काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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शल्यादि के वध की सूचना तथा भीम-दुर्योधन के गदायुद्ध में दर्शक के रूप में
सम्मिलित होने की प्रेरणा मिली । अतः शल्यवध के दूसरे दिन गदायुद्ध में
दुर्योधनवध सिद्ध होता है ।
इसका उत्तर यह है कि यद्यपि निम्नलिखित उक्तियों से रात्रिविश्राम के
पूर्व शल्यवध की सूचना सिद्ध होती है—
‘तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः ।
शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तस्तदा ॥’
( शल्यपर्व ५२।२६, २७ )
“वहीं रहकर श्रीबलरामजी ने पाण्डवों द्वारा शल्य के मारे जाने का
समाचार सुना ॥”
और निम्नलिखित वचन से रात्रिविश्राम भी सिद्ध होता है—
सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् ।
हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥
आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ ।
संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥
तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह ।
मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥
( शल्यपर्व ५४।१२-१४ )
“फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थ में गये । हलधर ने वहां के निर्मल,
पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जल में गोता लगाकर ब्राह्मणों को दान
दे देवताओं और पितरों का तर्पण किया । तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी
यतियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुण के पवित्र
आश्रम पर गये ॥”
साथ ही—
ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥
किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।'