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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

( ८१ )
जाती । 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः' का अन्वय करने से एक महीना का
साढ़े सात-सात दिन का चार भाग होता है । साढ़े सप्तमी अर्थात् अष्टमी के
बाद महीने का त्रिभाग शेष रहता है । 'पक्षोऽयं शुक्लः' का अभिप्राय शुक्लादि
माघ महीना स्वीकार करना आवश्यक है । क्योंकि तभी माघ शुक्लाष्टमी के
बाद महीने का त्रिभाग शेष सम्भव है । साथ ही साढ़े सप्तमी का अभिप्राय
अष्टमी को दिन का त्रिभाग शेष सिद्ध होता है । अतः 'माघोऽयं' के साथ
'त्रिभागशेषः' ग्रहण करने से तिथि एवं दिन दोनों का ग्रहण हो जाता है । साथ
ही 'सौम्यः' इस चान्द्रमास की सार्थकता भी हो जाती है । सौम्य का अभिप्राय
सुखद अथवा सौम्यायन ( उत्तरायण ) भी है ।
इस तरह 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभाग शेषः' का अन्वय करने, पर पक्ष
और दिवस का मध्यभाग सिद्ध होता है । परन्तु 'पक्षोऽयं' के साथ अन्वय करने
पर दिवस का मध्यभाग सिद्ध नहीं होता । 'माघोऽयं' एवं 'पक्षोऽयं' के मध्य
'त्रिभाग शेषः' पठित होने पर भी दिवस का अध्याहार कर उसके साथ 'त्रिभाग
शेषः' का अन्वय करने में क्लिष्ट कल्पना करनी पड़ती है, साथ ही दिवस का
मध्य भाग सिद्ध होने पर भी पक्ष की तिथि सिद्ध नहीं होती ।
अस्तु ! माघशुक्लाष्टमी भीष्म निर्वाण की तिथि सिद्ध होती है । अब शेष
वचनों की इसी के अनुकूल संगति लगाना आवश्यक है ।
अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए पद शेष एवं वाक्य शेष का अध्याहार कर
सन्दर्भ पूर्ति की प्रथा पूर्वाचार्यों द्वारा अनुमोदित एवं आविष्कृत है । प्रसङ्गानुसार
उसी का अनुसरण यहाँ भी अपेक्षित है ।
'मासमात्रं' का पूर्व रीति से युद्ध काल के अतिरिक्त बारह दिन अर्थ करना
उपयुक्त है ।
अब क्योंकि पौषकृष्ण अष्टमी से माघशुक्ल अष्टमी तक छियालीस दिन होते
हैं; इसलिए 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः' का कूटार्थ 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः, द्वादश
न्यूनाः इति शेषः' ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् अट्ठावन घटे बारह बराबर
छियालीस ( ५८—१२=४६ ) ।
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