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सर्वकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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४१४ [ २.६.२३४
२३४. असिताभू जातक
“त्वमेवदानिमकर ” यह शास्ता ने जेतवन मे बिहार करते समय एक
कुमारी के बारे म कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में दोनों प्रधान शिष्यो की सेवा करने वाले एक कुल मे एक
कुमारी थी—सुन्दर, सौभाग्यशाली। वह बडी होने पर अपनी बराबर की
जाति के कुल में गई। उसका स्वामी उसे कुछ न समझ किसी दूसरी जगह
ही आसक्त रहता। वह उसके अनादर का कुछ ख्याल न कर, दोनो श्रावको
को निमन्त्रित कर, महादान दे धर्मोपदेश सुनती हुई स्रोतापत्ति फल मे प्रतिष्ठित
हुई। उसके बाद से वह मार्ग-सुख तथा फल-सुख का आनन्द लेती हुई सोचने
लगी कि स्वामी भी मुझे नही चाहता और गृहस्थी से भी मुझे प्रयोजन नही।
में प्रव्रजित होऊँगी। वह मातापिता को कह, प्रव्रजित हो अर्हत्त्व को प्राप्त
हुई। उसकी यह करनी भिक्षुओ को ज्ञात हो गई।
एक दिनं भिक्षुओं ने धर्मसभा म बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक
कुल की लड़की सद्धर्म की खोज करने वाली है। उसने यह जान कि स्वामी
उसे नही चहता है, प्रधान शिष्यो का धर्मोपदेश सुन, स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित
हो, फिर मातापिता की आज्ञा ले, प्रव्रजित हो अर्हत्व प्राप्त किया। ऐसी
है वह सद्धर्म की खोज करने वाली लडकी। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ,
बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—
.भिक्षुओ, यह कुलकुमारी केवल अभी सद्धर्म की खोज करने वाली रही है.
यह पहले भी सद्धर्म की खोज करने वाली ही रही है। इतना कह पूर्व-जन्म
की कथा कही—