काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( ९१ )
शल्यादि के वध की सूचना तथा भीम-दुर्योधन के गदायुद्ध में दर्शक के रूप में
सम्मिलित होने की प्रेरणा मिली । अतः शल्यवध के दूसरे दिन गदायुद्ध में
दुर्योधनवध सिद्ध होता है ।
इसका उत्तर यह है कि यद्यपि निम्नलिखित उक्तियों से रात्रिविश्राम के
पूर्व शल्यवध की सूचना सिद्ध होती है—
‘तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः ।
शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तस्तदा ॥’
( शल्यपर्व ५२।२६, २७ )
“वहीं रहकर श्रीबलरामजी ने पाण्डवों द्वारा शल्य के मारे जाने का
समाचार सुना ॥”
और निम्नलिखित वचन से रात्रिविश्राम भी सिद्ध होता है—
सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् ।
हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥
आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ ।
संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥
तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह ।
मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥
( शल्यपर्व ५४।१२-१४ )
“फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थ में गये । हलधर ने वहां के निर्मल,
पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जल में गोता लगाकर ब्राह्मणों को दान
दे देवताओं और पितरों का तर्पण किया । तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी
यतियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुण के पवित्र
आश्रम पर गये ॥”
साथ ही—
ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥
किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।'
श्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन ॥
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे।
( शल्य० ५४।२३-२४½ )
“तब रोहिणीनन्दन बलराम ने दीनवाणी में नारदजी से पूछा—'तपो-
धन ! जो राजा लोग वहां उपस्थित हुए थे, उन सब क्षत्रियों की क्या
अवस्था हुई है, यह सब तो मैंने पहले ही सुन लिया था। इस समय कुछ
विशेष और विस्तृत समाचार जानने के लिये मेरे मन में अत्यन्त उत्सुकता
हुई है।।”
श्री नारदजी के प्रति बलभद्रजी की उक्त उक्तियों से यह भी सिद्ध होता
है कि उन्हें युद्ध सम्बन्धी सूचना विश्वस्त व्यक्तियों से प्राप्त होती थी।
तथापि किन्हीं-किन्हीं प्राचीन प्रतियों में भी रात्रि विश्राम से पूर्व शल्यवध
की सूचना वाला श्लोक नहीं है। अतः उसे क्षेपक माना जा सकता है। देवर्षि
द्वारा प्राप्त सूचना शल्यवध के बाद उसी दिन हो सकती है, अतः उसे प्रामा-
णिक मानने में कोई आपत्ति नहीं है।
अथवा अठारह दिनों तक लगातार युद्ध और ‘पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते
भविष्यति’ इस महर्षि वेदव्यास के वाक्य को देखते हुए शल्यवध सम्बन्धी
वचन सत्य नहीं माना जा सकता। कदाचित् क्षेपक सिद्ध न भी हो सके तो
गौणार्थ की कल्पना इस तरह कर लेनी चाहिये—
श्रीकृष्ण प्रेरित धर्मराज ने जब सायंकाल शल्यवध का निश्चय कर लिया,
तब धर्म और ब्रह्म को प्रमाण मानने वाले दैवज्ञ ब्राह्मणों की दृष्टि में वह
मारा ही जा चुका। जैसे कृष्ण भगवान् से मारे हुओं को ही अर्जुन ने मारा,
वैसे ही श्रीभगवान् के अमोघ प्रताप से समन्वित निज संकल्प के प्रभाव से उसी
समय मारे ही गये शल्य को ही प्रत्यक्ष युद्ध में धर्मराज ने मारा।
इस तरह उन्नीस दिनों तक युद्ध की बात और द्रोणनिधन से दुर्योधन
निधन तक अवकाशयुक्त युद्ध की बात निःसार सिद्ध होती है।
इसी सन्दर्भ में यह भी समझ लेना चाहिये कि द्रोणाचार्य के नेतृत्व में
लगातार युद्ध हुआ—
( ९३ )
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता ।
तस्य चाह्निभागेन क्षयं जग्मुः पतत्त्रिणः ॥
( द्रोण० १९१।९ )
अतः अभिमन्युवध के बाद जयद्रथवध से पूर्व अवकाश मानना अर्जुन की
अमोघ प्रतिज्ञा को और संजय के उक्त वचन को मिथ्या सिद्ध करना है । जो
किसी प्रकार उचित सिद्ध किया ही नहीं जा सकता ।
अभिमन्युवध जो कि द्रोणाचार्य के नेतृत्व में तेरहवें दिन हुआ, उसके
बाद चौदहवें दिन अवकाश इसलिये भी संभव नहीं था, क्योंकि अर्जुन ने रात
बीतने के बाद दूसरे ही दिन सूर्यास्त तक जयद्रथवध की घोर प्रतिज्ञा कर ही
ली थी—
धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः ।
ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम् ॥
यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम् ।
इमां चाप्यपरां भूयः प्रतिज्ञां मे निबोधत ॥
यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुपयास्यति ।
इहैव सम्प्रवेष्टाऽहं ज्वलितं जातवेदसम् ॥
( द्रोणपर्व ७३।४५-४७ )
'ऊपर जिन पापियों का नाम मैंने गिनाया है तथा जिन दूसरे पापियों
का नाम नहीं गिनाया है, उनको जो दुर्गति प्राप्त होती है, उसी को शीघ्र ही
मैं भी प्राप्त करूँ; यदि यह रात बीतने पर कल जयद्रथ को न मार डालूँ ॥'
'अब आप लोग मेरी यह दूसरी प्रतिज्ञा भी पुनः सुन लें । यदि इस पापी
जयद्रथ के मारे जाने से पहले ही सूर्यदेव अस्ताचल को पहुँच जायेंगे तो मैं यहीं
प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा ॥'
अभिमन्युवध के दिन ही अर्जुन की प्रतिज्ञा मानना और एक दिन युद्ध बन्द
रखना, श्रीकृष्णार्जुन दोनों को मिथ्याभाषी सिद्ध करना है । भगवान् श्रीकृष्ण
ने उसी रात देवी सुभद्रा से कहा —
( ९४ )
यत् पार्थेन प्रतिज्ञातं तत् तथा न तदन्यथा ।
चिकीर्षितं हि ते भर्तुर्न भवेज्जातु निष्फलम् ।।
यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा
रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च ।
रणगतमभियान्ति सिन्धुराजं
न स भविता सह तैरपि प्रभाते ॥
( द्रोण० ७७।२५, २६ )
'अर्जुन ने जिस बात के लिए प्रतिज्ञा कर ली है, वह उसी रूप में पूर्ण
होगी । उसे कोई पलट नहीं सकता । तुम्हारे स्वामी जो कुछ करना चाहते हैं,
वह कभी निष्फल नहीं होता ।।'
'यदि मनुष्य, नाग, पिशाच, निशाचर, पक्षी, देवता और असुर भी रण-
क्षेत्र में आये हुए सिन्धुराज जयद्रथ की सहायता के लिए आ जायें तो भी वह
कल उन सहायकों के साथ ही जीवन से हाथ धो बैठेगा ।।'
वीर अर्जुन की प्रतिज्ञा के अनुरूप ही उसी रात श्री भगवान् का उक्त
वचन होना चाहिये, तभी पार्थ की प्रतिज्ञा सत्य सिद्ध होगी ।
अर्जुन की प्रतिज्ञा से संत्रस्त स्वयं जयद्रथ का वचन भी इसमें प्रमाण है—
मामसौ पुत्रहन्तेति श्वोऽभियाता धनञ्जयः ।
प्रतिज्ञातो हि सेनाया मध्ये तेन वधो मम ॥
तां न देवा न गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः ।
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥
( द्रोण० ७५।१३, १४ )
'राजन् मुझे अपने पुत्र का घातक समझकर अर्जुन कल सबेरे मुझपर
आक्रमण करने वाला है, क्योंकि उसने अपनी सेना के बीच में मेरे वध की
प्रतिज्ञा की है ।।'
'सव्यसाची अर्जुन की उस प्रतिज्ञा को देवता, गन्धर्व, असुर, नाग और
राक्षस भी अन्यथा नहीं कर सकते ।।'
( ९५ )
प्रतिज्ञा के अनन्तर ही अर्जुन के गाण्डीव धनुष की टंकार से, श्रीकृष्णार्जुन
के दिव्य शङ्खघोष से तथा पाण्डव वीरों के सिंहनाद से संत्रस्त कौरव-गुप्तचरों
द्वारा पार्थ की जयद्रथवध सम्बन्धी प्रतिज्ञा सुनने से पूर्व यह समझकर कि
अभिमन्युवध के समाचार से क्रुद्ध अर्जुन रात्रि में ही युद्ध के लिए निकल
पड़ेंगे, युद्ध की तैयारी करने लगे । ( द्रोणपर्व ७५।६-८ )
इतना ही नहीं, जब संग्राम भूमि से श्रीकृष्णार्जुन शिविर की ओर आ
रहे थे तब अभिमन्युवध से प्रसन्न घमण्ड में भरे धृतराष्ट्र के पुत्रों का उन्होंने
सिंहनाद सुना । अभिमन्युवध का ज्ञान न होने पर भी पार्थ का हृदय धड़क-
धड़क कर विधाता की ओर से उसे किसी अनर्थ की सूचना दे रहा था । इधर
युयुत्सु को कौरववीरों की भर्त्सना करते श्रीकृष्ण भगवान् ने सुना । परन्तु
उन्होंने अर्जुन को उस समय कुछ नहीं बताया । केवल इतना कहा कि तुम्हारे
अपशकुन का फल कोई और ही अमंगल हो सकता है, भाइयों की ओर से
निश्चिन्त रहो ।
बाद में जब अर्जुन ने शिविर में अभिमन्यु को नहीं देखा और सभी भाइयों
को अत्यन्त व्यथित देखा तथा श्रीकृष्ण ने भी युयुत्सु द्वारा कौरवों को उपालम्भ
( उलाहना ) का समाचार कह सुनाया, तब अर्जुन ने कहा--
किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वया कृष्ण रणे मम ॥
अधाक्षं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान् महारथान् ।
( द्रोण० ७२।६४, ६४३ )
"श्रीकृष्ण ! आपने रणक्षेत्र में ही यह बात मुझसे क्यों नहीं बता दी ?
मैं उसी समय उन समस्त क्रूर महारथियों को जलाकर भस्म कर डालता ।"
उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि जो अर्जुन युद्धभूमि में अभिमन्युवध का
समाचार सुन लेते तो शत्रुओं को उसी समय युद्ध में भस्म कर देते तथा जिनके
कष्ट और क्रोध का स्मरण कर कौरव रात्रियुद्ध की संभावना से संत्रस्त एवं
सतर्क हो गये थे, ऐसी स्थिति में सत्यवादी अर्जुन क्या एक दिन युद्ध को
विश्राम देकर निज प्रतिज्ञा भंग कर सकते थे, कदापि नहीं । अतः जिसे प्रो०
( ९६ )
कवीश्वर युद्ध विराम या अवकाश का स्पष्ट उल्लेख बताते हैं, वह तो युद्ध का
ज्वलन्त सन्देश है ।
यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि 'तां निशां दुःख शोकार्तौ .... ....'
( द्रोण० ७७।१ ) इस वचन से उस रात्रि का संक्षिप्त परिचय मिलता है ।
आगे सायंकाल से रात्रि भर की घटनाओं का क्रमिक वर्णन है । 'निद्रा नैवो-
पलेभाते वासुदेव धनञ्जयौ ।' यह पंक्ति यद्यपि यह सिद्ध करती है कि रात्रि
भर श्रीकृष्ण और अर्जुन सोये नहीं, आगे दोनों के शयन का वर्णन मिलता
है, अतः पहले श्लोक को ज्यों-का-त्यों प्रमाण मान कर आगे की घटना दूसरे
दिन ओर दूसरी रात की है, ऐसा श्रीकवीश्वर सिद्ध करना चाहते हैं ।
परन्तु वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है । यह तो महा कवि की काल सम्बन्धी कूट-
शैली है । अतः यहाँ श्रीकृष्णार्जुन के रात्रि भर न सोने में—'देवी सुभद्रा
को सान्त्वना प्रदान करने तक' यह संकोचक प्रमाण है। अर्थात् शोक संतप्त
होने के कारण श्रीकृष्णार्जुन रात्रि में अधिक समय तक जागे ही रहे । अर्जुन
की प्रार्थना पर ( द्रोण० ७७।११ ) जब श्री भगवान् बहन सुभद्रा को सान्त्वना
दे चुके, तब दोनों वीर सोये ।
कवीश्वर का इस सन्दर्भ में यह भी कहना है कि अभिमन्युवध के बाद
जयद्रथवध की प्रतिज्ञा वाली रात्रि के पश्चात् अवकाश दिन में सूर्योदय के
समय जब श्री कृष्णार्जुन संतप्त थे, तब अनेकों अपशकुन हो रहे थे; जिसका
विवेचन द्रोणपर्व ७७।२-८ में विस्तार पूर्वक है ।
इस पर हमारा यह कहना है कि ग्रन्थकार ने समय निर्धारण के लिये
दो संकेत प्रदान किये हैं । 'स कबन्धस्तथाऽऽदित्ये परिधिः समदृश्यत' ( द्रोण०
७७।३ ) इस प्रथम निर्देश से यह निर्णय होता है कि दिन का समय था,
रात्रि का नहीं । 'नरनारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः स वासवाः ।' ( द्रोण०
७७।२ ) 'नर नारायण ( अर्जुन और श्रीकृष्ण ) के क्रुद्ध होने ....' इस
द्वितीय सन्देश से यह निश्चय होता है कि अभिमन्युवध का समाचार सुनकर
भयंकर प्रतिज्ञा कर श्रीकृष्णार्जुन द्वारा क्रुद्ध होकर शंख बजाने के समय
सायंकाल था, उसी समय सूर्य कबन्ध ( मस्तकहीन शरीराकृति ) से घिर
( ९७ )
गया, त्रिलोकी संत्रस्त हुई । वाहन मल-मूत्र करने और रोने लगे । समुद्र
क्षुब्ध हो गये । पृथिवी कांपने लगी । भूत-प्रेतादि नाचने लगे ।
अथवा जिस समय श्रीकृष्णार्जुन विजय सूचक शुभ शकुनों को अनुभव
करते हुए युद्धभूमि में पहुँचे, सूर्योदय का समय उपस्थित हो रहा था ।
दोनों वीरों ने क्रुद्ध होकर शंख बजाये । उस समय भी अपशकुन प्रकट होने
लगे । आकाश से भयंकर गर्जना के साथ सहस्रों जलती हुई उल्काएँ गिरने
लगीं और सारी पृथिवी कांपने लगी । 'श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्य-
साचिन:' (अर्जुन की प्रतिज्ञा सुन कर) यह लक्षण भी दोनों समय घटित
होते हैं । अर्जुन को अत्यन्त प्रसन्न होकर युद्धभूमि में प्रवेश करते देखकर भी
सभी उनकी प्रतिज्ञा को जान सकते हैं और रात्रि युद्ध की आशंका से युद्ध
के लिये उद्यत होते समय गुप्तचरों से भी पार्थ की प्रतिज्ञा सुनकर सभी त्रस्त
हो सकते हैं । युद्धकाल उपस्थित होने पर अपशकुनों का स्पष्ट वर्णन द्रोण०
८४।२५; ८८।४-६ में है ।
'सायाह्ने', 'ततो निशाया दिवसस्य चाशिवः शिवारुतैः सन्घिरवर्तताद्भुतः ।,
कुशेशयापीडनिभे दिवाकरे विलम्बमानेऽस्तमुपेत्य पर्वताम्, 'प्रियां तनुं भानु-
रुपैति पावकम्' (द्रोण० ५०।१-४) 'ततः सन्ध्यामुपास्यैव वीरो वीराव-
सादने' (द्रोण० ७२।८) आदि उक्तियों से अर्जुन की प्रतिज्ञा का समय
'सायाह्न सिद्ध होता है । प्रातः काल कदापि नहीं ।
परन्तु 'तां निशां दुःख शोकार्तौ' (द्रोण० ७७।१) से प्रतिज्ञा वाली रात्रि
का पहले संक्षिप्त परिचय देकर 'नर नारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः स वासवाः ।
श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः' (द्रोण० ७०।२-८) तक युद्धभूमि
में श्रीकृष्णार्जुन के प्रयाण का निर्देश कर महाकवि ने अभिमन्युवध वाली रात्रि
का विस्तार पूर्वक वर्णन करने की इच्छा से आगे का प्रसंग उपस्थापित करते
हुए 'अथ कृष्णं·········' कहा है, ऐसा मानना ही समीचीन है ।
श्रीभीष्माचार्य के नेतृत्व में रात्रि विश्राम के बाद युद्ध का सर्वत्र उल्लेख
भी अवकाश युक्त युद्ध की कल्पना के सर्वथा विरुद्ध ही है--
७
( ९८ )
ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत ।
अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत् संध्याकाले च वर्तति ॥
( भीष्म० ५४।४३ )
'भारत ! इस प्रकार सूर्यं के अस्ताचल को चले जाने पर संध्या के समय
आपकी और पाण्डवों की सेनाएँ लौट आयीं ।।'
प्रभातायां च शर्वर्यां भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
अनीकान्यनुसंयाने व्यादिदेशाथ भारत ॥
( भीष्म० ५६।१ )
'भारत ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने
अपनी सेनाओं को युद्धभूमि में चलने का आदेश दिया ।।'
इति ब्रुवन्तः शिबिराणि जग्मुः सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥
उल्कासहस्रैश्च सुसम्प्रदीप्तैर्विभ्राजमानैश्च यथा प्रदीपैः ।
किरीटिवित्रासितसर्वयोधा चक्रे निवेशं ध्वजिनी कुरूणाम् ॥
( भीष्म० ५९।१३८-१३९ )
'भारत ! उपर्युक्त बातें कहते हुए आपके समस्त सैनिक सहस्रों जलती हुई
मसालें तथा प्रकाशमान दीपों के उजाले में अपने-अपने शिबिर में गये । कौरव
सेना के सम्पूर्ण सैनिकों पर अर्जुन का त्रास छा रहा था। इसी अवस्था में उस
सेना ने रात्रिविश्राम किया ।।'
व्युष्टां दिशां भारत भारतानामनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा ।
ययौ सपत्नान् प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण बलेन भीष्मः ॥
( भीष्म० ६०।१ )
'भारत ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भरतवंशियों की सेना के
अग्रभाग में स्थित हुए महामना भीष्म समग्रसेना से घिरकर शत्रुओं से युद्ध
करने के लिए चले। उस समय उनके मन में शत्रुओं के प्रति बड़ा
क्रोध था ।।'
चतुर्थ दिन के युद्ध में भीष्माचार्य के निम्नलिखित वचन से उनके नेतृत्व
में अवकाशयुक्त युद्ध का स्पष्ट ही खण्डन होता है—
ए
( ९९ )
तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकाशिभिः ।
घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥
( भीष्म० ६४।७७ )
'इसलिए विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों के साथ इस समय युद्ध
करना मुझे पसन्द नहीं आता। आज युद्ध का विराम घोषित कर दिया जाय।
कल सबेरे हमलोग शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे ।।'
व्युषितायां च शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे ।
उभे सेने महाराज युद्धायैव समीयतुः ॥
( भीष्म० ६९।१ )
'महाराज ! वह रात बीतने पर जब सूर्योदय हुआ, तब दोनों ओर की
सेनाएँ आमने-सामने आकर युद्ध के लिए डट गयीं ।।'
कवीश्वर के मत में मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को आठवें दिनका युद्ध
था। कौरव युद्धभूमि में पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होते थे। इसलिए
रात्रि के प्रारंभ में स्वच्छ चन्द्रप्रकाश के सामने से उनके ऊपर आ रहा था
और इसलिए उनकी स्वयं की छाया पीछे अनुचरों पर गिरकर अन्धेरा हो गया,
वे ठीक प्रकार से नहीं दिखने लगे और छाया भी एक-दो की नहीं, अपितु
अगणित हाथी, रथादि से युक्त विशाल सेना की।
परन्तु उक्त कल्पना सर्वथा निराधार है। इस न्याय से तो शुक्ल पक्ष की
अधिक प्रकाश वाली तिथियों में युद्ध सर्वथा ही असंभव मानना चाहिये । आठवें
दिन के अवहार ( युद्ध विराम ) का विवरण महाभारत में इस प्रकार है--
रात्रिः समभवत् तत्र नापश्याम ततोऽनुगान् ।
ततोऽवहारं सैन्यानां चक्रुः कुरुपाण्डवाः ॥
रजनीमुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये ।
अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः ।
न्यविशन्त यथाकालं गत्वा स्वशिविरं तदा ॥
( भीष्म० ९६।७९।८० )
'रात हो गयी थी। हमें अपने सैनिक नहीं दिखाई दे रहे थे, तब कौरव
एवं पाण्डवों ने अपनी-अपनी सेना को लौटने का आदेश दे दिया ।।'
( १०० )
'फिर उस महाभयानक तथा अत्यन्त रौद्र रूपवाले प्रदोष काल में कौरव
तथा पाण्डव एक साथ अपनी सेनाओं को लौटाकर यथा समय शिविर में जा
पहुँचे और विश्राम करने लगे ॥'
उक्त उद्धरणों से सिद्ध है कि आठवें दिन का युद्ध कृष्णपक्ष में हुआ ।
इतना ही नहीं, महाभारत के अनुसार पूर्व दिशा की ओर पाण्डवों का मुख
सिद्ध होता है न कि कौरवों का—
पश्चिन्मुखाः कुरवो धार्तराष्ट्राः
स्थिताः पार्थाः प्राङ्मुखा योत्स्यमानाः ।
( भीष्म० २०।४३½ )
'आपके पुत्र—कौरवों का मुख पश्चिम दिशा की ओर था और कुन्ती के
पुत्र उनसे युद्ध करने के लिए पूर्वाभिमुख खड़े थे ॥'
महारथौघविपुलः समुद्र इव घोषवान् ।
भीष्मेण धार्तराष्ट्राणां व्यूहः प्रत्यङ् मुखो युधि ॥
( भीष्म० २०।१९ )
'भीष्म द्वारा रचित कौरव सेना का वह व्यूह महारथियों के समुदाय से
सम्पन्न हो, समुद्र के समान गर्जना करता था । युद्ध में उसका मुख पश्चिम की
ओर था ॥'
अभियाय तु दुर्धर्षां धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् ।
प्राङ् मुख पश्चिमेभागे न्यविशन्त ससैनिकाः ॥ ( भीष्म० १।५ )
'पाण्डवों के योधा लोग अपने-अपने सैनिकों के सहित धार्तराष्ट्रों की
दुर्धर्ष सेना के सम्मुख जाकर पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख होकर ठहर गये थे ।'
ते समेत्य यथान्यायं धार्तराष्ट्रा महाबलाः ।
कुरुक्षेत्रस्य पश्चार्धे व्यपतिष्ठन्त दंशिताः ॥
( उद्योग० १९५।११ )
'धृतराष्ट्र के वे महाबली पुत्र रणक्षेत्र में जाकर सुसज्जित हो कुरुक्षेत्र के
पश्चिम भाग में यथोचित रूप से खड़े हुए ।'
कवीश्वरजी का यह भी कहना गलत है कि शल्याभिषेक के दिन अवकाश
अवश्य था । यद्यपि हिमालयन पर ही अभिषेक का उल्लेख है, तथापि लग-
( १०१ )
[ल]भग सोलह मील की दूरी पर स्थित धर्मराज ने बिना दूत के अभिषेककालीन
शब्द को कैसे सुना ? साथ ही जब सायंकाल मरे हुए कर्ण को कौरव-पाण्डव
दीपों के प्रकाश में देख रहे थे, तब उसके कई घंटे बाद हिमालयान् पर होने वाले
शब्द सुन कर भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मराज को शल्य वध के लिए सायंकाल
प्रेरित कैसे किया ? अतः :
एतावदुक्त्वा वचनं केशवः परवीरहा ।
जगाम शिबिरं सायं पूज्यमानोऽथ पाण्डवैः ॥
( शल्य० ७।४२ )
'शत्रुवीरों का संहार करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण यह बात कह कर सायं-
काल पाण्डवों से सम्मानित हो अपने शिबिर में चले गये ।'
इन श्लोक में प्रयुक्त 'सायं' का अर्थ कर्णवध के दूसरे दिन सायंकाल ही
संभव है । अतः कर्ण वध के बाद शल्याभिषेक के उपलक्ष में एक दिन का
अवकाश मानना चाहिये । क्योंकि इसका यह उत्तर स्पष्ट हैं कि जिस तरह
दुर्योधन वध में दुर्योधन के भगने, संजय का उससे मिलने, उसका
( १०२ )
इसी तरह श्रीव्यासजी द्वारा की गयी भविष्य वाणी का रहस्योद्घाटन
पहले ही किया जा चुका है । कर्ण वध के दिन पहले ही भगवान् श्रीकृष्ण ने
अर्जुन को सावधान करते हुए कहा—आज तुम्हारे हाथों कर्ण का वध
होना है । इसी प्रकार दुर्योधन के धराशायी होने पर धर्मराज प्रेरित श्री
कृष्ण ने हस्तिनापुर में देवी गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र को सान्त्वना देने
के अनन्तर सहसा कुरुक्षेत्र के लिये प्रस्थान करना चाहा और उन्होंने श्रीवेद-
व्यासजी के सम्मुख कहा—'आज अश्वत्थामा पाण्डवों का नाश करना चाहता
है, अतः उनकी रक्षा के लिये मुझे अति शीघ्र चलना है ।'
अस्तु ! क्योंकि विधाता के विधान में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा ही शल्यवध
होना था, अतः दिव्यदर्शी धर्मराज ने भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से हिमाल-
यान पर हो रहे शल्याभिषेक का शब्द सुना ।
स्वयं युधिष्ठिर ने अनुस्मृति विद्या के प्रसङ्ग में उनकी दिव्यदर्शिता का
रहस्योद्घाटन किया है—
देवर्षिर्लोमशो दृष्टस्ततः प्राप्तोऽस्म्यनुस्मृतिम् ।
दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तम् ज्ञानयोगेन वै पुरा ॥
( स्त्रीपर्व २६।२० )
'तीर्थ यात्रा के प्रसङ्ग में देवर्षि लोमश का दर्शन हुआ था । उन्हीं से
मैने यह अनुस्मृति विद्या प्राप्त की थी । इसके अतिरिक्त, पूर्वकाल में ज्ञानयोग
के प्रभाव से मुझे दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो गयी थी ।'
जब द्रोणाचार्य दिव्यवपु ब्रह्मलोक के लिए उत्क्रमण कर रहे थे, तब दिव्य-
दर्शी धर्मराज ने भी उनका दर्शन किया—
ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते ।
वयमेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः ॥
योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् ।
अहं धनंजयः पार्थो कृपः शारद्वतस्तथा ॥
वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः ।
अन्ये तु सर्वे नापश्यन् भारद्वाजस्य धीमतः ।
महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः ॥
( द्रोण० १९२।५५½—५८½ )
( १०३ )
‘अपमान से धृष्टद्युम्न के मोहित हो जाने पर द्रोणाचार्य के ब्रह्मलोक जाते
समय मैं ( संजय ), कुन्तीपुत्र अर्जुन, शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य, वृष्णिवंशी
भगवान् श्रीकृष्ण तथा धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर—इन पांच मनुष्यों ने ही
योगयुक्त महात्मा द्रोण को परम धाम की ओर जाते देखा था। अन्य सब लोगों
ने योगयुक्त हो ऊर्ध्वगति को जाते हुए बुद्धिमान् द्रोणाचार्य की महिमा का
साक्षात्कार नहीं किया ॥'
इस तरह कवीश्वरजी ने जो अवकाश की सिद्धि में प्रमाण प्रस्तुत किये हैं,
वे सब अवकाश न होने में वज्रहेतु हैं। पन्द्रहवें दिन के बाद एक-एक दिन
अवकाश और शल्यवध के दूसरे दिन दुर्योधनवध की बात कौन कहे, केवल एक
अवकाश मानने पर भी—‘पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति' द्रो० प०
१८३।६५, यह व्यास वचन सर्वथा खण्डित होता है।
इतना ही नहीं, चित्रा नक्षत्र में मार्गशीर्ष की अमावास्या मानने के कारण
आद्योपान्त तिथि और नक्षत्र का योग असन्तुलित होता है। पुष्य में मार्गशीर्ष
कृष्ण सप्तमी मानने के कारण कार्तिकी पूर्णिमा अश्विनी में सिद्ध होती है ।
इसी तरह कृत्तिका में मार्गशीर्ष की पूर्णिमा मानना भी अनुचित है ।
इतना ही नहीं, एक ओर तो मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष में दो तिथियों का क्षय
माना है, दूसरी ओर एक नक्षत्र की वृद्धि भी मानी है। यह सब अनर्थ चित्रा
को ऐन्द्र नक्षत्र मानने से हुआ है ।
कवीश्वर ने भीष्म निर्वाण सम्बन्धी दो वचनों की सार्थकता पर कोई
ध्यान ही नहीं दिया है। इनके मत में भीष्माचार्य के पास श्रीकृष्ण सहित
पाण्डव माघ शुक्ला नवमी को पहुँचते हैं। ऐसा मानने पर ‘पञ्चाशतं षट्' का
अर्थ--नवमी सहित पूर्णिमा तक सात दिन अथवा दशमी से पूर्णिमा तक
छह दिन सिद्ध होता है। ये दशमी से पूर्णिमा तक उपदेश मानते हैं। परन्तु ऐसी
स्थिति में तो ‘उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे' के अनुसार उपदेश
श्रवण के पश्चात् पाण्डवों के हस्तिनापुर में निवास सम्बन्धी वचन ही निरर्थक
सिद्ध हो जाता है। यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि श्रीभगवान् के 'सप्तमा-
च्छापिदिवसादमावास्या भविष्यति' ( उद्योग० १४९।१८ ) इस वचन को
( १०४ )
अक्षरशः सत्य सिद्ध करने के लिए ही श्रीकवीश्वर ने अवकाशयुक्त सिद्ध करने
की असम्भव कल्पनाएँ करने का साहस किया है, उन्हीं भगवान् के 'पञ्चाशतं
षट् च' ( शान्ति० ५१।१४ ) इस वचन पर मौन धारण कर लिया है ।
साथ ही कवीश्वर पूर्णिमा की उत्तर रात्रि में तीन मुहूर्त रात्रि शेष रहने
पर भीष्म जी का देहत्याग मानते हैं । परन्तु ऐसा मानने पर 'त्रिभागशेषः' का
प्रसंगानुसार प्राप्त महत्त्व ही लुप्त होता है ।
डाक्टर काणे एवं दफ्तरी आदि ने मार्गशीर्ष अमावास्या से पौषकृष्ण
द्वितीया तक लगातार युद्ध माना है। परन्तु ऐसा मानने पर भी श्रवण को
युद्धान्त संभव नहीं । साथ ही आठवें, नवें, ग्यारहवें दिन के युद्ध में शुक्ल
सप्तमी, अष्टमी और दशमी सिद्ध होती है। परन्तु महाभारत में इन दिनों
सायंकाल अन्धकार का वर्णन है। चौदहवें दिन शुक्ल त्रयोदशी होने के कारण
उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय वाला वचन भी निष्फल जाता है ।
फिर भी इन विचारकों के प्रयास की सराहना है । किन्तु हैं सारे-के-सारे
विचार तथ्यहीन ही ।
उपसंहार
महाभारत में समग्र सृष्टि का रस और रहस्य सन्निहित है । इसमें अनेक
प्राचीनतम इतिहास भी सन्निहित हैं । साथ ही रचयिता—महर्षि श्रीकृष्ण
द्वैपायन वेदव्यास ने निज बन्धु-बान्धवों और सगे-सम्बन्धियों ( कौरव-पाण्डवों )
का मार्मिक इतिहास भी इसमें ग्रथित किया है । अभिप्राय यह कि महाभारत
में वर्णित कौरव-पाण्डव का इतिहास एक दृष्टि से श्रीवेदव्यास के निज परिवार
का ही इतिहास समझना चाहिये । अतः इस पारिवारिक इतिहास को इतिहास
न समझ कर आधुनिक उपन्यासों की तरह काल्पनिक मानना सर्वथा अनुचित
है । ऐसा मानने पर तो लेखक के जन्म-कर्म और उससे संबद्ध चरित्र सभी
मिथ्या सिद्ध होते हैं। इस प्रकार की अनर्गल कल्पना सर्वथा अशोभनीय है ।
महाभारत को प्रमाण मानकर ही इस पर प्रामाणिक विचार कर्तव्य है ।
॥ इति शम् ॥