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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

३. पौड़ी ११-२०: पञ्च परवाण, कुदरत व करम महिमा

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साधना में लीन रह कर मन को आसक्तियों से मुक्त रखते हैं।
असंख्य ऐसे भक्तजन हैं जो उस गुणी निरंकार के गुणों को विचार
कर ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। असंख्य सत्य को जानने वाले
अथवा परमार्थ-पथ पर चलने वाले तथा दानी सज्जन हैं। असंख्य
शूरवीर रणभूमि में शत्रु का सामना करते हुए शस्त्रों की मार सहते
हैं। असंख्य मानव जीव मौन धारण करके एकाग्रचित होकर उस
अकाल-पुरुष में लिवलीन रहते हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि
कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे
अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक
नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे
पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं॥१७ ॥
असंख मूरख अंध घोर ॥
असंख चोर हरामखोर ॥
असंख अमर कर जाहे जोर ॥
असंख गलवढ हत्या कमाहे ॥
असंख पापी पाप कर जाहे ॥
असंख कूड़िआर कूड़े फिराहे ॥
असंख मलेछ मल भख खाहे ॥
असंख निंदक सिर करह भार ॥
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नानक नीच कहै वीचार ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुध भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामत निरंकार ॥१८॥
इस सृष्टि में असंख्य मनुष्य विमूढ़ तथा गहन अज्ञानी हैं। असंख्य
चोर तथा अभक्ष्य खाने वाले हैं, जो दूसरों का माल चुरा कर खाते
हैं। असंख्य ही ऐसे हैं जो अन्य लोगों पर जब्र-जुल्म से अत्याचार
का शासन करके इस संसार को त्याग जाते हैं। असंख्य अधर्मी
मनुष्य जो दूसरों का गला काट कर हत्या का पाप कमा रहे हैं।
असंख्य ही पापी इस संसार से पाप करते हुए चले जाते हैं।
असंख्य ही झूठा स्वभाव रखने वाले मिथ्या वचन बोलते फिरते
हैं। असंख्य मानव ऐसे हैं जो मलिन बुद्धि होने के कारण विष्टा का
भोजन खाते हैं। असंख्य लोग दूसरों की निन्दा करके अपने सिर
पर पाप का बोझ रखते हैं। श्री गुरु नानक देव जी स्वयं को निम्न
कहते हुए फरमाते हैं कि हमने तो कुकर्मी जीवों अर्थात् तामसी व
आसुरी सम्पदा वाली सृष्टि का कथन किया है। हे अनन्त स्वरूप !
मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे
भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा
शाश्वत रूप हैं॥ १८॥
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असंख नाव असंख थाव ॥
अगम अगम असंख लोअ ॥
असंख कहह सिर भार होए ॥
अखरी नाम अखरी सालाह ॥
अखरी ज्ञान गीत गुण गाह ॥
अखरी लिखण बोलण बाण ॥
अखरा सिर संजोग वखाण ॥
जिन एहे लिखे तिस सिर नाहे ॥
जिव फुरमाए तेव तेव पाहे ॥
जेता कीता तेता नाओ ॥
विण नावै नाही को थाओ ॥
कुदरत कवण कहा वीचार ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुध भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामत निरंकार ॥१९॥
उस सृजनहार की सृष्टि में असंख्य ही नाम तथा असंख्य ही स्थान
वाले जीव विचरन कर रहे हैं; अथवा इस सृष्टि में अकाल-पुरुष के
अनेकानेक नाम हैं तथा अनेकानेक ही स्थान हैं, जहाँ पर
परमात्मा का वास रहता है। असंख्य ही अकल्पनीय लोक हैं।
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किन्तु जो मनुष्य उसकी रचना का गणित करते हुए 'असंख्य'
शब्द का प्रयोग करते हैं उनके सिर पर भी भार पड़ता है। शब्दों
द्वारा ही उस निरंकार के नाम को जपा जा सकता है, शब्दों से ही
उसका गुणगान किया जा सकता है। परमात्मा के गुणों का ज्ञान
भी शब्दों द्वारा हो सकता है तथा उसकी प्रशंसा भी शब्दों द्वारा ही
कही जा सकती है। शब्दों द्वारा ही उसकी वाणी को लिखा व
बोला जा सकता है। शब्दों द्वारा मस्तिष्क पर लिखे गए कर्मों को
बताया जा सकता है। किन्तु जिस निरंकार ने यह कर्म लेख लिखे
हैं उसके मस्तिष्क पर कोई कर्म-लेख नहीं है; अर्थात्-उसके कर्मों
को न तो कोई कह सकता है और न उनका हिसाब रख सकता है।
अकाल-पुरुष जिस प्रकार मनुष्य के कर्मों के अनुसार आदेश
करता है, वैसे ही वह अपने कर्मों को भोगता है। सृजनहार ने इस
सृष्टि का जितना प्रसार किया है, वह समस्त नाम-रूप ही है। कोई
भी स्थान उसके नाम से रिक्त नहीं है। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि
कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे
अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक
नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे
पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं।। १९ ।।

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भरीऐ हथ पैर तन देह ॥
पाणी धोतै उतरस खेह ॥
मूत पलीती कपड़ होए ॥
दे साबूण लईऐ ओहो धोए ॥
भरीऐ मत पापा कै संग ॥
ओहो धोपै नावै कै रंग ॥
पुंनी पापी आखण नाहे ॥
कर कर करणा लिख लै जाहो ॥
आपे बीज आपे ही खाहो ॥
नानक हुकमी आवहो जाहो ॥२०॥
यदि यह शरीर, हाथ-पैर अथवा कोई अन्य अंग मलिन हो जाए
तो पानी से धो लेने से उसकी गन्दगी व मिट्टी साफ हो जाती है।
यदि कोई वस्त्र पेशाब आदि से अपवित्र हो जाए तो उसे साबुन के
साथ धो लिया जाता है। यदि मनुष्य की बुद्धि दुष्कर्मों के करने से
मलिन हो जाए तो वह वाहिगुरु के नाम का सिमरन करने से ही
पवित्र हो सकती है। पुण्य और पाप मात्र कहने को ही नहीं हैं।
अपितु इस संसार में रहकर जैसे-जैसे कर्म किए जाएँगे वही
धर्मराज द्वारा भेजे गए चित्र-गुप्त लिख कर ले जाएँगे ; अर्थात्
मानव जीव द्वारा इस धरती पर किए जाने वाले प्रत्येक अच्छे व
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बुरे कर्मो का हिसाब उसके साथ ही जाएगा, जिसके फलानुसार
उसे स्वर्ग अथवा नरक की प्राप्ति होगी। सो मनुष्य स्वयं ही कर्म
बीज बीजता है और स्वयं ही उसका फल प्राप्त करता है। गुरु
नानक का कथन है की जीव इस संसार में अपने कर्मो का फल
भोगने हेतु अकाल-पुरुष के आदेश से आता जाता रहेगा ; अर्थात्
जीव के कर्म उसे आवागमन के चक्र में ही रखेंगे, निरंकार जीव
के कर्मों के अनुसार ही उसके फल की आज्ञा करेगा ॥ २०॥
तीरथ तप दया दत दान ॥
जे को पावै तेल का मान ॥
सुणेआ मंनिआ मन कीता भाओ ॥
अंतरगत तीरथ मल नाओ ॥
सभ गुण तेरे मै नाही कोए ॥
विण गुण कीते भगत न होए ॥
सुअसत आथ बाणी बरमाओ ॥
सत सुहाण सदा मन चाओ ॥
कवण सु वेला वखत कवण कवण थित कवण वार ॥
कवण सि रुती माहो कवण जित होआ आकार ॥
वेल न पाईआ पंडती जे होवै लेख पुराण ॥
वखत न पाइओ कादीआ जे लिखन लेख कुराण ॥
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थित वार ना जोगी जाणै रुत माहो ना कोई ॥
जा करता सिरठी कओ साजे आपे जाणै सोई ॥
किव कर आखा किव सालाही किओ वरनी किव जाणा ॥
नानक आखण सभ को आखै इक दू इक सिआणा ॥
वडा साहिब वडी नाई कीता जा का होवै ॥
नानक जे को आपौ जाणै अगै गया न सोहै ॥२१॥
तीर्थ-यात्रा, तप-साधना, जीवों पर दया-भाव करके तथा निःस्वार्थ
दान देने से ; यदि कोई मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है तो वह अति
लघु होता है। किन्तु जिन्होंने परमेश्वर के नाम को मन में प्रीत
करके सुना व उसका निरन्तर चिन्तन किया है। उन्होंने अपने अंतर
के तीर्थ का मानो स्नान कर लिया और अपनी मलिनता को दूर
कर लिया। (अर्थात् उस जीव ने अपने हृदय में बसे हुए निरंकार में
लीन होकर अपनी अन्तरात्मा की मैल को साफ कर लिया है।) हे
सर्गुण स्वरूप ! समस्त गुण आप में हैं, मुझ में शुभ-गुण कोई भी
नहीं है। सदाचार के गुणों को धारण किए बिना परमेश्वर की भक्ति
भी नहीं हो सकती। हे निरंकार ! तुम्हारी सदा जय हो, तुम
कल्याण स्वरूप हो, ब्रह्म रूप हो। तुम सत्य हो, चेतन्य हो और
सदैव आनन्द स्वरूप हो। परमात्मा ने यह सृष्टि जब पैदा की थी
तब कौन-सा समय, कौन-सा वक्त, कौन-सी तारीख, तथा कौन-
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सा दिन था। तब कौन-सी ऋतु, कौन-सा महीना था, जब यह
प्रसार हुआ था, यह सब कौन जानता है। सृष्टि के प्रसार का
निश्चित समय महा विद्वान, ऋषि-मुनि आदि भी नहीं जान पाए,
यदि वे जान पाते तो निश्चय ही उन्होंने वेदों अथवा धर्म-ग्रन्थों में
इसका उल्लेख किया होता। इस समय का ज्ञान तो काजियों को
भी नहीं हो पाया, यदि उन्हें पता होता तो वे कुरान आदि में इसका
उल्लेख अवश्य करते। इस सृष्टि की रचना का दिन, वार, ऋतु व
महीना आदि कोई योगी भी नहीं जान पाया है। इसके बारे में तो
जो इस जगत् का रचयिता है वह स्वयं ही जान सकता है कि इस
सृष्टि का प्रसार कब किया गया। मैं किस प्रकार उस अकाल पुरुष
के कौतुक को कहूँ, कैसे उसकी प्रशंसा करूँ, किस प्रकार वर्णन
करूँ और कैसे उसके भेद को जान सकता हूँ ? सतगुरु जी कहते
हैं कि कहने को तो हर कोई एक दूसरे से अधिक बुद्धिमान बनकर
उस परमात्मा की श्लाघा को कहता है। किंतु परमेश्वर महान् है,
उसका नाम उससे भी महान् है, सृष्टि में जो भी हो रहा है वह सब
उसके किए से ही हो रहा है। हे नानक ! यदि कोई उसके गुणों को
जानने की बात कहता है तो वह परलोक में जाकर शोभा प्राप्त
नहीं करता। अर्थात यदि कोई जीव उस अभेद निरंकार के
गुणात्मक रहस्य को जानने का अभिमान करता है तो उसे इस
लोक में तो क्या परलोक में भी सम्मान नहीं मिलता ॥ २१ ॥

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पाताला पाताल लख आगासा आगास ॥
ओड़क ओड़क भाल थके वेद कहन इक वात ॥
सहस अठारह कहन कतेबा असुलू इक धात ॥
लेखा होए त लिखीऐ लेखै होए विणास ॥
नानक वडा आखीऐ आपे जाणै आप ॥२२॥
सतगुरु जी जन-साधारण के मन में सात आकाश व सात पाताल
होने के संशय की निवृति करते हुए कहते हैं कि सृष्टि की रचना में
पाताल-दर-पाताल लाखों ही हैं तथा आकाश-दर-आकाश भी
लाखों ही हैं। वेद-ग्रंथों में भी यही एक बात कही गई है कि ढूंढने
वाले इसको अंतरिम छोर तक ढूंढ कर थक गए हैं किंतु इनका
अंत किसी ने नहीं पाया है। सभी धर्म ग्रन्थों में अठारह हजार
जगत् होने की बात कही गई है परंतु वास्तव में इनका मूल एक ही
परमेश्वर है जो कि इनका स्रष्टा है। यदि उसकी सृष्टि का लेखा हो
सके तो कोई लिखे, किंतु यह लेखा करने वाला स्वयं नष्ट हो
जाता है। हे नानक ! जिस सृजनहार को इस सम्पूर्ण जगत् में महान
कहा जा रहा है वह स्वयं को स्वयं ही जानता है अथवा जान
सकता है॥ २२ ॥
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सालाही सालाहे एती सुरत न पाईआ ॥
नदीआ अतै वाह पवह समुंद न जाणीअहे ॥
समुंद साह सुलतान गिरहा सेती माल धन ॥
कीड़ी तुल न होवनी जे तिस मनहो न वीसरहे ॥२३॥
स्तुति करने वाले साधकों ने भी उस परमात्मा की स्तुति करके
उसकी सीमा को नहीं पाया। जैसे नदियां-नाले समुद्र में मिलकर
उसका अथाह अंत नहीं पा सकते, बल्कि अपना अस्तित्व भी
खो लेते हैं, वैसे ही स्तुति करने वाले स्तुति करते-करते उसमें ही
लीन हो जाते हैं। समुद्रों की शाह, शहंशाह होकर, पर्वत समान
धन-सम्पत्ति के मालिक होकर भी, उस चींटी के समान नहीं हो
सकते, यदि उनके मन से परमेश्वर विस्मृत नहीं हुआ होता ॥ २३॥
अंत न सिफती कहण न अंत ॥
अंत न करणै देण न अंत ॥
अंत न वेखण सुणण न अंत ॥
अंत न जापै किआ मन मंत ॥
अंत न जापै कीता आकार ॥
अंत न जापै पारावार ॥
अंत कारण केते बिललाहे ॥
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ता के अंत न पाए जाहे ॥
एहो अंत न जाणै कोए ॥
बहुता कहीऐ बहुता होए ॥
वडा साहिब ऊचा थाओ ॥
ऊचे उपर ऊचा नाओ ॥
एवड ऊचा होवै कोए ॥
तिस ऊचे कओ जाणै सोए ॥
जेवड आप जाणै आप आप ॥
नानक नदरी करमी दात ॥२४॥
उस निरंकार की स्तुति करने की कोई सीमा नहीं तथा कहने से भी
उसकी प्रशंसा का अन्त नहीं हो सकता । सृजनहार द्वारा रची गई
सृष्टि का भी कोई अन्त नहीं परंतु जब वह देता है तब भी उसका
कोई अन्त नहीं है । उसके देखने व सुनने का भी अन्त नहीं है,
अर्थात्-वह निरंकार सर्वद्रष्टा व सर्वश्रोता है । ईश्वर के हृदय का
रहस्य क्या है, उसका बोध भी नहीं हो सकता । इस सृष्टि का
प्रसार जो उसने किया उसकी अवधि अथवा सीमा को भी नहीं
जाना जा सकता । उसके आदि व अन्त को भी नहीं जाना जा
सकता । अनेकानेक जीव उसका अन्त पाने के लिए बिलखते
फिर रहे हैं । किन्तु उस अथाह, अनन्त अकाल पुरुष का अंत नहीं

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पाया जा सकता। उसके गुणों का अन्त कहाँ होता है यह कोई
नहीं जान सकता। उस पारब्रह्म की प्रशंसा, स्तुति, आकार
अथवा गुणों को जितना कहा जाता है वह उतने ही अधिक होते
जाते हैं। निरंकार सर्वश्रेष्ठ है, उसका स्थान सर्वोच्च है। किन्तु उस
सर्वश्रेष्ठ निरंकार का नाम महानतम है। यदि कोई शक्ति उससे
बड़ी अथवा ऊँची है, तो वह ही उस सर्वोच्च मालिक को जान
सकती है। निरंकार अपना सर्वस्व स्वयं ही जानता है अथवा जान
सकता है, अन्य कोई नहीं। सतिगुरु नानक देव जी का कथन है
कि वह कृपासागर जीवों पर करुणा करके उनके कर्मों के अनुसार
उन्हें समस्त पदार्थ प्रदान करता है॥ २४॥
बहुता करम लिखिआ ना जाए ॥
वडा दाता तेल न तमाए ॥
केते मंगहे जोध अपार ॥
केतेआ गणत नही वीचार ॥
केते खप तुटहे वेकार ॥
केते लै लै मुकर पाहे ॥
केते मूरख खाही खाहे ॥
केतेआ दूख भूख सद मार ॥
एहे भि दात तेरी दातार ॥
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