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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३७८ [ २.८.२२२
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने उस आदमी को यह बात कह, 'इसके बाद इधर
न आना, यदि आया तो तेरी जान नहीं बचेगी' डराकर भगा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय हाथी मारने वाला आदमी देवदत्त था। दलपति मैं ही था।
२२२. चुल्लनन्दिय जातक
"इध तवाचरियवचो..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
एक दिन धर्मसभा में भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! देवदत्त
कठोर है, परुष है, दुस्साहसी है, सम्यक्-सम्बुद्ध को मारने वाले नियुक्त किए,
उन पर दुश्शीलता का आरोप लगाया, नालागिरि (हाथी) का प्रयोग किया,
तथागत के प्रति उसकी शान्ति, मैत्री, दया कुछ भी नहीं।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो? अमुक बातचीत। 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त कठोर, परुष तथा
दयाहीन है, वह पहले भी कठोर, परुष तथा दयाहीन ही रहा है' कह पूर्व-जन्म
की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय प्रदेश में नन्दिय नामक वानर हुए। उनके छोटे भाई का नाम था
चुल्लनन्दिय। वे दोनो अस्सी हजार वानरों के नेता हो हिमालय प्रदेश में अन्धी
माता की सेवा करते हुए रहते थे। वे माता को झाड़ी में सुला स्वयं जंगल
में जा वहाँ से मीठे मीठे फल ले माता के पास भेजते। लाने वाले उसे न देते।
वह भूख से पीडित हो हड्डी-चर्म मात्र रह गई।