काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं काल-स्वरूप मंगलाचरण
श्रीहरिः
श्रीरामायण-महाभारत
काल-मीमांसा
पूज्यपाद श्री स्वामी करपात्री जी महाराज
सप्रतीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः।
जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥
[email protected]
सम्पादक तथा प्रकाशक
श्री स्वामी सदानन्द सरस्वती ( श्री वेदान्ती जी )
धर्मसंघ प्रचार विभाग
दुर्गाकुण्ड, वाराणसी ।
द्वितीय संस्करण
सहायतार्थ ३.००
मुद्रक : गौरीशंकर प्रेस, मध्येश्वर, वाराणसी ।
सप्तरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः।
जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥
[email protected]
स्मरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः।
जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥
[email protected]
विषय-सूची
विषय पृष्ठ
भूमिका ( श्रीमार्कण्डेय ब्रह्मचारी )
ऐतिहासिकता के पोषक प्रमाण १
भारतीय ज्योतिर्विज्ञान और महाभारत २०
पुराणों के सन्दर्भ में २३
पुरातत्त्व : महाभारत-रामायण २५
रामायण २६
राम की अँगूठी २७
सेतुबन्धन कल्पना नहीं ३३
समुद्र वर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति ३५
लंका की स्थिति ३९
कालनिर्धारण में पूर्वाग्रह अनुचित ४२
उपसंहार ४६
महाभारत युद्ध ४८
पृष्ठभूमि ५०
अठारह दिन ५७
अवकाश-सहित ५९
अवकाश-रहित ६६
श्रीनीलकण्ठाचार्य ६९
निष्कर्ष ७१
भीष्म निर्वाण ७३
प्रथम पक्ष ७७
द्वितीय पक्ष ८०
( २ )
विषय पृष्ठ
टिप्पणी ८४
युद्ध-दीपिका ८५
युद्ध-पूर्विका ८६
युद्ध-सारिणी ८६
नक्षत्र-सारिणी ८७
परिशिष्ट ८८
भूमिका
आधुनिक पाश्चात्त्य शिक्षा-दीक्षा में शिक्षित विद्वानों की लम्बी अवधि के
काल को ईसवी सन् के अन्दर ही रखने की भावना बन गयी है। यदि वे
बहुत ऊपर उठे तो ईसवी सन् से सौ-दो-सौ वर्ष पहले ले जाते हैं। अरबों
वर्ष का समय इस प्रकार कुल तीन हजार वर्ष के अन्दर ही आ जाता है। इस
प्रकार इन लोगों के विचार आस्तिकों पर भी छाने लगते हैं और उनका शास्त्रों
पर का अटल विश्वास भी डगमगाने लगता है। उसे संभालने के लिए मनीषियों
का सुदृढ़ प्रयत्न होता है।
भारतीय साहित्य में इतिहास रूप से दो आर्ष ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं और
भारतीय जनता पर उनकी अमिट छाप पड़ी है। वे हैं (१) रामायण और
(२) महाभारत। वैसे काश्मीर के इतिहास में एक कल्हण की राजतरङ्गिणी
प्रसिद्ध है। किन्तु वह ऋषि प्रोक्त नहीं है। पाश्चात्त्य विद्वानों ने उन पर अपनी
दृष्टि से विचार किया है और उनकी शिक्षा-दीक्षा में पले हुए आधुनिक
भारतीय विद्वान् भी विभिन्न लेखों, ताम्रलेखों और पुरातत्त्व के आधार पर
उन्हीं पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा स्वबुद्धि प्रसूत अटकल के द्वारा उपजी हुई बातों
को परीक्षा द्वारा सुदृढ़ करने पर तुले हुए हैं। इस विषय में डाक्टर सांकलिया
द्वारा प्रयास समाचारपत्रों के माध्यम से जनता के सम्मुख आया और सभाओं
में तथा पृथक् पत्रों द्वारा लोगों ने सकल शास्त्र रहस्यज्ञ सनातन धर्म के
मूर्तिमान् स्वरूप विशुद्ध देहधारी संन्यास के प्रतीक पूज्यपाद गुरुदेव श्रीस्वामी
करपात्रीजी महाराज से प्रश्न करना प्रारम्भ किया तो उन्होंने सोचा कि इसके
निर्णय के लिए एक सम्मेलन बुलाया जाय और वहीं सभी विचारकों के
समक्ष इसका निर्णय किया जाय। पहले वाराणसी में ही वह सम्मेलन करने
की बात हुई; किन्तु फिर विचारा गया कि अभी थोड़े समय में प्रयाग में कुम्भ
होने वाला है वहीं यह विचार ठीक रहेगा, अतः संवत् २०३३ में प्रयाग में
कुम्भ मेला के अवसर पर महाभारत और रामायण के समय निर्धारण के
( २ )
लिए सम्मेलन बुलाया गया। उसमें पौरस्त्य और पाश्चात्य दोनों ही सिद्धान्तों के
विद्वान् उपस्थित हुए। पौरस्त्य विद्वानों में पूज्यपाद जगद्गुरु शङ्कराचार्य (पुरी)
श्रीस्वामी निरञ्जन देवतीर्थ तथा पाश्चात्य सिद्धान्त के विद्वानों में इन्दौर
विश्वविद्यालय के ग० ब० कवीश्वर का नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय है।
दो दिनों तक लगातार विचार चला। उसमें मध्यस्थ पूज्यपाद गुरुदेव श्रीस्वामी
करपात्रीजी महाराज थे। यह विशेष ध्यान देने की बात थी कि कुम्भ मेला में
कोई विचार अपना भी इस विषय में जनता के समक्ष दिया जाय। इसलिए संवत्
दो हजार तैंतीस में ही अतिशीघ्रता में पूज्यपाद गुरुदेव ने रामायण-महाभारत
काल मीमांसा लिखी और वह कुम्भ के समय ही प्रकाशित हुई। उसके कुछ
पृष्ठ उसी सम्मेलन में पूज्यपाद गुरुदेव ने पढ़कर सुनाया भी था। विचार यद्यपि
जमकर हुआ तथापि उसमें कतिपय अंश जैसे गीता जयन्ती, युद्ध के दिन, भीष्म
निर्वाण आदि पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हो सके। इन पर विचार करने के लिये
चातुर्मास्य का समय निश्चित किया गया और संवत् २०३४ में जबकि पूज्यपाद
गुरुदेव का चातुर्मास्य वाराणसी में वृन्दावन विहारी भवन में हो रहा था, वहीं
यह विचार चला। इस विचार के लिये श्री वृन्दावन धाम से दो (श्री स्वामी
चिन्मयानन्द एवं श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती) महात्मा दण्डी स्वामी
भी पधारे थे। जिसमें श्री निश्चलानन्दजी महाराज का नाम विशेष
उल्लेख्य है। उस विचार विनिमय में इन पंक्तियों का लेखक भी भाग लेता
था। अनध्यायों में भी जैसे प्रतिपद, अष्टमी, चतुर्दशी आदि में विचार हुआ।
विचार होने पर जो निर्मन्थितार्थ निकला उसका सङ्कलन श्री स्वामी
निश्चलानन्दजी महाराज ने किया और उसे पूज्यपाद जगद्गुरु शङ्कराचार्य जी
महाराज को हमने ट्रेन में उन्हीं के साथ यात्रा करते हुए सुनाया। सुनकर हार्दिक
सन्तोष प्रकट करते हुए प्रसन्नता के शब्दों में उनके मुख से यह उद्गार निकला
कि "जब इसका प्रकाशन हो तो मैं अपना कार्यक्रम स्थगित कर काशी रहूँगा
और इसमें प्रूफ रीडिंग से लेकर पूर्ण सम्पादन तक सारा कार्य करूँगा।" इतनी
सुन्दर वह वस्तु थी किन्तु दैव दुर्विपाक से कहीं लुप्त हो गयी। फिर संवत्
२०३५ के चातुर्मास्य में (वेद शास्त्रानुसन्धान भवन केदार घाट, वाराणसी
में हो रहा है) श्री स्वामी निश्चलानन्द महाराज पधारे हैं। इन्होंने पूर्ण उत्साह
( ३ )
और द्विगुणित निष्ठा से वह पहले का लिखा हुआ अंश पुनः बड़े परिश्रम से
तैयार किया है ।
इस प्रस्तुत निबन्ध में रामायण-महाभारत काल गणना के साथ-साथ
कुछ अंश बढ़ा है जो कि विचारकों के लिये तथा जिज्ञासुओं के लिये परम
उपयोगी होगा । विषय-सूची खण्ड दो में वह सारा विषय दिया हुआ है ।
प्रोफेसर ग. वा. कवीश्वरजी ने अपनी पुस्तक 'महाभारत युद्ध के काल
गणनात्मक रहस्य ) में युद्ध काल में अवकाश मान कर महाभारत के वचनों
के आधार पर तिथियों और नक्षत्रों का तालमेल मिलाने का प्रशंसनीय प्रयास
किया है । उसकी समालोचना करके वस्तुतः महाभारत के अन्तःसाक्ष्य के
आधार पर जो तिथियाँ गीता जयन्ती, युद्धकाल एवं भीष्म निर्वाण की ठहरती
हैं, वह अन्तिम लेख परिशिष्ट में दी हुई है ।
इस लघु कलेवर पुस्तक में विचार सम्पूर्ण पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी
करपात्रीजी महाराज के हैं । हम लोगों ने उसी विचार को लेखनी द्वारा
उपनिबद्ध किया है । यह सारा ही ग्रन्थ पूज्यपाद गुरुदेव का ही है और इसे
उन्होंने अक्षरणक्षरण अकारणकरण करुणावरुणालय कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ
रामकृष्णेश्वर भगवान् के चरणों में अर्पित कर दिया है, जिनकी स्थापना इसी
संवत् २०३५ में दशहरा के दिन वेद शास्त्रानुसन्धान भवन में हुई है ।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी संवत् २०३५ मार्कण्डेय ब्रह्मचारी
धर्मसङ्घ,
दुर्गाकुण्ड, वाराणसी ५
स्मरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः।
जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥
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॥ श्रीहरिः ॥
श्रीरामायण-महाभारत
काल-मीमांसा
( खण्ड १ )
कुछ पाश्चात्त्य विद्वान् और उनके अनुयायी कतिपय भारतीय विद्वान् भी
महाभारत के पात्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि को ऐतिहासिक पुरुष न
मानकर काल्पनिक मानते हैं । एवं महाभारत के युद्ध को प्रत्येक पुरुष के मन में
उठनेवाली दैवी-आसुरी वृत्तियों का युद्ध अथवा धर्म-अधर्म का युद्ध मानते हैं ।
इससे वे यह कहना चाहते हैं कि महाभारत कोई इतिहास नहीं है । किन्तु
ऐसा मानने में उन लोगों के पास कोई प्रमाण नहीं है । हम आगे उन्हीं
प्रमाणों का सङ्कलन करने जा रहे हैं जो उनकी ऐतिहासिकता के पोषक हैं ।
ऐतिहासिकता के पोषक प्रमाण—
प्रतिदिन प्रातः स्मरण में उन लोगों का स्मरण ही यह बतलाता है कि वे
ऐतिहासिक हैं ।
धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन ।
पापं प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन ॥
शत्रुर्विनश्यति धनञ्जयकीर्तनेन ।
माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगाः ॥'
[
( २ )
महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से ही माघ कवि ने अपना शिशुपालवध
काव्य लिखा है ।
संवत् ९७७ के इस ग्रन्थ के टीकाकार वल्लभदेव महाभारत ग्रन्थ को
सवा लाख श्लोकों का मानते हैं। वे शिशुपालवध के २।३८ की टीका में
लिखते हैं 'सपादलक्षं श्री महाभारतम् ।' सवा लाख श्लोकों वाला महाभारत
वाविला प्रेस मद्रास-१ से भी छप चुका है ।
संवत् ९५७ के राजशेखर भी अपनी काव्यमीमांसा (अ० ३) में
महाभारत को शतसाहस्रीसंहिता कहते हैं ।
विक्रम की आठवीं शताब्दी के आचार्य आनन्दवर्धन अपने ध्वन्यालोक में
महाभारत के शान्तिपर्व के १५२ अध्याय के गृध्रगोमायुसंवाद का उल्लेख
करते हैं। वे महाभारत के आदि पर्व के पहले अध्याय (अनुक्रमणी) को
एवं हरिवंश को भी महाभारत का अंश मानते हैं—
'ननु महाभारते यावानपि विवक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुकान्तः....
महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन समाप्ति विदधता तेनैव कविबेधसा कृष्णद्वैपायनेन
सम्यक् स्फुटीकृतः' (ध्वन्यालोक ४ उद्योत कारिका ५) ।
संवत् ६८७ के वल्लभी निवासी ऋग्वेदभाष्यकार आचार्य स्कन्दस्वामी
अपने भाष्य में महाभारत के अनेक आख्यानों का निर्देश करते हैं—
'भारते तु ऋषयः शापात् सरस्वतीं मोचयामासुरित्याख्यानम्' (ऋ०
सं० १।११२।९) यह आख्यान शल्य पर्व के ४४ वें अध्याय में है ।
सप्तम शताब्दी में विद्यमान आचार्य दण्डी कवि अपनी अवन्तिसुन्दरी में
महाभारत एवं उसके रचयिता महर्षि वेदव्यास का स्मरण करते हैं—
'मर्त्ययत्नेषु चैतन्यं महाभारतविद्यया ।
अर्पयामास तत्पूर्वं यस्तस्मै मुनये नमः ॥'
(मङ्गलाचरण श्लोक ३)
दण्डी से पूर्वभावी बाण अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ कादम्बरी एवं हर्षचरित में
महाभारत की कथाओं का अनेक प्रकार स्मरण करते हैं ।
( ३ )
'पार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता, विराटनगरीव कीचकशतावृता (पृष्ठ ६७)
'भीष्ममिव शिखण्डिशत्रुम्,. पराशरमिव योजनगन्धानुसारिणम् (पृष्ठ १०७
तथा पृष्ठ १०८) 'महाभारते शकुनिवधः, (पृष्ठ १४३) महाभारत-पुराण-
रामायणानुरागिणा, (पृष्ठ १७९) 'आस्तीकतनुरिवानन्दितभुजङ्गलोका, (पृ०
१८८) 'महाभारते दुःशासनापराधाकर्णनम्, (पृ० १९९) 'महाभारत-
पुराणेतिहासरामायणेषु (पृ० २६३) महाभारतमिवानन्तगीताकर्णनानन्दितनरं
(पृ० ३१४) (इत्यादि कादम्बरी पूर्वभागे-हरिदास कृत कालिकाता संस्करणे
शाके १८५७) ।
एवमेव 'एकाकी तपस्वी वनमृगैः सह संवर्धितः.........समग्रमुद्यतमेक-
विंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान् राजन्यकं रामः' (षष्ठ उच्छ्वास पृ० २९१)
'हिडिम्बामुखचुम्बनास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतमपायि पवनात्मजेन (षष्ठ
उच्छ्वास पृ० २९२) 'जामदग्न्येन च शाम्यन्मन्युशिखिशिखासञ्ज्वरसुखाय-
मानस्पर्शशीतलेषु क्षत्रियक्षतजमहाह्रदेषु अस्नायि' (षष्ठ उच्छ्वास पृ० २९२) ।
'नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे ।
चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥' ४
'किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिना ।
कथेव भारतो यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम् ॥' १०
'कवीनामगलद्दर्पं नूनं वासवदत्तया ।
शक्त्येव पाण्डुपुत्राणां गतया कर्णगोचरम् ॥' १२
इति हर्षचरित उपोद्घाते ।
प्रायः बाण के समकालिक जयादित्य और वामन द्रोणपर्वत० सूत्र में महा-
भारत के द्रोण का स्मरण करते हैं । 'द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम्' (पा० सू०
४।१।१०३) इतिसूत्रे 'नैवात्र महाभारतद्रोणो गृह्यते' यह लिखा है । काशिकायां
'ईदूद्वेद्विवचनं प्रगृह्यम्' (पा० सू० १।१।११) सूत्र पर महाभारत शान्तिपर्व का
'मणीवोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियो वत्सतरौ मम ।' (१७७।१२) श्लोक उद्धृत है ।
इनसे भी प्राचीन मीमांसाशास्त्र व्याख्याता भट्टपाद कुमारिल अपने...
औत्पत्तिकसूत्र के वार्तिक में लिखते हैं—'प्रसिद्धो हि तथा चाह पाराशर्योऽत्र
वस्तुनि । इदं पुण्यमिदं पापमित्येतस्मिन् पदद्वये ।'......' धर्म और अधर्म दोनों
ही प्रसिद्ध हैं । यह बात पराशरपुत्र व्यास ने महाभारत में कही है ।
इनके समकालिक बौद्ध विद्वान् धर्मकीर्ति अपने प्रमाण वार्तिक में 'भारता-
दिष्वपि इदानीन्तनानामशक्तावपि कस्यचित् शक्तिसिद्धेः ।' ( प्रमाणवार्तिक
पृ० ४४७-४४८ ) महाभारत का स्मरण करता है ।
इनसे पूर्ववर्ती वाक्यपदीयकार प्रथमकाण्ड श्लोक १४२ में 'गौरिव
प्रक्षरत्येका' महाभारत का यह श्लोक इतिहास नाम से उद्धृत कर रहे हैं ।
इनसे प्राचीन कविकुल गुरु कालिदास जिनके सम्बन्ध में नवभारत टाइम्स
९ जुलाई, १९७६ अपने दैनिक पत्र में लिखता है कि 'उज्जैन के प्रसिद्ध
पुरातत्त्ववेत्ता डा० वी० एस० वाकांकर ने बतलाया कि उज्जैन के प्राचीन
भाग में गढ़कालिका के निकट मिली ईसापूर्व शताब्दी की मुहर से महाराज
विक्रमादित्य के सही काल का पता लगता है । इस मुहर पर स्वस्तिक चिह्न
के साथ ईसापूर्व प्रथम शताब्दी की ब्राह्मी लिपि में उज्जैन के राजा कीर्ति का
नाम खुदा हुआ है । विक्रम संवत् को पहले कीर्ति संवत् कहा जाता था । ईसा-
पूर्व प्रथम शताब्दी में पश्चिमी क्षत्रिय शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया
और युद्ध में उनकी हार होने के बाद विजयस्मृति के रूप में कीर्ति संवत्
प्रारम्भ हुआ । वहीं एक मिट्टी की मूर्ति में शेर के दाँत गिनते हुए भरत की
आकृति बनी है । यह मूर्ति ईसा बाद पहली शताब्दी की है । यह प्रसङ्ग
महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में वर्णन किया है । यह मुहर और
मूर्ति प्रथम ऐतिहासिक प्रमाण है जिनसे महाराज विक्रमादित्य तथा कालिदास
का समय ईसापूर्व प्रथम शताब्दी और ईसा बाद प्रथम शताब्दी के बीच नियत
करने में सहायता मिलती है ।
अपने मेघदूत में भी कालिदास—
'क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद्भजेथाः' क्षत्रियों के विनाश की सूचना
देनेवाले कुरुक्षेत्र में जाना । इससे कौरव पाण्डवों का युद्ध स्मरण कर रहे हैं ।
( ५ )
संवत् १९१ से संवत् २१४ पर्यन्त महाराज सर्वनाथ का शासन था ।
उनका शिलालेख मिला है जिसमें 'एक लाख श्लोकों वाला महाभारत परा-
शरसुत व्यास ने बनाया' लिखा हुआ है । उक्तं च महाभारते—शतसाहस्र्यां
संहितायां परमर्षिणा पराशरसुतेन व्यासेन ।'
अब ईसवी सन् से पहले के वचन सङ्कलित किये जा रहे हैं—
वासवदत्ता में उद्धृत न्यायवार्तिककार उद्योतकर ( ४।१।२१ ) गौतम
सूत्र में महाभारत वन पर्व का श्लोक उद्धृत करते हैं :—
'अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ।
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं नरकमेव वा ॥'
( वनपर्व ३०।२८ ),
यह जीव अज्ञानी है अपने लिए सुख दुःख सम्पादित करने में स्वयं
असमर्थ है । ईश्वर की प्रेरणा से ही वह स्वर्ग और नरक जाता है ।
योगभाष्यकार पतञ्जलि अपने योगभाष्य में :—
'प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् ।
भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥
( यो० सू० १।४७ )
मीमांसाभाष्यकार शबरस्वामी ने अपने मीमांसा भाष्य ( ८।१।१ ) में
आदि पर्व का यह श्लोक उद्धृत किया है ।
'विस्तीर्य हि महज्जालमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् ।
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥
( आदिपर्व १।५१ )
ऋषियों ने विस्तार और संक्षेप में दोनों प्रकार से वर्णन किया है क्योंकि
विद्वानों को दोनों ही पद्धति प्रिय है । 'एष चाख्यानसमयः' ( नि० ७।७ )
की व्याख्या में दुर्गाचार्य लिखते हैं—'भारते आख्यानसमयः' अर्थात् महा-
भारत में यही सिद्धान्त (आख्यान की परिपाटी) स्वीकार किया गया है । (अर्थात्
पुरुष रूप वाले देवता का सिद्धान्त माना गया है ) पृथ्वी ने अपना भार हल्का
( ६ )
करने के लिये स्त्री रूप धारण कर ब्रह्मा से प्रार्थना की ( महाभारत आदि
पर्व ६४ ) ।
अग्नि ने ब्राह्मण रूप धारण कर वासुदेव ( भगवान् श्री कृष्ण ) और अर्जुन
दोनों से खाण्डव बन जलाने के लिये याचना की । ( म० भा० आ० प०
२२४-२२५ ) पुरुष रूप से ( म० भा० आ० प० २३० ) तथा अग्नि रूप
से ( म० भा० आ० प० २२७ ) खाण्डव वन को जलाया; इत्यादि स्थलों
में मिलता है ।
स्वयं महाभारत की पुष्पिका में 'शतसाहस्र्यां संहितायाम्' सौ हजार वाली
संहिता में ऐसा लिखा है । ये सब, महाभारत एक लाख श्लोक का है, इस में
प्रबल प्रमाण हैं ।
मुसलमान इतिहास लेखक अलबेरूनी के अनुसार महाभारत १८ पर्वों
का एक लाख श्लोक वाला ग्रन्थ है ।
दण्डी ने 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भुतार्थां बृहत्कथाम्' से जिस बृहत्कथा
का स्मरण किया तथा 'प्राहुः' परोक्षभूत का रूप देकर उनसे बहुत पहले
बृहत्कथा की स्थिति बतायी दण्डी से पूर्वभावी भट्ट बाण ने भी कादम्बरी के
प्रस्तावनामय मङ्गलाचरण में अतिद्वयी कथा लिख कर ( वासदत्ता और
बृहत्कथा ) दो कथाओं की ओर संकेत किया है । उस वृहत्कथा के लेखक
गुणाढ्य के समय में महाभारत विद्यमान था । उसमें से उन्होंने रुरुमुनि कथा,
सुन्दोपसुन्द कथा, कुन्ती दुर्वासा कथा, पाण्डु द्वारा मुनि वध कथा आदि महा-
भारत से ली । इसी लिये बृहत्कथा के अनुवाद स्वरूप कथा सरित्सागर में
क्षेमेन्द्रकृत वृहत्कथा मंजरी में भी रुरुमुनि कथा १४।७५ में हे, जो महाभारत
आदि पर्व आठवें अध्याय में की हैं । सुन्दोपसुन्द कथा १५।१३५ में है जो
आदिपर्व २०१ अध्याय में है । कुन्ती दुर्वासा कथा १६।३६ में हैं जो आदिपर्व
११३।३२ में है । पाण्डु मुनिवध कथा २१।२० में है जो आदिपर्व १०८ अध्याय
में है । शकुन्तला की कथा ३२।१०८ में है जो आदिपर्व ६२ अध्याय में है !
महाभारत में ही महाभारत का रचनाकाल देखें तो अन्तरङ्ग परीक्षा
से पता चलता है कि —
( ७ )
'त्रीनग्नीनिव कौरव्व्यान् जनयामास वीर्यवान् ।
उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥
जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति ।
तेषु तातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥
अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।
जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ।
स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥'
( म० भा० आ० प० )
अर्थात् महर्षि व्यास तीन अग्नियों के समान तेजस्वी कुरुवंशीय धृतराष्ट्र
पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न कर तप करने वन में स्थित अपने आश्रम में चले
गये । उनके उत्पन्न होने, बढ़ने और परम गति को प्राप्त होने के अनन्तर
महर्षि व्यास ने मनुष्य लोक में महाभारत का निरूपण किया । हजारों ब्राह्मणों
के साथ जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत
सुनाने की आज्ञा दी । वैशम्पायन यज्ञ के सदस्यों के साथ आसीन होकर यज्ञ
के मध्य-मध्य के विराम में उनसे प्रेरित होकर महाभारत सुनाया करते थे ।
इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के सर्पयज्ञ समाप्ति के पूर्व और धृतराष्ट्र पाण्डु एवं
विदुर के देहावसान के अनन्तर महाभारत संहिता की रचना हुई ।
यद्यपि पाण्डु का निधन पहले ही हो चुका था तो भी धृतराष्ट्र को युद्ध
के बाद बीसवें वर्ष में परम पद प्राप्त हुआ । १५ वर्ष तक तो धृतराष्ट्र युधिष्ठिर
के साथ ही रहे । सोलहवें वर्ष में भीम के वाग्बाण से निर्विण्ण होकर विदुर
के साथ वन चले गये ।
'ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः ।
राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीड़ितः ॥'
( म० भा० आश्रमवासिकपर्व २।१२ )
वहाँ धर्माचरण करते हुए एक वर्ष बीतने पर देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर
( ८ )
से कहा था कि धृतराष्ट्र के जीवन के अभी तीन वर्ष शेष हैं ।
'तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् ।
वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः ॥'
( म० भा० आश्रमवासिक पर्व २०।३२ ) ।
महाभारत का युद्ध कलि और द्वापर की सन्धि में हुआ ।
'अन्तरे समनुप्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् ।
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥'
( महाभारत आदिपर्व २।१९ )
अर्थात् द्वापर और कलि के मध्य में कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ । महा-
भारत युद्ध के ३६ वर्ष बीतने पर परीक्षित का राज्याभिषेक हुआ । परीक्षित
ने ६० वर्ष तक राज्य किया ।
महाभारत युद्ध से ९६ वर्ष पर बाल्यकाल में ही जनमेजय का राज्या-
भिषेक हुआ । वयस्क होने पर विवाह हुआ । विवाह के कुछ ही दिनों बाद
उत्तङ्क की प्रेरणा से जनमेजय ने सर्पसत्र आरम्भ किया । उसी यज्ञ में वैश-
म्पायन ने महाभारत सुना था । उसी महाभारत को महर्षि व्यास ने जय
नामक महाकाव्य कहा । यह 'जय' ही विविध उपाख्यानों के सहित लिखा
हुआ भारतीय युद्ध का विशद् इतिहास है । महाराज युधिष्ठिर के विजय के
उपलक्ष्य में लिखे जाने के कारण उनके समय में ही इसका लिखा जाना
उचित है ।
तथा धृतराष्ट्र के समक्ष उनका पराभव लिखना उचित न होता, अतः
महाराज धृतराष्ट्र को परमपद प्राप्त होने के अनन्तर महाभारत युद्ध के बीस वर्ष
बाद और ३६ वें वर्ष के पहले ही महाभारत संहिता निर्माण का समय है।
अहं तु कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ ।
पांडवानां च सर्वेषां प्रथयिष्यामि मा शुचः ॥
( म० भा० मौ० प० २।१३ )
१. प्रथम खण्ड: काल का स्वरूप, नित्यत्व एवं दार्शनिक लक्षण
( ९ )
इसका निष्कर्ष यह है कि—महाभारत के ही प्रमाण वचनों से सिद्ध
होता है कि महाभारत युद्धकाल से बीस वर्ष बाद धृतराष्ट्र का परलोक-वास
हुआ था। धृतराष्ट्र के मरने के बाद और जनमेजय के सर्पसत्र के पूर्व महा-
भारत की रचना हुई है।
जनमेजय का अभिषेक कलि के ६० वर्ष अथवा ९६ वर्ष बीतने पर हुआ।
महाभारत आदि पर्व ४९।१७ और सौप्तिक पर्व १६।१५ में लिखा है कि
राजा परीक्षित ने ६० वर्षों तक राज्य किया और कलि गताब्द ३६ के बाद
उनका शासन आरम्भ हुआ। इसके अनुसार महाराज जनमेजय का अभिषेक
काल कलिगताब्द ९६ वर्ष प्रमाणित होता है। आदिपर्व ४९।२६ के अनुसार
६० वर्ष की व्यवस्था में परीक्षित का देहान्त हुआ। परीक्षित का जन्म काल
और कलियुग का आरम्भ काल एक ही है। इसके अनुसार जनमेजय का
अभिषेक कलि गताब्द ६० में ही प्रमाणित होता है। जिन श्लोकों
में ६० वर्षों तक शासन करने की बात कही गयी है उनका अभिप्राय भी
६० वर्षों तक की व्यवस्था से ही समझना चाहिये। जनमेजय का राज्या-
भिषेक छोटी ही अवस्था में हुआ था। अतएव अभिषेक के २४ वर्ष बाद सर्प
सत्र हुआ था। इससे यह भी प्रमाणित हो जाता है कि महाभारत की रचना
कलिगताब्द २० वर्ष के बाद और कलिगताब्द ८४ वर्ष के पूर्व हुई।
महाराज युधिष्ठिर कलिगताब्द ३६ में भगवान् श्रीकृष्ण के परम धाम
पधारने के पश्चात् दिवंगत हुए थे। यह महाभारत संहिता युधिष्ठिर के
विजयोपलक्ष्य में जयेतिहास के रूप में अनेक उपाख्यानों के साथ रची गई थी।
अतः उसकी रचना युधिष्ठिर के राजत्व काल और भगवान् कृष्ण के परम धाम
पधारने से पहले ही हुई थी। यह स्वाभाविक बात है कि जिस राजा का विजय
इतिहास लिखा जाता है, वह प्रायः उसके शासन काल में ही लिखा जाता है।
अतएव कलिगताब्द २० वर्ष बाद महाराज धृतराष्ट्र के स्वर्गवास के पश्चात्
युधिष्ठिर के शासन काल में ही कलिगताब्द ३६ के पूर्व ही महाभारत की
रचना प्रमाणित होती है। महाभारत की रचना तीन वर्षों में पूर्ण हुई थी।
श्री गणेश जी ने उसे लिखा था। इस प्रकार महाभारत का रचना काल विक्रम
( १० )
संवत् पूर्व ३०२४ और विक्रम संवत् पूर्व ३००८ के मध्य एवं ई० सन् पूर्व
३०८१ और ई० पूर्व ३०६५ के बीच में ही प्रमाणित होता है, और महर्षि
वैशम्पायन ने उसी महाभारत को कलियुगारम्भ से ८४ वें वर्ष विक्रम संवत्
पूर्व २९६०, ई० सन् पूर्व ३०१७ में महाराज जनमेजय को सर्पसत्र के अवसर
पर सुनाया था। महाभारत युद्ध काल ही कलिप्रारम्भ (कलि संवत्) अथवा
युधिष्ठिर संवत् कहा जाता है। ज्योतिष ग्रन्थों, पञ्चाङ्गों में परम्परा से वही
संवत् चला है।
इसके अतिरिक्त कुछ शिलालेखों में भी इस कलि संवत् का उल्लेख है।
इसका आरम्भ ईसवी सन् से ३१०२ वर्ष पूर्व माना जाता है। दक्षिण के
चालुक्यवंशी राजा पुलकेशी के समय एहोल की पहाड़ी पर के जैन मन्दिर का
शिलालेख भारत युद्ध से ३७३५ वर्ष बीतने पर और शक राजाओं के ५५६
वर्ष बीतने पर बना है। वहाँ के श्लोक हैं—
'त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः ।
सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु ॥
पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतीषु च ।
समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥'
यह मन्दिर आज से १३४२ वर्ष पहले बना है। ३७३५ में १३४२ मिलाने
पर ५०७७ वर्ष होता है। यही सं० २०३३ तथा शाके १८९८ के
पञ्चाङ्ग में गतकलि ५०७७ वर्ष लिखा है।
पाश्चात्यों के आक्षेप
क्रिश्चियन लासेन ने सन् १८३७ में अपनी पुस्तक 'इण्डियन एक्टीविटीज्'
में कहा कि—"जिस भारत को सूत ने कहा था वह वास्तव में मूल पुस्तक
भारत का द्वितीय संस्करण है। इसीलिए 'आश्वलायन गृह्यसूत्र' में भारत
और महाभारत का उल्लेख मिलता है। आश्वलायन का समय ईसवी सन्
पूर्व ३५० हो सकता है, इस प्रकार महाभारत का निर्माण काल ईसापूर्व
४६० वर्ष से पहले का नहीं हो सकता।"
( ११ )
बेवर की दृष्टि में पाणिनि के साहित्य से वासुदेव, अर्जुन आदि का उल्लेख
होने पर भी भारत या महाभारत का उल्लेख नहीं है; अतः पाणिनि के समय
तक महाभारत की रचना नहीं हुई ।
मेगस्थनीज ने भी भारत महाभारत का उल्लेख नहीं किया, सुतरां पाणिनि
पूर्वभावी आश्वलायन के गृह्यसूत्र में भारत, महाभारत का उल्लेख प्रक्षिप्त है ।
लुडविग ने सन् १८८४ से महाभारत पर विचार प्रारम्भ किया । उनकी
राय में न तो महाभारत कोई इतिहास है और न तो पाण्डव ऐतिहासिक पुरुष ।
पाण्डु का अभिप्राय है पीला सूर्य, धृतराष्ट्र के अन्धेपन का अर्थ है शरत्कालीन
सूर्य और गान्धारी की आंखों पर पट्टियां बांधने का अर्थ है सूर्य का बादलों में
छिप जाना तथा वसन्त के सूर्य का नाम कृष्ण ।
होज्यान ने कहा है कि--'पाण्डव और उनके पक्षपाती कृष्ण छली कपटी
थे । उन्हीं लोगों की ओर से युद्ध में छल हुआ । कौरवों का नाम वेद और
ब्राह्मणों में आता है अतः वे प्राचीन हैं । वे ही धर्मभीरु और न्यायप्रिय हैं ।
'किसी ने बौद्ध राजा, सम्भवतः अशोक, की प्रशंसा में एक काव्य लिखा ।
ब्राह्मणों द्वारा बौद्धधर्म का पराभव होने पर ब्राह्मणों ने उस काव्य में कुछ
हेर-फेर कर उसे अपने साँचे में ढाल लिया तथा कौरवों की प्रशंसा पाण्डवों के
नाम कर दी और धीरे-धीरे बौद्धधर्म का नाम भी उड़ा दिया ।'
मैक्समूलर ने कुछ अंशों में लासेन के मत का अनुसरण किया और उनकी
दृष्टि में महाभारत एक कवि की कृति नहीं है । परन्तु उसके सभी रचयिता-
गण मनुप्रोक्त धर्म के पक्के अनुयायी ब्राह्मण रहे होंगे । ब्राह्मण सम्प्रदाय में
शिक्षा होने पर भी पाँचो भाई एक स्त्री से विवाह कर बैठे । प्रत्यक्ष धर्म विरुद्ध
इस घटना पर ब्राह्मण सम्पादकों ने तरह-तरह के रङ्ग चढ़ाये परन्तु यह छिपा
न रह सका ।
बुल्हर के अनुसार महाभारत कोई इतिहास या पुराण नहीं ।
ब्राडर का कहना है कि ईसा के जन्म से ५०० या ४०० वर्ष पहले जब
ब्रह्मा सर्वप्रधान देवता माने जाते थे, उस समय आदि कवि ने कुरुभूमि में जन्म
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ग्रहण किया होगा । वह गायक रहा होगा । उसने लोगों के मुख से अज्ञात
जाति के साथ कुरुवंश की पराजय सुनी होगी । उसी वियोगान्त घटना के
आधार पर उसने स्वदेशी वीरों को क्षात्रधर्म के मूर्तिमान् आदर्श तथा यदुवंशी
वीर कृष्ण के साथ पाण्डव, मत्स्य आदि विजातियों को नीच कुलोद्भव और
अन्याय से विजयी बतलाकर चित्रित किया होगा । वही प्राचीन भारतगान
आश्वलायनगृह्यसूत्र में उल्लिखित है ।
उसके बहुत समय बाद कृष्णजन्म के अनन्तर कृष्णभक्त पुरोहितों ने बुद्ध के
विरुद्ध कृष्ण या विष्णु को खड़ा किया । पाण्डुवंशियों की सहायता से पुरोहितो
की चेष्टाएँ सफल हुईं, और चौथी शताब्दी में विष्णु ही प्रधान देव हुए । फिर
तो पुरोहितों ने आदि महाभारत में पाण्डवों की अपकीर्ति को कीर्तिरूप में और
उनके विपक्षी कुरुओं की कीर्ति को निन्दारूप में बदलकर आदि महाभारत का
कलेवर परिवर्तित कर दिया, और दाक्षिणात्य पाण्डुवंश की एक शाखा के रूप में
मान लिया ।'
डेन्मार्क के डाक्टर सोर्यनसन कोपेन हेगेन विश्वविद्यालय के अध्यापक थे ।
'महाभारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' शीर्षक निबन्ध लिखने के
कारण उन्हें आचार्य पदवी मिली । वे महाभारत का मूल कोई प्राचीन पौराणिक
गाथा और उसका रचयिता एक ही व्यक्ति मानते हैं ।'
बुल्हर कोजे नेसिस दे ने महाभारत को कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे विकसित
काव्य माना है । किन्तु उसकी रचना एक ही समय में सम्पादक मण्डल द्वारा
वे मानते हैं । वे युद्ध को कोरी कवि कल्पना मानते हैं । उनका कहना है कि
महाभारत एक रूपक है, जिसमें पाण्डव धर्म के कौरव अधर्म के प्रतिनिधि
रूप में दिखाये गये हैं ।
उनके शिष्य डालमान ने उनके सिद्धान्तों की पूर्ण व्याख्या करते हुए
बताया है कि पहले दो प्रकार के साहित्य रहे होंगे:--( १ ) राजवंशों की
पौराणिक गाथायें और ( २ ) उपदेशपरक कवितायें । सर्वसाधारण में प्रचार की
दृष्टि से इन दोनों भावों को मिलाकर कविमण्डल ने एक नवीन रचना कर दी,
वही महाभारत है । यह सब पाश्चात्यों का आक्षेप है ।
समाधान
वस्तुतः वे लोग ईसाई मत के प्रचार को ध्यान में रखकर हम लोगों के
साहित्यों को देखते हैं, विचार करते हैं और मनमानी कल्पना की उड़ान
भरते हैं किन्तु प्रमाण कुछ भी उपस्थित नहीं करते जिससे उनकी बात प्रमाण
की कसौटी पर खरी उतरे ।
वस्तुतः अतीत व्यक्तियों एवं घटनाओं के सम्बन्ध में इतिहास को छोड़कर
और कोई भी दूसरा प्रमाण हो नहीं सकता । अटकल मात्र से न तो कुछ
सिद्ध ही होगा और न विद्वानों को सन्तोष ही । जबकि जिस ग्रन्थ के विषय में
अटकल लगायी जा रही है उस ग्रन्थ से ही वह अटकल विरुद्ध ठहरता है ।
महाभारत में ही जय, भारत या महाभारत का निर्माता कृष्णद्वैपायन व्यास को
ही कहा गया है तथा महाभारत के निर्माण का समय भी उसमें दिया है । फिर
उसके विरुद्ध अटकलबाजी का क्या महत्त्व हो सकता है ?
इन सभी पाश्चात्यों की अटकलबाजी भी परस्पर विरुद्ध ही हैं । कोई महा-
भारत को एक कर्तृक, कोई अनेक कर्तृक, कोई एक काल में निर्मित और कोई
भिन्न-भिन्न काल में निर्मित मानते हैं ।
उनकी दुरभिसन्धि का यह जाज्वल्यमान उदाहरण है कि पाणिनि ने
अष्टाध्यायी में 'महान् व्रीह्यपराह्णगृष्टीष्वासजाबालभारभारतहैलहिलरौरव-
प्रवृद्धेषु' ( पा० ६।२।३८ ) में महाभारत का स्मरण किया है, अतः
पाणिनि द्वारा उल्लेख न होने से आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत-महाभारत
का नाम क्षेपक हैं यह ठीक नहीं । व्रीहि, अपराह्ण, गृष्टि, इष्वास,
जाबाल भार भारत हैलहिल, रौरव और प्रवृद्ध शब्द परे ( बाद में )
रहें तो महान् शब्द को अन्तोदात्त स्वर होता है । जैसे महाव्रीहि, महापराह्ल
आदि में अन्तोदात्त होता है, वैसे ही महाभारत में भारत शब्द परे रहते महान्
शब्द को अन्तोदात्त होता है । इस सूत्र से पाणिनि ने महाभारत शब्द बनाया
है । फिर बेवर द्वारा यह कहना कि पाणिनि ने भारत-महाभारत का स्मरण
नहीं किया यह अत्यन्त प्रमाद है ।