सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

चन्दाभ ] ८७
१३५. चन्दाभ जातक
“चन्दाभं...”, यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
सङ्कस्स नगर के द्वार पर स्थविर की प्रश्न-की-व्याख्या के ही बारे में कही—
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने
एकात जगल में मृत्यु को प्राप्त होने के समय शिष्यो के पूछने पर चन्दाभं सुरि-
याभं कहा। वह मरकर आभस्वर लोक में उत्पन्न हुए। तपस्वियो ने ज्येष्ठ-
शिष्य की बात पर विश्वास नहीं किया। बोधिसत्त्व ने आकर आकाश में उप-
स्थित हो यह गाथा कही—
चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय गाधति,
अवितक्केन झानेन होति आभस्सरूपगो ॥
[ जो प्रज्ञा से सूर्याभा तथा चन्द्राभा पर स्थिर होता है। वह वितर्क-
रहित ध्यान से आभस्वर-लोक में उत्पन्न होता है। ]
चन्दाभं का मतलब है श्वेत-कसिण। सुरियाभं का पीत-कसिण।
योघ पञ्ञाय गाधति, जो आदमी इस ससार में इन दोनो कसिणों की प्रज्ञा से
भावना करता है, उन्हें आलम्बन बनाकर उनमें प्रवेश करता है, उनमें प्रतिष्ठित
होता है। अथवा चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय भावति, जहाँ तक सूर्य
तथा चन्द्रमा की आभा फैली है, उस सारे स्थान में परिभाग-कसित¹ को बढाकर
उसी को आलंबन बनाकर ध्यान का अभ्यास करनेवाला दोनों आभाओ की प्रज्ञा
से भावना करता है। इसलिए यह भी ठीक अर्थ है। वितक्केन झानेन होति
¹परिभाग-कसिण=पटिभाग निमित्त (अभिधम्मत्य संगहो ६।१८)