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जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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५२ सटीकजातकपारिजाते-
शुक्रः—समततरुचिराङ्गः = समततं = तुल्यदैर्घ्यविस्तारं, रुचिरं=मनोज्ञशङ्गं यस्येति ।
अन्यत्स्पष्टम् ।
शनिः—काठिन्यरोमावयवः = कठिनलोमवान् कठिनावयववांश्च । पीनद्विजः = स्थूल-
दन्तः । अन्यत्सुगमम् ।
तमः=राहुः—बुद्धिरतः = बुद्धिशीलोऽलसः = दीर्घसूत्री चेति ।
प्रयोजनञ्च—जन्मनि बलीयान् ग्रह आत्मानुरूपं जातकं करोति ॥ ५३-५९ ॥
सूर्य—प्रतापशाली, चतुरस्र, श्यामयुक्तलाल अङ्गवाला, मधुके सदृश पीले नेत्रवाला,
पित्तप्रकृति, थोड़े बालसे सुन्दर और सत्त्वगुण-प्रधान है ॥ ५३ ॥
चन्द्रमा—संचारशील, मृदुवाणीवाला, विवेकी, शुभदृष्टिवाला, रमणीय स्थिर अङ्गवाला,
सदा बुद्धिमान्, गोलशरीरवाला, कफ और वात प्रकृतिवाला है ॥ ५४ ॥
मङ्गल-पापदृष्टि, युवाशरीर, उदारशील, पित्त प्रकृतिवाला, चञ्चल, पतली कमर,
लालसे युक्त गौर रुचिर अङ्ग, प्रतापी, कामी और तमो गुणी है ॥ ५५ ॥
बुध—दूर्वाके सदृश हरितवर्ण शरीरवाला, स्पष्ट वक्ता, पतला शरीर, रजो गुणवाले का
स्वामी, हास्यमें अत्यन्त प्रिय, हानिके प्रिय, सुन्दर शरीर, पित्त-कफ और वातप्रकृतिवाला,
सद्यः प्रताप विभवशाली और विद्वान् है ॥ ५६ ॥
बृहस्पति—लम्बा पेट और शरीरवाला, पीतवर्ण, कफप्रकृतिवाला, समस्त गुणोंसे युक्त,
सब शास्त्रके अधिकारी, कपिल रङ्गके बाल तथा नेत्रवाला, सात्त्विक, अत्यन्त बुद्धिमान्,
बड़े राजचिह्नोंसे सम्पन्न, और लक्ष्मीको धारण करनेवाला है ॥ ५७ ॥
शुक्र—काले और टेढ़े बालवाला, श्यामवर्ण, सुन्दरतायुक्त, समरुचिर अङ्गवाला, शुभ-
दृष्टि, कामी, विशेष वात-कफ प्रकृतिवाला, राजसस्वभाव, लक्ष्मीका स्थान, सुख, बड़ों
और गुणों का समूह है ॥ ५८ ॥
कठिन रोमावलीवाला, कृशाङ्ग, दूर्वाके सदृश श्यामवर्ण, कफ और वात प्रकृतिवाला,
मोटे दांत, सुन्दर पीले आँखवाला, तामस बुद्धि और आलसी है ॥ ५९ ॥
इतरयोगे ग्रहाणां वृद्धिमत्ता ।
अर्केण मन्दः, शनिना महीसुतः, कुजेन जीवो गुरुणा निशाकरः ॥
सोमेन शुक्रोऽसुरमन्त्रिणा बुधो बुधेन चन्द्रः खलु वर्द्धते सदा ॥ ६० ॥
इदानीं ग्रहाणां द्वयर्योगे वृद्धिमत्तोच्यन्ते । अर्केण = सूर्येण सह मन्दः = शनिः सदा
वर्द्धते । सूर्यशन्योर्योगे शनेरस्तदोषो न भवति किन्तु तदानीं शनिर्बलीयान् भवति ! एवं
शनिना सह महीसुतः = मङ्गलो वर्द्धते । शेषं स्पष्टमिति ॥ ६० ॥
सूर्यसे शनि, शनिसे मंगल, मङ्गलसे बृहस्पति, बृहस्पतिसे, चन्द्रमा, चन्द्रमासे शुक्र,
शुक्रसे बुध, बुधसे चन्द्रमा सदा बढ़ते हैं । अर्थात् सूर्यके साथ शनिका बल बढ़ता है । शनि
के साथ मङ्गलका बल बढ़ता है। एवं मङ्गलके साथ गुरुका, गुरुके द्वारा चन्द्रमाका, चन्द्रमा
के द्वारा शुक्रका शुक्रके द्वारा बुधका और बुधके द्वारा चन्द्रमाका बल बढ़ता है ॥ ६० ॥
अथ ग्रहाणां स्थानबलविशेषः ।
स्त्रोच्चस्वकीयभवनस्वदृगाणहोरावांशांकोद्गयनेषु दिनस्य मध्ये ।
राशिप्रवेशसमये सुहृदंशकादौ मेपूरणे दिनमणिर्बलवान्जलम् ॥ ६१ ॥
चन्द्रः कर्कणि गोपतौ निजदिनद्रेक्काणहोरांशके
राश्यन्ते शुभवीक्षणे निशि सुखे याम्यायने वीर्यवान् ॥
इन्दुः सर्वकलाधरो यदि बली सर्वत्र सन्धि विना
सर्वव्योमचरैरचित्तस्तु कुरुते भूपालयोगं नृणाम् ॥ ६२ ॥