जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरिष्टाध्यायः ॥४॥ १०३
अथ चतुर्थवर्षे मरणम् ।
षष्ठाष्टमे कर्कणि जन्मलग्नात् सौम्ये सुधारश्मिनिरीक्ष्यमाणे ॥
अब्दैश्चतुर्भिः समुपैति नाशं जातो नरः सर्वबलान्वितोऽपि ॥ ४२ ॥
४ वर्षायुः
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| \ | लग्नं. / |
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| \ | / चं. |
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| +--------+--------+ |
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| \ ४बु. / \ ४बु. / |
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कर्कराशिगते सौम्ये=बुधे जन्मलग्नात् षष्ठे-
ऽष्टमे वा विद्यमाने सुधारश्मिना = चन्द्रेण निरी-
क्ष्यमाणे = अवलोकिते जातो नरः सर्वबलान्वि-
तोऽपि यदि भवति तथापि चतुर्भिरब्दैः नाशं =
मृत्युं समुपैति । तथा सारावल्याम्—
"कर्कटधामनिसौम्यः षष्ठाष्टमसंस्थितो विलग्नर्क्षात् ।
चन्द्रेण दृष्टमूर्तिर्वर्षचतुष्केन मारयति ॥" इति ॥ ४२ ॥
कर्कका बुध जन्मलग्नसे छठें वा आठवेंमें हो उसको चन्द्रमा देखता हो तो जातक सर्व-
बल-सम्पन्न होनेपर भी चौथे वर्षमें मरे ॥ ४२ ॥
अथ पञ्चमेऽब्दे मरणम् ।
रविचन्द्रभौमगुरुभिः कुजगुरुसौरेन्दुभिः सहैकस्थैः ॥
रविशनिभौमशशाङ्कैर्मरणं खलु पञ्चभिर्वर्षैः ॥ ४३ ॥
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| \ ( १ ) / | \ / |
| \ र. चं. मं. बृ./ | \ / |
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| | ( २ ) | | | | |
| |मं.बृ.श.चं|पञ्चमाब्दे| | |
| | |मृत्युः | | |
+-----+---------+-----+-----+-------+-----+
| / \ | / \ |
| / ( ३ ) \ | / \ |
| / र. श. मं. चं.\ | / \ |
| / \ | / \ |
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यत्र कुत्रापि रविचन्द्रभौमगुरूणामेकत्र
योगे, अथ च कुजगुरुशनिचन्द्राणां योगे,
तथा च रविशनिभौमचन्द्राणां योगे खलु =
निश्चयेन पञ्चभिर्वर्षैर्मरणं भवति । अत्र-
"तिग्मांशुनीहारकरादनीज-
युक्तैः क्रमादेकगृहाश्रितैस्तैः ।
सूर्यात्मजेनाङ्गिरसा सितेन
स्यात्पञ्चता पञ्चभिरेव वर्षैः" इति गुणाकरः ४३
रवि-चन्द्र-मंगल-गुरु एकत्र हों, वा मंगल-गुरु-शनि-चन्द्रमा एकत्र हों वा रवि-
शनि-मंगल-चन्द्रमा एकत्र हों तो ५ वर्षमें बालककी मृत्यु करते हैं ॥ ४३ ॥
अथ षड्वर्षमायुः ।
यदा सुधारश्मिनवांशकस्थे निरीक्षिते शीतकरेण मन्दे ॥
लग्नाधिपे चन्द्रदृशा समेते जातस्य षड्वर्षमितं तदाऽऽयुः ॥ ४४ ॥
६ वर्षायुः
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| \ ३ | २ | १ / |
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| ४ \ | | / १२ |
| \ | | / |
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| | ५ चं. ११ शु.| |
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| | \ / | |
| ६ | \ / | १० |
| / \ ८ श. इं / \ |
| / \ / \ |
| / ७ \ / ९ \ |
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यदा = यस्मिन्काले, मन्दे = शनौ यत्र
कुत्रापि सुधारश्मेश्चन्द्रस्य नवांशकस्थे, शीत-
करेण = चन्द्रेण निरीक्षिते, लग्नाधिपे च
चन्द्रदृशा समेते ( चन्द्रदृष्ट इत्यर्थः ) सति
जन्म भवति, तदा जातस्य षड्वर्षमितमायु-
र्भवति । ततोऽनन्तरं म्रियते ॥ ४४ ॥
यदि शनि चन्द्रमाके नवांशमें हो उसे