् ।
( द्रोण० ७२।६४, ६४३ )
"श्रीकृष्ण ! आपने रणक्षेत्र में ही यह बात मुझसे क्यों नहीं बता दी ?
मैं उसी समय उन समस्त क्रूर महारथियों को जलाकर भस्म कर डालता ।"
उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि जो अर्जुन युद्धभूमि में अभिमन्युवध का
समाचार सुन लेते तो शत्रुओं को उसी समय युद्ध में भस्म कर देते तथा जिनके
कष्ट और क्रोध का स्मरण कर कौरव रात्रियुद्ध की संभावना से संत्रस्त एवं
सतर्क हो गये थे, ऐसी स्थिति में सत्यवादी अर्जुन क्या एक दिन युद्ध को
विश्राम देकर निज प्रतिज्ञा भंग कर सकते थे, कदापि नहीं । अतः जिसे प्रो०
( ९६ )
कवीश्वर युद्ध विराम या अवकाश का स्पष्ट उल्लेख बताते हैं, वह तो युद्ध का
ज्वलन्त सन्देश है ।
यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि 'तां निशां दुःख शोकार्तौ .... ....'
( द्रोण० ७७।१ ) इस वचन से उस रात्रि का संक्षिप्त परिचय मिलता है ।
आगे सायंकाल से रात्रि भर की घटनाओं का क्रमिक वर्णन है । 'निद्रा नैवो-
पलेभाते वासुदेव धनञ्जयौ ।' यह पंक्ति यद्यपि यह सिद्ध करती है कि रात्रि
भर श्रीकृष्ण और अर्जुन सोये नहीं, आगे दोनों के शयन का वर्णन मिलता
है, अतः पहले श्लोक को ज्यों-का-त्यों प्रमाण मान कर आगे की घटना दूसरे
दिन ओर दूसरी रात की है, ऐसा श्रीकवीश्वर सिद्ध करना चाहते हैं ।
परन्तु वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है । यह तो महा कवि की काल सम्बन्धी कूट-
शैली है । अतः यहाँ श्रीकृष्णार्जुन के रात्रि भर न सोने में—'देवी सुभद्रा
को सान्त्वना प्रदान करने तक' यह संकोचक प्रमाण है। अर्थात् शोक संतप्त
होने के कारण श्रीकृष्णार्जुन रात्रि में अधिक समय तक जागे ही रहे । अर्जुन
की प्रार्थना पर ( द्रोण० ७७।११ ) जब श्री भगवान् बहन सुभद्रा को सान्त्वना
दे चुके, तब दोनों वीर सोये ।
कवीश्वर का इस सन्दर्भ में यह भी कहना है कि अभिमन्युवध के बाद
जयद्रथवध की प्रतिज्ञा वाली रात्रि के पश्चात् अवकाश दिन में सूर्योदय के
समय जब श्री कृष्णार्जुन संतप्त थे, तब अनेकों अपशकुन हो रहे थे; जिसका
विवेचन द्रोणपर्व ७७।२-८ में विस्तार पूर्वक है ।
इस पर हमारा यह कहना है कि ग्रन्थकार ने समय निर्धारण के लिये
दो संकेत प्रदान किये हैं । 'स कबन्धस्तथाऽऽदित्ये परिधिः समदृश्यत' ( द्रोण०
७७।३ ) इस प्रथम निर्देश से यह निर्णय होता है कि दिन का समय था,
रात्रि का नहीं । 'नरनारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः स वासवाः ।' ( द्रोण०
७७।२ ) 'नर नारायण ( अर्जुन और श्रीकृष्ण ) के क्रुद्ध होने ....' इस
द्वितीय सन्देश से यह निश्चय होता है कि अभिमन्युवध का समाचार सुनकर
भयंकर प्रतिज्ञा कर श्रीकृष्णार्जुन द्वारा क्रुद्ध होकर शंख बजाने के समय
सायंकाल था, उसी समय सूर्य कबन्ध ( मस्तकहीन शरीराकृति ) से घिर
( ९७ )
गया, त्रिलोकी संत्रस्त हुई । वाहन मल-मूत्र करने और रोने लगे । समुद्र
क्षुब्ध हो गये । पृथिवी कांपने लगी । भूत-प्रेतादि नाचने लगे ।
अथवा जिस समय श्रीकृष्णार्जुन विजय सूचक शुभ शकुनों को अनुभव
करते हुए युद्धभूमि में पहुँचे, सूर्योदय का समय उपस्थित हो रहा था ।
दोनों वीरों ने क्रुद्ध होकर शंख बजाये । उस समय भी अपशकुन प्रकट होने
लगे । आकाश से भयंकर गर्जना के साथ सहस्रों जलती हुई उल्काएँ गिरने
लगीं और सारी पृथिवी कांपने लगी । 'श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्य-
साचिन:' (अर्जुन की प्रतिज्ञा सुन कर) यह लक्षण भी दोनों समय घटित
होते हैं । अर्जुन को अत्यन्त प्रसन्न होकर युद्धभूमि में प्रवेश करते देखकर भी
सभी उनकी प्रतिज्ञा को जान सकते हैं और रात्रि युद्ध की आशंका से युद्ध
के लिये उद्यत होते समय गुप्तचरों से भी पार्थ की प्रतिज्ञा सुनकर सभी त्रस्त
हो सकते हैं । युद्धकाल उपस्थित होने पर अपशकुनों का स्पष्ट वर्णन द्रोण०
८४।२५; ८८।४-६ में है ।
'सायाह्ने', 'ततो निशाया दिवसस्य चाशिवः शिवारुतैः सन्घिरवर्तताद्भुतः ।,
कुशेशयापीडनिभे दिवाकरे विलम्बमानेऽस्तमुपेत्य पर्वताम्, 'प्रियां तनुं भानु-
रुपैति पावकम्' (द्रोण० ५०।१-४) 'ततः सन्ध्यामुपास्यैव वीरो वीराव-
सादने' (द्रोण० ७२।८) आदि उक्तियों से अर्जुन की प्रतिज्ञा का समय
'सायाह्न सिद्ध होता है । प्रातः काल कदापि नहीं ।
परन्तु 'तां निशां दुःख शोकार्तौ' (द्रोण० ७७।१) से प्रतिज्ञा वाली रात्रि
का पहले संक्षिप्त परिचय देकर 'नर नारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः स वासवाः ।
श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः' (द्रोण० ७०।२-८) तक युद्धभूमि
में श्रीकृष्णार्जुन के प्रयाण का निर्देश कर महाकवि ने अभिमन्युवध वाली रात्रि
का विस्तार पूर्वक वर्णन करने की इच्छा से आगे का प्रसंग उपस्थापित करते
हुए 'अथ कृष्णं·········' कहा है, ऐसा मानना ही समीचीन है ।
श्रीभीष्माचार्य के नेतृत्व में रात्रि विश्राम के बाद युद्ध का सर्वत्र उल्लेख
भी अवकाश युक्त युद्ध की कल्पना के सर्वथा विरुद्ध ही है--
७
( ९८ )
ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत ।
अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत् संध्याकाले च वर्तति ॥
( भीष्म० ५४।४३ )
'भारत ! इस प्रकार सूर्यं के अस्ताचल को चले जाने पर संध्या के समय
आपकी और पाण्डवों की सेनाएँ लौट आयीं ।।'
प्रभातायां च शर्वर्यां भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
अनीकान्यनुसंयाने व्यादिदेशाथ भारत ॥
( भीष्म० ५६।१ )
'भारत ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने
अपनी सेनाओं को युद्धभूमि में चलने का आदेश दिया ।।'
इति ब्रुवन्तः शिबिराणि जग्मुः सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥
उल्कासहस्रैश्च सुसम्प्रदीप्तैर्विभ्राजमानैश्च यथा प्रदीपैः ।
किरीटिवित्रासितसर्वयोधा चक्रे निवेशं ध्वजिनी कुरूणाम् ॥
( भीष्म० ५९।१३८-१३९ )
'भारत ! उपर्युक्त बातें कहते हुए आपके समस्त सैनिक सहस्रों जलती हुई
मसालें तथा प्रकाशमान दीपों के उजाले में अपने-अपने शिबिर में गये । कौरव
सेना के सम्पूर्ण सैनिकों पर अर्जुन का त्रास छा रहा था। इसी अवस्था में उस
सेना ने रात्रिविश्राम किया ।।'
व्युष्टां दिशां भारत भारतानामनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा ।
ययौ सपत्नान् प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण बलेन भीष्मः ॥
( भीष्म० ६०।१ )
'भारत ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भरतवंशियों की सेना के
अग्रभाग में स्थित हुए महामना भीष्म समग्रसेना से घिरकर शत्रुओं से युद्ध
करने के लिए चले। उस समय उनके मन में शत्रुओं के प्रति बड़ा
क्रोध था ।।'
चतुर्थ दिन के युद्ध में भीष्माचार्य के निम्नलिखित वचन से उनके नेतृत्व
में अवकाशयुक्त युद्ध का स्पष्ट ही खण्डन होता है—
ए
( ९९ )
तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकाशिभिः ।
घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥
( भीष्म० ६४।७७ )
'इसलिए विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों के साथ इस समय युद्ध
करना मुझे पसन्द नहीं आता। आज युद्ध का विराम घोषित कर दिया जाय।
कल सबेरे हमलोग शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे ।।'
व्युषितायां च शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे ।
उभे सेने महाराज युद्धायैव समीयतुः ॥
( भीष्म० ६९।१ )
'महाराज ! वह रात बीतने पर जब सूर्योदय हुआ, तब दोनों ओर की
सेनाएँ आमने-सामने आकर युद्ध के लिए डट गयीं ।।'
कवीश्वर के मत में मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को आठवें दिनका युद्ध
था। कौरव युद्धभूमि में पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होते थे। इसलिए
रात्रि के प्रारंभ में स्वच्छ चन्द्रप्रकाश के सामने से उनके ऊपर आ रहा था
और इसलिए उनकी स्वयं की छाया पीछे अनुचरों पर गिरकर अन्धेरा हो गया,
वे ठीक प्रकार से नहीं दिखने लगे और छाया भी एक-दो की नहीं, अपितु
अगणित हाथी, रथादि से युक्त विशाल सेना की।
परन्तु उक्त कल्पना सर्वथा निराधार है। इस न्याय से तो शुक्ल पक्ष की
अधिक प्रकाश वाली तिथियों में युद्ध सर्वथा ही असंभव मानना चाहिये । आठवें
दिन के अवहार ( युद्ध विराम ) का विवरण महाभारत में इस प्रकार है--
रात्रिः समभवत् तत्र नापश्याम ततोऽनुगान् ।
ततोऽवहारं सैन्यानां चक्रुः कुरुपाण्डवाः ॥
रजनीमुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये ।
अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः ।
न्यविशन्त यथाकालं गत्वा स्वशिविरं तदा ॥
( भीष्म० ९६।७९।८० )
'रात हो गयी थी। हमें अपने सैनिक नहीं दिखाई दे रहे थे, तब कौरव
एवं पाण्डवों ने अपनी-अपनी सेना को लौटने का आदेश दे दिया ।।'