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सर्वकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

JAPJI SAHIB HINDI
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सा दिन था। तब कौन-सी ऋतु, कौन-सा महीना था, जब यह
प्रसार हुआ था, यह सब कौन जानता है। सृष्टि के प्रसार का
निश्चित समय महा विद्वान, ऋषि-मुनि आदि भी नहीं जान पाए,
यदि वे जान पाते तो निश्चय ही उन्होंने वेदों अथवा धर्म-ग्रन्थों में
इसका उल्लेख किया होता। इस समय का ज्ञान तो काजियों को
भी नहीं हो पाया, यदि उन्हें पता होता तो वे कुरान आदि में इसका
उल्लेख अवश्य करते। इस सृष्टि की रचना का दिन, वार, ऋतु व
महीना आदि कोई योगी भी नहीं जान पाया है। इसके बारे में तो
जो इस जगत् का रचयिता है वह स्वयं ही जान सकता है कि इस
सृष्टि का प्रसार कब किया गया। मैं किस प्रकार उस अकाल पुरुष
के कौतुक को कहूँ, कैसे उसकी प्रशंसा करूँ, किस प्रकार वर्णन
करूँ और कैसे उसके भेद को जान सकता हूँ ? सतगुरु जी कहते
हैं कि कहने को तो हर कोई एक दूसरे से अधिक बुद्धिमान बनकर
उस परमात्मा की श्लाघा को कहता है। किंतु परमेश्वर महान् है,
उसका नाम उससे भी महान् है, सृष्टि में जो भी हो रहा है वह सब
उसके किए से ही हो रहा है। हे नानक ! यदि कोई उसके गुणों को
जानने की बात कहता है तो वह परलोक में जाकर शोभा प्राप्त
नहीं करता। अर्थात यदि कोई जीव उस अभेद निरंकार के
गुणात्मक रहस्य को जानने का अभिमान करता है तो उसे इस
लोक में तो क्या परलोक में भी सम्मान नहीं मिलता ॥ २१ ॥

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