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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

२४४ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-११
निर्हेतुके भिन्नहेतुके च कार्ये वाच्यम् । उभयत्रापि च हेतुकृतैव व्यवस्था; स्वहेतुत एव हि शिंशपा
वृक्षस्वभावाव्यभिचारिणी जाता, स्वहेतुतश्च हुतभुग्धूमजननस्वभावः, तदिदानीं नियत्युल्लङ्घिनि
कार्यकारणभावे सर्वमिदं विघटेत । योगीच्छया हि शिंशपापि अवृक्षस्वभावा भवेत्, धूमे तु द्विगुणं
चोद्यम्; अग्न्यादिसामग्री योगीच्छोद्भूता धूमं न जनयेत्, योगीच्छा वा अनग्निकं धूमम्,—इति
न स्यादनुमानम्, अस्ति च तल्लोके, इत्याशङ्कयाह—
योगिनिर्माणताभावे प्रमाणान्तरनिश्चिते ।
कार्यं हेतुः स्वभावो वात एवोत्पत्तिमूलजः ॥ ११ ॥
योगीच्छापि सर्वथा तादृशमेव न तु वृश्चिकगोमयादिसंभूतवृश्चिकादिन्यायेन कथंचित्
रसवीर्यादिना भिन्नं कार्यं जनयति,—इति यत् कथितमत एवास्मादेव हेतोः कार्यं वा धूमादि
अग्न्यनुमाने, शिंशपात्वादित्वस्वभावो वा वृक्षत्वाद्यनुमाने एवं हेतुर्भवति, यदि प्रमाणान्तरेण लोक-
प्रसिद्ध्या योगिनिर्माणत्वस्याभावो निश्चितो भवति नान्यथा; अत एवानुमाने जन्मान्तराभ्यास-
लोकप्रसिद्ध्यादिकमवश्योपजीव्यम् । सा च श्रुतानुमानप्रज्ञयोर्बीजम्,—इति च ऋतंभराविषयमु-
हेतुक के कार्य में ऐसा ही कहना पड़ेगा । दोनों स्थलों में हेतु के द्वारा ही व्यवस्था होगी; अपने
हेतु से ही शिंशपा वृक्ष स्वभाव को छोड़ सकती है, धूम में यही दूना कह सकते हैं, योगी की
इच्छा से उत्पन्न होनेवाली अग्नि इत्यादि सामग्री धूम नहीं उत्पन्न कर सकती और यह अनुमान
भी नहीं बन सकता है । लोक में तो यह होता है कि अग्नि से धूम निकलता है, ऐसी आशङ्का
करके कहते हैं कि—
योगी की इच्छा से निर्माण न होने पर दूसरे प्रमाण से ही कार्य निश्चित होता है । इसलिए
कार्य हेतु या स्वभाव मूल उत्पत्ति से उत्पन्न होता है ।। ११ ।।
इस प्रकार योगी की इच्छा भी सर्वथा ऐसी नहीं होती है । जैसा कि गोबर से वृश्चिक उत्पन्न
होता है, उसी प्रकार रस-वीर्यादि से भिन्न वृश्चिक को उत्पन्न कर देते हैं, हमारे कहे हुए हेतु से
धूमादि कार्य अग्नि के अनुमान में एवं वृक्षत्व के अनुमान में शिंशपादि स्वभाव हेतु होता है,
यदि दूसरे प्रमाण से लोक सिद्धिपूर्वक ही वस्तु का निर्माण हो जाय तो उसमें योगी की इच्छा
का अभाव ही रहता है । अन्यथा नहीं होता; इसलिए दूसरे जन्म में लोक प्रसिद्धि के द्वारा किये
हुए अभ्यासों के संस्कार का उपभोग अवश्य करना चाहिए । वह श्रुतानुमान और प्रज्ञा का बीज
है, इसलिए योगसूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' समाहित चित्त की जो प्रज्ञा है
वह ऋतम्भरा प्रज्ञा बुद्धि है । उस दशा में वस्तु की यथार्थता को देनेवाली बुद्धि का उदय होता
है । इन्द्रियों के साथ अर्थों का सम्बन्ध होकर जो प्रत्यक्ष विषय होता है, उसको माननेवाले दूसरे
१. ऋतम्भरा समाधि प्रज्ञा 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' । तस्मिन् समाहितचित्तस्य या प्रज्ञा जायते तस्या
ऋतम्भरेति संज्ञा भवति अन्वर्था च सा सत्यमेव बिभर्ति न च तत्र विपर्यासगन्धोऽप्यस्तीति तथोक्तम्—
'आगमेनानुमानेन तथाभ्यासरसेन च । त्रिधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ।।' सा पुनः 'श्रुतानुमान-
प्राज्ञभ्यामन्यविषया विशेषार्थविषयत्वात्' श्रुतमागमविज्ञानं तत्सामान्यविषयं नहि आगमेन शक्यो
विशेषोऽभिधातुं कस्मात् नहि विशेषेण कृतसंकेतः शब्दः तथानुमानं सामान्यविषयमेव यत्र प्राप्तिस्तत्र
गतिः यत्र न प्राप्तिस्तत्र गतिरपि न भवतीति तस्मात् श्रुतानुमान-विषये विशेषो न कश्चिदस्तीति । न

अ.-२, आ.-४, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४५
वाच पतञ्जलिः । अन्ये च यौक्तिका योगिप्रत्यक्षकल्पप्रत्यक्षसद्भावं समस्तवस्तुग्रहणाय कल्पित-
वन्तः । सांव्यवहारिके च प्रमाणे नास्माकं भरः; प्रकृतं हि अस्माकमीश्वरस्वरूपं, तच्च स्वप्रका-
शमेवान्यप्रमेयोपरोधेऽपि नोपरुध्यत, — इत्युक्तमसकृत् । ननु स्वभावहेतौ किमनया चिन्तया ?,
लोग हैं, योगी प्रत्यक्ष के सदृश्य प्रत्यक्ष प्रमाण को भी सब वस्तु पदार्थों के ग्रहण में कल्पना करते
हैं । इस प्रकार छः सन्निकर्षों से प्रत्यक्षादि विषय दृष्टिगत होता है, इस विषय में हम लोगों का
कोई भार नहीं है; क्योंकि हमें तो प्रकृत ईश्वर स्वरूप ही मान्य है और वह तो अपने स्वयं के
प्रकाश से प्रकाशित ही रहता है । किसी अन्य प्रमेय से अवरोध होने पर भी नहीं रुकता, ऐसा
चास्य विशेषस्या प्रामाणिकस्याभावोऽस्तोति समाधिप्रज्ञातिग्राह्य एव स विशेषो भवति भूतसूक्ष्मगतो वा
पुरुषगतो वा, न चास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टस्य वस्तुनो लोक प्रत्यक्षेण ग्रहणं तस्माच्छु तानुमानप्रज्ञाभ्या-
मन्यविषया सा प्रज्ञा विशेषार्थत्वादिति ।
यह पातञ्जल योग दर्शन में दिखाया गया है कि उस समाहित चित्त की अवस्था में जो बुद्धि
पैदा होती है उसे शास्त्र में ऋतम्भरा नाम से कहा जाता है तथा वह बुद्धि यथार्थ ज्ञानवाली मानी
जाती है, एवं सत्य को ही पालन करती है उसमें विपरीत ज्ञान की गन्ध थोड़ी सी भी नहीं मिलेगी
अर्थात् अविद्या से इसका कोई लगाव नहीं होता ।
आगमशास्त्र, अनुमान और ध्यानाभ्यास के बल से उत्पन्न रस द्वारा विचार विमर्श करता
हुआ उत्तमयोग की गति को प्राप्त कर लेता है । श्रुतिज्ञान और अनुमानज्ञान से व्यतिरिक्त विषयक
वह बुद्धि होती है । इसकी विशेषता है कि यह बुद्धि अर्थ को साक्षात् करने में समर्थ होती है ।
श्रुतिजन्य ज्ञान सामान्यरूप से तो पदार्थ का ज्ञान करानेवाला ही होता है । श्रुति ज्ञान अर्थात् आगम से
यथार्थ स्वरूप को बुद्धि धारण करने में असमर्थ है । क्यों ? विशेषरूप से अर्थ का शब्द के साथ संकेत
नहीं हुआ होता है वैसे ही अनुमान भी सामान्य विषयक बन जाता है । जहाँ तक हेतु की प्राप्ति है वहाँ
तक ही अनुमान की गति देखी जाती है उससे आगे नहीं हो सकती; क्योंकि हेतु से ही हेतुमान् का
बोध होता है । इसलिए श्रुत और अनुमान इन दोनों विषयों में विशेष अर्थ कुछ भी काम नहीं कर
सकता है । लौकिक वस्तु के प्रत्यक्ष से सूक्ष्म, आवृत्त [ ढका हुआ ] जो कि अत्यन्त परिश्रम से जानने
योग्य आत्मज्ञान का ग्रहण करना कठिन हो है और अनुमान तथा आगम प्रमाण से शून्य विशेष
पदार्थ-वस्तु का अभाव भी नहीं दिखता । समाहित बुद्धि के द्वारा निश्चय किया गया अर्थ ही विशेषार्थ
माना जाता है फिर वह ज्ञान सूक्ष्मभूतों का ही क्यों न हो अथवा पुरुष स्वरूप का हो । इसीलिए श्रुत
और अनुमान की बुद्धि से तो वह बुद्धि दूसरे अर्थ को विषय करनेवाली ही होती है जबकि यह
यथार्थता को ग्रहण करती है ।
१. नियम का ज्ञान सामान्य होता है, धूम और वह्नि के सहचार का प्रत्यक्ष और वह्नि के बिना धूम की
स्थिति नहीं पायी जाती है इन दोनों की सहायता से धूम वह्नि का व्याप्य है—ऐसा ज्ञान मन से होता
है । जबकि इस विषय में कहा भी गया है—
मनश्च सर्वविषयं केन वा नाभ्युपेयते ।
असंनिहितमप्यर्थमवधारयितुं क्षमम् ॥
मन तो जो असंहित विषय है उसका भी ग्रहण कर लेता है इसलिए उस सर्वविषयक मन को
कौन नहीं मानेगा अर्थात् सब को मानना ही पड़ेगा ।

२४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-११

आह-वृक्षत्वाव्यभिचारिण्याः शिंशपाया उत्पत्तेर्यन्मूलं कारणं तत एव स तन्मात्रानुबन्धी स्वभावो
जायते,-इति; ततश्च-'एकसामग्र्यधीनस्य रूपादे रसतो गतिः । हेतुधर्मानुमानेन धूमेन्धन-
विकारवत् ।।' इति स्वभावहेतुर्न्यायः । ननु च वृश्चिकादीनां कीटगोमयाद्यनेककारणस्त्वं तावत् दृष्टं,
रसवीर्यादिभेदस्तु तत्र,-इत्यन्यदेतत् । तद्योगिजन्यत्वमवह्निकस्यापि धूमस्य सह्यं नाम, स्वभावस्य
तु कथं विपर्याससंभावना । न हि नीलं सदेवानीलं योगीच्छया भवति,-इति कश्चित् प्रामाणिकः
प्रतीयात् । उच्यते । इह द्विविधो हि स्वभावहेतुरन्तर्लीनकार्यकारणभावस्तद्विपरीतश्च; वह्निमानयं
पर्वतो धूमवत्त्वात् इति, अनित्योऽयं कृतकत्वात् इति । तत्र आद्यस्य तावत् कार्यकारणभाव एव
मूलम्,-इति किं तत्रोच्यते । अपरस्तु विचार्यते, यदि तावत् कृतकत्वस्य कारणायत्तत्वं नाम
स्वभावः कथम् अभवनपरिच्छिन्नभवनस्वभावता नामानित्यत्वं स्वभावः स्यात् ? आभासभेदात् ।
अभेदे तु आभासस्य हेतुसिद्धावेव साध्यस्य सिद्धत्वात्, यदि परं व्यवहारः साध्यते, तरुरयं
वृक्षत्वात्,-इति न्यायेन व्यवहारश्च ज्ञानाभिधानात्मा कार्य एव, तत्रैव नियतिशक्तिरङ्गीकृता
हमने अनेक बार कहा भी है । अच्छा तो, इस पर शङ्का होती है कि इसमें स्वभाव ही हेतु है तो
अन्य चिन्ताओं से क्या प्रयोजन ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं कि वृक्षत्व युक्त शिंशपा की उत्पत्ति
में जो मूल कारण है उसी से शिंशपा मात्र सम्बन्ध रखनेवाला स्वभाव ही उत्पन्न होता है, इस
विषय में कहते भी हैं। एक सामग्री के अधीन होनेवाले रूपादि की रस से उत्पत्ति होती है। हेतु
धूम के अनुमान द्वारा जैसा कि धूम लकड़ी का विकार है । यही स्वभाव हेतु का न्याय है । पुनः
शङ्का करते हैं कि वृश्चिकादि की उत्पत्ति में भी कीट-गोबर आदि बहुत से कारण देखे गये हैं,
रस-वीर्यादि का भी भेद वहाँ पर होता है ये सब दूसरी बातें हैं । योगी से धूम उत्पन्न होता है वह
बिना अग्नि के भी हो सकता है, किन्तु स्वभाव का परिवर्तन नहीं होता । योगी की इच्छा से नील
पदार्थ है वह अनील नहीं हो सकता है; कोई भी प्रामाणिक व्यक्ति इस पर विश्वास नहीं रखेगा ।
इसका उत्तर देते हैं कि यहाँ पर स्वभाव के भी दो हेतु होते हैं; एक अन्तर्लीन कार्य-
कारणभाव और दूसरा उसके विरुद्ध जैसा कि यह पर्वत वह्निवाला है धूमवाला होने से, यह
अनित्य है उत्पत्ति शील होने के कारण । उसमें आद्य कार्य-कारणभाव ही मूल है-वहाँ फिर क्या
कहना । दूसरे पर विचार करते हैं, यदि कृतकत्व कारण के अधीन है तो वही स्वभाव हुआ नहीं
होने का स्वभाववाला वह होने को स्वभाववाला अनित्य कैसे होगा ? क्योंकि दोनों में आभास का
भेद है । अभेद में तो आभास का हेतु सिद्ध ही रहता है; क्योंकि सिद्ध में ही साध्य की सिद्धि
होती है, यदि दूसरा व्यापार सिद्ध करना हो, तो यह वृक्ष है, वृक्षत्व होने के कारण । इस न्याय
१. अभावेन हि धर्मेण तद्वत्ता धर्मिणः कथम् ।
अभावग्रहवेलायां धर्मिणोऽनुपलम्भनात् ॥
अभावरूप धर्म से धर्मी को अभाववाला नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि अभाव के ज्ञान काल में
धर्मी का ज्ञान नहीं होता है अर्थात् अभाव ज्ञानकाल में धर्मी का ज्ञान नहीं होने के कारण यह
अभाववान् है ऐसा कहना असंभव हो जाता है ।
२. साध्या नुमिति वेलायां न चास्ति नियमग्रहः ।
नियमग्रहकाले च न साध्यमनुमी तया॥

अ.-२, आ.-४, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४७

भवतापि । तस्मात् सर्वेषु स्वभावहेतुष्वाभासभेदं विना व्यवहारमात्रसाधनमेव, हेत्वाभासमयत्वा-
देवानधिको हि तत्र साध्याभासो, व्यावृत्तोनामेषैव वार्ता, सामान्यानामियमैव सरणिः। तस्मात्
नियतिशक्त्यायत्तः शिंशपाभासवृक्षाभासयोः पूर्बनीत्या सामानाधिकरण्याभासो हेतुबलात् । ततः
स्वभावोऽयं हेतुहेतुमद्भावमूल एव, तत एव सामान्येनेदमुक्तं द्रष्टव्यं—सर्वः स्वभावहेतुरुत्पत्ति-
मूलजः,—इति । आभासा एव च वस्तु,—इति च समर्थितं प्राक् । ततश्च शिंशपायामेकस्यामेव
सृज्यमानायां शाखादिपदार्थान्तराणामसृष्टेर्वृक्षाभासस्य सामान्यात्मनः साध्यस्य नामापि नास्ति,—
इति संभाव्यत एव । यत्तु तदेकरूपं विशिष्टं वृक्षत्वं तत् खलु शिंशपात्वमेव तच्च सिद्धम्,—इति
से व्यवहार भी ज्ञानाभिधानरूप होकर कार्य के रूप में ही सिद्ध हो जायेगा, वहाँ पर ही नियति-
शक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा, यह तो आप को भी अभीष्ट है ।
इसलिए सभी स्वभाव हेतुओं में आभास भेद के बिना ही व्यवहार मात्र के लिए साधन
माना जाता है, [ अभेद में भी आभास का व्यवहार मात्र के लिए ही भेद का व्यपदेश किया हुआ
होता है ] हेत्वाभासमय होने के कारण साध्याभास कोई अधिक नहीं होता, विशेष पदार्थों में
अभेद भासित होने पर भी भेद की कल्पना व्यवहार साधनार्थ मात्र होतो है, सामान्य पदार्थों के
लिए भी यही मार्ग है ।
इसलिए नियति शक्ति के अधीन ही शिंशपाभास और वृक्षाभास इन्हीं दोनों की पूर्व नीति
के अनुसार सामानाधिकरण्य आभास हेतु के बल से होता है। इसलिए यह स्वभाव हेतुहेतु-
मद्भावमूलक ही होता है। इसी कारण सामान्यरूप से कहे हुए को ही देखना चाहिए कि
स्वभाव हेतु उत्पत्तिपूर्वक ही होता है, आभास पदार्थ ही वस्तु हैं। इसका हमने पूर्व में ही समर्थन
कर दिया है इससे जब एक शिंशपा में बनायी जायेगी तब तो शाखा प्रभृति अन्य पदार्थों और
वृक्षाभास में सामान्यतः साध्य का नाम भी नहीं रहता है, यह ठीक ही है। एक रूप विशिष्ट वृक्ष
तेन गृहीतपूर्वः सन्निदानों स्मृतिगोचरः । नियमः प्रतिप्रत्यङ्गं तथावगतिदर्शनात् ॥
साध्य [ वह्निरूप ] की अनुमिति काल में व्याप्ति ज्ञान [ यत्र-यत्र धूमस्तत्र-तत्र वह्निरिति
साहचर्य-नियमो व्याप्तिः ] के काल में अनुमान नहीं होता है । इसी कारण पहले से ग्रहण की हुई
होने पर अभी इस समय स्मर्यमाण विषयक जो व्याप्ति है वही अनुमिति में कारण होती है; क्योंकि
वैसी अवगति देखी भी जाती है ।
१. इस विषय में नैयायिकों ने कहा है—
तस्मिन्सत्येव भवनं न विना भवनं ततः ।
अयमेवाविनाभावो नियमः सहचारिता ॥
किं कुतो नियमोऽस्यास्मिन्निति चेन्नैवमुत्तरम् ।
तदात्मतादिपक्षे तु नैष प्रश्नो निवर्तते ॥
ज्वलनाज्जायते धूमो न जलादिति का गति ।
तर्कस्य यावान् विषयः स तावति निरूप्यते ॥
वस्तुस्वभावभेदे तु न तस्य प्रभविष्णुता ।
अयं च विषयो युक्तं यदुक्तं नियमाद्विना ॥
नार्थादर्थान्तरे ज्ञानमतस्तस्य प्रकल्पनम् ।

४. तत्त्व-संग्रह अधिकार: प्रत्यभिज्ञा-फल, जीवन्मुक्ति एवं महाभाष्य उपसंहार

२४८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१२
न साध्यम् । कारणायत्तमिदम्,–इत्याभासेऽपि न स्यादनित्यताभासः। एवमर्थक्रियाकारित्वा-
भावेऽपि क्षणिकत्वाभासाभावः,–इति नियत्यपेक्षयैव सर्वे स्वभावहेतवो नान्यथा,–इत्येकान्त
एषः ॥ ११ ॥
नन्वाभासवस्तुत्ववादेऽनाभातस्य अग्नेरवस्तुत्वम्,–इत्यनाभातेन कथं धूमो जन्यते,
ततश्च धूमादग्नेः कारणस्य कथमनुमानम् ? इत्याशङ्क्य समर्थयितुमाह–
भूयस्तत्तत्प्रमात्रेकवह्नयाभासादितो भवेत् ।
परोक्षादप्यधिपतेर्धूमाभासादि नूतनम् ॥ १२ ॥
कार्यमव्यभिचार्यस्य लिङ्गम्············
का स्वरूप है, वह तो सिद्ध शिंशपात्व ही है, किन्तु वह साध्य नहीं है । यह तो कारण के अधीन
रहता है, इस प्रकार आभास में भी अनित्यता का आभास नहीं होता । एवं अक्षणिकवादी तार्किकों
के मत में नियति-शक्ति का समर्थन कर क्षणिकवादी के मत में भी प्रसंग वशात् समर्थन करते हैं
कि अर्थक्रियाकारिता के न रहने पर भी क्षणिकत्व के आभास का अभाव ही रहेगा । सभी स्वभावों
के हेतु नियति-शक्ति की अपेक्षा से ही होते हैं अन्यथा नहीं होते, यह एक दृढ पक्ष है ॥ ११ ॥
अब शङ्का करते हैं कि जब आभास ही वस्तु है तो इस पक्ष में जो अनाभातरूप अग्नि
है वह भी अवस्तु हो जायेगी । अत एव अनाभात अग्नि से कैसे धूम उत्पन्न होंगे और इसके बाद
धूम से अग्नि का अनुमान कैसे करोगे ? ऐसी आशङ्का कर समर्थन के लिए अब कहते हैं—
उन-उन प्रमाताओं के द्वारा एक ही वह्नि के आभास से धूम का अनुमान भूयो व्याप्ति के
इसलिए यह सिद्ध होता है—
पञ्चलक्षणकाल्लिङ्गाद्गृहीतान्नियमस्मृतेः ।
परोक्षे लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानं प्रचक्षते ॥
उसके रहने पर ही यह उत्पन्न होता है, न रहने पर नहीं होगा इसी का नाम अविनाभाव
नियम है जैसे मिट्टी के बिना घट का निर्माण नहीं हो सकता । इसमें हेतु क्या है—कारण के रहने पर
ही कार्य का उत्पन्न होना और न रहने पर नहीं होना यही नियम है । यह क्यों है ? इस आशङ्का का
उत्तर देते हैं—इस नियम में वस्तु अपना स्वभाव छोड़कर कोई दूसरा कारण नहीं बन जाती है ।
आप जो तादात्म्य को इस नियम का कारण मानते हैं । वह ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष में अग्नि से
धूम का उत्पन्न होना तो संगत भी है किन्तु जल से धूम का उत्पन्न होना कहीं नहीं देखा जाता है, क्यों ?
इसका कोई समाधान नहीं हो सकता है । जितना तर्क का विषय होता है उतना ही किया जा सकता है
इससे आगे तर्क न करना ही अच्छा होता है; वस्तु के स्वभाव भिन्न-भिन्न होते हैं यही मात्र तर्क का
विषय नहीं है, इसमें फिर तर्क कुण्ठित हो जायेगा—यह तर्क का विषय नहीं है; अतः इस पर तर्क
का प्रभुत्व नहीं हो सकता ।
उस नियम की कल्पना तो इसलिए की जाती है कि नियम के बिना दूसरे पदार्थ से किसी
अन्य पदार्थ का ज्ञान अयुक्त होता है अतः निष्कर्ष यह है कि पञ्चलक्षणवाले हेतु से गृहीत नियम के
द्वारा ही स्मृति होने पर परोक्ष वस्तुओं का जो ज्ञान होता है उसको अनुमान कहते हैं ।

अ.-२, आ.-४, का.-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४९
एकवारं तावत् महानसे प्रत्यक्षानुपलम्भबलेनाग्न्याभासधूमाभासयोः कार्यकारणभावो
गृहीतः। तत्र विज्ञानवादिनो दर्शने प्रतिसन्तानमन्यश्चाभासः, —इति स्वाभासयोरेव कार्यकारणता
गृहीता न तु सन्तानान्तरगतयोस्तदीयवृत्तान्तस्यासंवेदनात्; ततश्चेदानीमनुमानं न भवेत् स्वसन्तान-
गतात् धूमाभासात् कृमिसर्वज्ञादिप्रमातृसन्तानान्तरनिष्ठस्याग्न्याभासस्य, —इति निश्चयः ।
इह तु दर्शने व्याप्तिग्रहणावस्थायां यावन्तस्तद्देशसंभाव्यमानसद्भावाः प्रमातारस्तावतामेकोऽसौ
धूमाभासश्च वह्न्याभासश्च बाह्यनये इव, तावति तेषां परमेश्वरेणैक्यं निर्मितम्, —इति हि
उक्तम् । ततः स्वपरसन्तानविशेषत्यागेन धूमाभासमात्रं वह्न्याभासमात्रस्य कार्यम्, —इति
व्याप्तौ गृहीतायां, भूयोऽपि पर्वते यो धूमाभासः सोऽपि वह्न्याभासादेव, —इति व्याप्तिं स्मृत्वानु-
मिमीते 'अत्र पर्वते अग्न्याभास' इति । तावति धूमाभासविशेषे प्रमात्रन्तरैः सहैकीभूय वह्न्या-
भाससामान्यांशे परोक्षरूपांशसहिते विशेषाभासान्तरविविक्ते प्रमात्रन्तरैः साकमेकीभवति, —इति
यावत् । 'भूय' इति व्याप्तिं गृहीत्वा पुनरपि यो धूमाभास आदिग्रहणादङ्कुराभासादिर्गृह्यते
माध्यम से और परोक्ष स्वामी के द्वारा नूतन-नूतन धूमाभासादिकों का अनुमान भी हो
जायेगा ॥ १२ ॥
इसका अव्यभिचारी कार्य हेतु होता है । जैसा कि पहले एक बार पाकशाला में प्रत्यक्ष
अनुपलब्धि के बल से अग्नि के आभास और धूम के आभास का कार्य-कारणभाव ग्रहण कर लेने
पर वहाँ विज्ञानवादियों के दर्शन में प्रत्येक संघात में दूसरे-दूसरे आभास होते हैं । इस प्रकार धूम
और अग्नि के स्वाभाविक आभास से ही कार्य-कारणता गृहीत होती है; क्योंकि दूसरे सन्तानों में
उसका संवेदन नहीं है । इसलिए इस समय में होनेवाला अनुमान अपने सन्तान के नहीं आये हुए
धूमाभास से अनुमान नहीं हो सकता, इस प्रकार कीट-पतंग से लेकर सर्वज्ञादि तक प्रमाताओं के
भिन्न-भिन्न संघात में रहनेवाले अग्नि के आभास का अनुमान नहीं हो सकता है—यह निश्चय
है । हम लोगों के दर्शन में तो व्याप्तिग्रहण के काल में जितने भी उस देश में होनेवाले प्रमाता
होंगे, उन सबों के एक ही धूमाभास और वह्न्याभास वाह्य दर्शन की नीति में नैयायिकों के
समान इतने से परमेश्वर में ऐक्य कर दिया रहता है; क्योंकि इसका हमने पूर्व में ही प्रतिपादन
कर दिया है । इसलिए अपना या दूसरे का सन्तान विशेष के त्याग से धूमाभास मात्र वह्न्याभास
मात्र का कार्य होगा, इस व्याप्ति के ग्रहण करने पर पर्वत में जो पुनः धूमाभास गृहीत होगा,
वह भी वह्न्याभास से ही होगा, इस प्रकार व्याप्ति का स्मरण करके अनुमान करने पर “अत्र
पर्वते अग्न्याभासः” यह ज्ञान उतने ही धूमाभास विशेष में दूसरे प्रमाताओं के साथ एकीभाव
होकर सामान्य वह्न्याभास के अंश में परोक्षरूप अंशों के सहित भिन्न-भिन्न विशेषाभास से अलग
होकर दूसरे प्रमाताओं के साथ एकीभूत हो जाता है, यही सिद्ध होता है ।
भूयो अर्थात् बारम्बार प्रत्यक्ष करने पर व्याप्ति ज्ञान को ग्रहण करके पुनः भी भूमाभास
का ज्ञान कर लिया जाता है, आदि ग्रहण से अङ्कुराभास भी गृहीत होता है । वह आभास भी
१, यत्राप्यनुमितार्लिङ्गाल्लिङ्गिनि ग्रहणं भवेत् ।
तत्रापि मौलिकं लिङ्गं प्रत्यक्षदेव जायते ॥
जहाँ पर भी अनुमित लिङ्ग से लिङ्गी का ग्रहण होगा; वहाँ पर भी मूल लिङ्ग का ज्ञान तो
प्रत्यक्षात्मक ही हो जाता है ।
३२

सोऽप्याभासो नूतनोऽपूर्वो न तु धूमजधूमवदप्रत्यग्रः । स च अधिपतेरसंचेत्यमानात् वह्नचाभासात्
बीजाभासादेव वा भवेत्, तत एव जनितुं शक्नोति नान्यतः । शकि लिङ् । स चाभासस्तेषु तेषु
प्रमातृष्वेक एव, अनेकत्वे न तु युज्यते एवैतदित्याशयः । यतश्च स एकोऽधिपतिश्च वह्नचाभासो
धूमकारणं, ततो धूमाभासोऽस्यैवाग्न्याभासस्याव्यभिचरितं कार्यं लिङ्गं योगिकृतत्वाभावे निश्चिते
सति,—इति तस्मात् कार्यात् सोऽनुमीयते यतः परोक्षोऽसावधिपतित्वादेव ॥ १२ ॥
नन्वेवं गोपालघटिकान्तरालचिरोषितनिर्गतादपि धूमाभासात् स्यात् वह्नयाभासानु-
मानम्,—इत्याशङ्क्याह—
--------------------------------------------- 'अन्यप्रमातृगात् ।
तदाभासस्तदाभासादेव त्वधिपतेः परः ॥ १३ ॥
परो नूतनादन्यो यो धूमाभासः स धूमाभासादेव प्रमात्रन्तरवर्तिनोऽधिपतिरूपात् परो-
क्षात्,—इति तथाभूतात् धूमाभासात् कथमकारणभूतो वह्न्याभासोऽनुमीयताम् ? इत्यभिप्राय-
शेषः । कुशलाश्च लक्ष्यन्त्येव विवेकम्, अस्यार्थस्यानुमानिकबहुतरव्यवहारोपयोगिनो यत्नेन
व्युत्पत्तिः कार्या,—इत्याशयेन नूतनमिति यदेव सूचितं तदेव व्यवच्छेदद्वारेण स्फुटीकृतम् ॥ १३ ॥
ननु चैवं धूमाभासो वह्न्याभासात्,—इत्यङ्गीकृतं चेत् तर्हि चेतनस्यैव कर्तृत्वम्,—इति
यदुक्तं तत् कथं ? तथाहि 'बीजे सत्यङ्कुरो भवति' इति यदेतत् दृष्टं धूमाग्निवदेव तत् कथम-
अपूर्व नूतन ही है । धूम से उत्पन्न हुआ धूम के जैसा नया नहीं होता और वह नहीं जाना हुआ
प्रत्यक्ष से होनेवाले वह्नयाभास या बीजाभास से ही होता है । इसलिए वह उत्पन्न हो सकता है,
दूसरे किसी से नहीं, यहाँ पर शक्त अर्थ में 'लिङ्' लकार है । वह आभास उन उन प्रमाताओं
में एक सा ही होता है, अनेक में हो ही नहीं सकता—यही इसका आशय है । क्योंकि एक ही
प्रत्यक्ष वह्नयाभास का अव्यभिचरित कार्य है जो कि योगी से किये गये अभाव के निश्चय होने
पर कारण बन जाता है, इसलिए कार्य से उसका अनुमान होता है, परोक्ष का अधिपति होने के
कारण ही वह परोक्ष माना जाता है ॥ १२ ॥
अच्छा तो, गोपाल ( अहिर ) के घड़े में बहुत देर से रहनेवाले धूम के आभास से
वह्नयाभास का अवश्य अनुमान होना चाहिए, इस आशङ्का का उत्तर देते हैं कि—
अन्य प्रमाता में हुए उसके आभास से हो उसका आभास होता है इसलिए वह एक
प्रत्यक्ष से भिन्न होता है ॥ १३ ॥
नूतन से भिन्न जो धूमाभास है वह धूमाभास से ही दूसरे प्रमाता में होनेवाले परोक्षरूप
प्रत्यक्ष से वैसे ही धूमाभास से अकारणभूत वह्नयाभास कैसे अनुमित हो सकता है ? इसका यही
शेष आशय है । चतुर विवेकी जन ही इसको भली-भाँति समझ सकते हैं । इस कार्य-कारण भावरूप
पदार्थ के अनुमान सम्बन्धी बहुत व्यवहार के उपयोगी प्रयत्न से व्युत्पत्ति करनी चाहिए, इस बात
को 'आशयेन नूतनम्' इस वाक्य से सूचित किया गया था, उसे व्यवच्छेद के द्वारा स्पष्ट
कर दिया ॥ १३ ॥
अब शङ्का होती है कि वह्नयाभास से धूमाभास होता है, यह बात आप स्वीकार करते
हो, तो चेतन ही कर्ता होता है । यह कथन कैसे सिद्ध हो सकता है ? देखिये ! बीज के रहने पर
ही अङ्कुर अङ्कुरित होता है—जैसे यह भी अग्नि से धूम होता है, उसी प्रकार बीज से अङ्कुर होता

अ.-२, आ.-४, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५१
नादरास्पदम् ? इत्याशङ्क्याह—
अस्मिन् सतीदमस्तोति कार्यकारणतापि या ।
साप्यपेक्षाविहीनानां जडानां नोपपद्यते ॥ १४ ॥
एक एव भावस्तावत् न कार्यकारणभावः, भावद्वयमपि च न युगपद्भावि कार्यकारणरूपं
घटपटवत्, क्रमभाव्यपि नानियतक्रमकं नीलपीतादिज्ञानवत्, नियतक्रमिकत्वेऽपि न पूर्वभावि
कार्यमुत्तरकालभावि च कारणम्, —इत्येवं नियतपूर्वभावं कारणं नियतपरभावं च कार्यम्, —
इति परस्य तावन्मतम् । तत्र स्वरूपादनधिका चेत् पूर्वता परता च तत् भावद्वयमात्रं, स च स
च, —इति चार्थोऽपि वा न कश्चित् तस्याप्यपेक्षारूपत्वात् स स इत्येव हि स्यात् । अथ पूर्वता
नाम प्रयोजकसत्ताकत्वं परता च प्रयोज्यसत्ताकत्वं तर्हि बीजस्याङ्कुरप्रयोक्त्री सत्ता अङ्कुर-
विश्रान्ता अङ्कुरान्तर्भावमात्मन्यानयति, अङ्कुराभावे प्रयोक्तृत्वमात्रं स्यात् तदपि न किञ्चित्
अन्यापेक्षत्वात् तस्य । एवं प्रयोज्यसत्ताकेऽपि वक्तव्यम्, —न केवलं भावमात्रमेव कार्यकारणता
इत्यादयः पक्षा नोपपन्ना यावत् 'अस्मिन् सति' इति भूतविभक्त्या सप्तम्या प्रयोजकसत्ताकत्वम्,
'इदमस्ति' इति भाव्यमानविभक्त्या प्रयोज्यसत्ताकत्वम्, —इत्येवंरूपापि या कार्यकारणता सापि
नोपपद्यते प्रमाणेन न संभवति जडानाम्, अन्योन्यापेक्षा हि अत्र जीवितं सा च जडानां न
संभवति ॥ १४ ॥
है, तब तो फिर जड-पदार्थों का भी कार्य-कारणभाव सिद्ध होगा ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं—
इसके रहने पर यह होता है ऐसी जो कार्य-कारणभाव की व्याप्ति है, वह भी तो अपेक्षा
विहीन जड-भावों की नहीं हो सकती, उसमें भी चेतन की आकांक्षा रहती है ॥ १४ ॥
एक भाव-पदार्थ में कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता है और दो भाव-पदार्थों का भी एक
ही काल में कार्य-कारणरूप घट-पट के जैसा नहीं हो सकता है; क्योंकि क्रम से होनेवाला पदार्थ
अनियत क्रमवाले नील-पीतादि ज्ञान के जैसा नहीं हो सकता है और नियत क्रम को मानने पर
भी पूर्व में होनेवाले कार्य के बाद होनेवाला कारण और पर में कार्य मानते हैं—यही सौगतों का
मत है । यदि स्व-स्वरूप मात्र ही पूर्वता और परता क्रिया है तो भाव द्वय मात्र हुआ और 'वह'
और वह ऐसा कहना भी तो कोई अर्थ नहीं रखता है; क्योंकि वह वही वस्तु हुई । पूर्वता का नाम
है यहाँ पर प्रयोजक सत्तावाला और परता का अर्थ यह होता है कि प्रयोज्य सत्तावाला, फिर
उससे तो बीज सत्ता अङ्कुर की प्रयोजिका होगी एवं अङ्कुर में उसका अन्तर्भाव होगा और वह
अङ्कुर में ही अपना अन्तर्भाव करेगी, अङ्कुर के अभाव में प्रयोक्ता का होना कोई वस्तु नहीं है;
क्योंकि अन्य वस्तु प्रयोक्ता की अपेक्षा रखती है वैसा ही प्रयोज्य सत्तावाले में भी कहना होगा ।
इसलिए मात्र भाव में ही कार्य-कारणभाव नहीं होता, किन्तु यह पक्ष सिद्धि ही नहीं है अपि तु
'अस्मिन् सति' इसमें भूत काल की सप्तमी विभक्ति प्रयोजक सत्तावाली भी है, 'इदमस्ति' यह
प्रथमा विभक्ति भाव्यमान विभक्ति के द्वारा प्रयोज्य सत्तावाली होती है । इस प्रकार का भी कार्य-
कारणभाव नहीं बन सकता है; क्योंकि जड-भावों की चेतन के बिना अपेक्षा रखे सत्ता नहीं हो
सकती और परस्पर अपेक्षा ही यहाँ पर कार्य-कारणभाव का जीवन है किन्तु यह जड में संभव
नहीं है ॥ १४ ॥

२५२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१५-१६
कथम् ? इति चेत् उच्यते—
न हि स्वात्मैकनिष्ठानामनुसन्धानवर्जिनाम् ।
सदसत्तापदेऽप्येष सप्तम्यर्थः प्रकल्प्यते ॥ १५ ॥
जडाः किलान्योन्यरूपमनुसन्धातुमप्रभविष्णवः, अन्योन्यानुसन्धानरूपत्वं जडविरुद्धेन
चैतन्येन व्याप्तम्, अनुसन्धानं चापेक्षा चैतन्यस्वरूपमेव, अन्यत्र तु सोपचरिता; अतोऽनुसन्धान-
विहोनत्वाज्जडो भावः स्वात्ममात्रविश्रान्तिसन्तोषसङ्कुचितशरीरः कथं परत्र प्रसरेत् । ततश्च
यदि बीजं सद्दङ्कुरोऽसन् अथापि उभयमपि वा सत् यदि वासत्, अथापि एकं सोपाख्यमन्यत्
निरुपाख्यम्, द्वयमपि वा सोपाख्यं निरुपाख्यं वा, तथापि प्रातिपदिकार्थमात्रं धर्मान्तरेण समुच्चया-
दिनाप्यनालिङ्गितमवतिष्ठते, तस्य समस्तस्यापेक्षारूपत्वेन चैतन्यविश्रान्तत्वात् ॥ १५ ॥
यस्मादचेतनेषु नापेक्षोपपद्यते—
अत एव विभक्त्यर्थः प्रमात्रेकसमाश्रयः ।
क्रियाकारकभावाख्यो युक्तो भावसमन्वयः ॥ १६ ॥
सप्तमीरूपाया विभक्तेरन्यस्या अपि वा योऽर्थः क्रियाकारकभाव लक्षणः स एव तावद्भावानां
समन्वयो नान्यः शुष्कः कश्चित् । स च यदि स्वतन्त्रे चिद्रूपे भावद्वयं विश्राम्यति तदोपपद्यते,
यह कैसे हो सकता है ? इसका उत्तर दिया जाता है।
हेतु विषयक अपेक्षा को छोड़कर अर्थात् अनुसन्धान से वर्जित अपने में ही रहनेवाले
पदार्थों की सत्ता और असत्ता पदों में भी सप्तमी विभक्ति का अर्थ कल्पित होता है ॥ १५ ॥
जड-पदार्थ वर्ग आपस में परस्पर अनुसंधान करने में समर्थ नहीं होते; क्योंकि परस्पर
अनुसन्धान करना तो जडभाव के विरुद्ध चैतन्य के साथ व्याप्य-व्यापकभाव से व्याप्ति होती
है और अनुसन्धान तो अपेक्षा करनेवाले चैतन्य का स्वरूप ही है, अन्यत्र घटादि में तो उपचार
से जा सकता है, इसलिए अनुसन्धान से विहीन होने के कारण जडभाव अपने आप में
विश्रान्त होकर संकुचित शरीरवाला होता है । अत एव वह चैतन्य में कैसे फैल सकता है ? और
इससे यदि बीज सद्रूप अङ्कुर न भी हो फिर भी सोपाख्य [ प्रत्यक्षरूप से जानने योग्य ] दूसरा
निरुपाख्य [ परोक्ष रूप से ज्ञेय होने से अकथनीय ] इन्हीं दोनों रूपों में प्रातिपदिकार्थ मात्र ही
रहता है । दूसरे धर्मों से समुच्चयादि के कारण अनालिङ्ग असंबद्ध ही रहता है, क्योंकि वे सभी
अपेक्षारूप होने से चैतन्य में विश्रान्त रहते हैं ॥ १५ ॥
जिस कारण से सौगतों की दृष्टि में कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता; किन्तु हमारे शैव
[ अद्वैत ] वेदान्त दर्शन में उसको सिद्ध करते हैं—
जड-भावों में अपेक्षा न रहने से एकमात्र प्रमाता के अधीन विभक्ति का अर्थ रहता है।
भावों का समन्वय क्रियाकारकभाव कहलाता है—यह युक्त भी है ॥ १६ ॥
सप्तमी विभक्ति का यह दूसरी विभक्तियों का जो क्रियाकारकभावरूप अर्थ होता है, वही
भाव-पदार्थों का समन्वय है, उससे कोई भिन्न शुष्क अर्थ नहीं है । वह यदि स्वतन्त्र चिद्रूप में
भावद्वय विश्राम लेता है, तब तो घट सकता है, नहीं तो किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है । जैसा

अ.-२, आ.-४, का.-१७] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५३
अन्यथा तु न कथंचित् । तथा हि विकल्पेनापि असौ व्यवह्रियमाणो न वस्तुनिष्ठतयोपपद्यते,
वस्त्वनुसरणप्राणो हि विकल्पोऽनुभवानुसारितयैव भवति, सा चेह नास्ति वस्तुप्रभवत्वेन,
वस्त्वनुसारि हि अनुभवो, वस्तु च स्वात्मनिष्ठम्,—इत्युक्तम्। तस्मात् बीजे सति अङ्कुरो, वह्नौ
सति धूमः,—इति च स्वतन्त्रचिद्रूपप्रमातृविश्रान्तत्वे सर्वमेतद्युज्यते नान्यथा, इति ॥ १६ ॥
ननु प्रयोज्यप्रयोजकसत्ताकत्वलक्षणापेक्षा यदि स्वात्मैकनिष्ठत्वे नोपपद्यते, तर्हि कार्यकारण-
योस्तादात्म्यवादिनां सांख्यानां मते सा सम्भवत्येव, तत् किं चैतन्यविजृम्भात्मककर्तृवादसमर्थनेन ?
इत्याशङ्क्याह—
परस्परस्वभावत्वे कार्यकारणयोरपि ।
एकत्वमेव भेदे हि नैवान्योन्यस्वरूपता ॥ १७ ॥
कि विकल्प से भी यह क्रियाकारकभाव व्यवहार में आता हुआ वस्तुनिष्ठ नहीं होता; क्योंकि
विकल्प तो वस्तु से अनुप्राणित रहता है । इसलिए विकल्प अनुभव के अनुसार ही होता है और
वह अनुभव अनुसारिता वस्तु में उत्पन्न होने के कारण यहाँ नहीं है; क्योंकि वस्तु के अनुसार
होनेवाला अनुभव होता है और वस्तु अपने में ही रहती है—ऐसा हमने कहा है ।
इसलिए बीज के रहने पर अङ्कुर होता है और वह्नि के रहने पर धूम होता है, यह सब
स्वतन्त्र चेतन के प्रमाता मानने पर संघटित हो सकता है, नहीं तो, नहीं हो सकता ॥ १६ ॥
अच्छा तो, प्रयोज्य एवं प्रयोजक सत्तारूप लक्षण को अपेक्षा यदि बीज अङ्कुरादि को
अपने में ही रहने पर नहीं बन सकता है, तो कार्य-कारणभाव का तादात्म्य माननेवाले सांख्यों के
सिद्धान्त में तो हो सकता है । इससे फिर चैतन्य के ऊपर विश्वास रखनेवाले कर्तृत्ववाद का
समर्थन करने से क्या प्रयोजन ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं—
कार्य-कारणभाव में भी परस्पर स्वभावरूपता होने पर भी एकता ही रहती है; भेद रहने
पर परस्पर स्वरूपता नहीं रहती है ॥ १७ ॥
१. सांख्य लोग सत् से सत् की उत्पत्ति मानते हैं इसलिए कारण के व्यापार से पूर्व कार्य को सत् दिखाया
है इसको सिद्ध करने के लिए पांच हेतु देते हैं—
असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् ।
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥
'असदकरणात्' असत् कार्य का कोई भी कारण नहीं होता है जैसे आकाश-कुसुम, वन्ध्यापुत्र
आदि तथा संसार में असत् कार्य का कोई कारण भी देखने में नहीं आता है अर्थात् कारण के व्यापार
के बाद में कार्य को किस प्रकार सत् माना जाता है उसी प्रकार उसके पूर्व भी कार्य सत् ही रहता
है। जैसे तिलरूप कारण के भीतर तैलरूप कार्य विद्यमान रहता हुआ भी तिलरूप कारण के पीसनारूप
व्यापार की आवश्यकता रहती है ।
'उपादानग्रहणात्' अर्थात् उपादान-कारण का ग्रहण अर्थात् कार्य के साथ उसका सम्बन्ध
होने के कारण कार्य सत् ही है । जैसे तैलरूप कार्य से सम्बद्ध रखता हुआ भी तिलरूप कारण अपने
तैलरूप कार्य का उत्पादक होता है । असत् कार्य का सम्बन्ध कभी भी कारण के साथ हो नहीं सकता
है इसलिए उत्पत्ति के पूर्व भी कार्य को सत् ही मानना चाहिए ।
'सर्वसंभवाभावात्' अर्थात् सभी कार्यों की उत्पत्ति सभी कारणों से नहीं होती है, अपि तु

२५४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१८
यदि बीजस्याङ्कुरः स्वभावस्तर्हि अङ्कुर एव न बीजं स्यात् किञ्चित् विपर्ययो वा स्यात्, —
इति किं कारणं किं वा कार्यम्; अथ अन्यद्बीजमङ्कुरोऽन्यः, तर्हि न परस्परात्मकत्वं, भेदाभेदौ हि
एकदैकविषयौ विरुद्धावेव ॥ १७ ॥
नन्वेवमपि बीजमङ्कुरादिविचित्रमवभातं दीर्घदीर्घपरामर्शशालिभिः स्रोतोवदविच्छिन्नस्व-
रूपमेव निर्बाधं प्रत्यवमृश्यत । तथा च क्व गतं बीजम्, —इति प्रश्ने वक्तारो भवन्ति, न कुत्रचित्
यदि बीज का अङ्कुर ही स्वभाव है, तब तो अङ्कुर ही मानना चाहिए फिर बीज कुछ भी
नहीं हुआ—या तो फिर बीज को ही मान ला; अङ्कुर की क्या आवश्यकता है ? इसलिए न तो
कोई कारण है और न कोई कार्य ही है। यदि बीज अन्य है और अङ्कुर अन्य है, तब तो परस्पर
एकता ही सिद्ध नहीं होती है, भेद और अभेद ये दोनों एक काल में एक विषय में नहीं हो सकते;
क्योंकि इन दोनों की आपस में विरुद्ध स्वभावता है। अन्धकार और प्रकाश के समान ॥ १७ ॥
शङ्का करते हैं कि एक ही वस्तु क्रम की विचित्रता से भिन्न-भिन्न हो जाती है। वह
बीज-अङ्कुरादि की विचित्रता से अवभासित होकर दीर्घ-दीर्घ परामर्शों से शोभनेवाली धारा के
समान अविच्छिन्नरूप से निर्बाध परामृष्ट हुआ करती है। तो फिर बीज कहाँ चला गया, ऐसा
कारणपूर्वक ही कार्य की उत्पत्ति देखी गयी है, कार्य का सम्बन्ध जिस कारण के साथ रहता है
उसी से कार्य होता है।
‘शक्तस्य शक्यकरणात्’अर्थात् जो कारण जिस कार्य के उत्पादन करने में समर्थ होता है वही
शक्य कहलाता है जैसे घटात्मक कार्य के उत्पादन में शक्त मिट्टीरूप कारण ही अपने घटात्मक शक्य
कार्य का कारण होता देखा जाता है। सर्वथा यदि उसे असत् मानते हो तो कारण निरूपित-शक्ति
कार्य में कैसे रहेगी, इसलिए भी उत्पत्ति के पूर्व कार्य सत् था ।
‘कारण भावाच्च’ अर्थात् घटरूप कार्य के साथ मिट्टीरूप कारण का तादात्म्य रहता है,
इसलिए कार्य-कारणभाव की अभिन्नता रहने से कार्य उत्पत्ति के पूर्व में सद्रूप में अवस्थित था; क्योंकि
इन दोनों की परस्पर अभेदता सिद्ध ही है। जैसे कि पशु से पशु की ही उत्पत्ति देखी जाती है एवं
तण्डुल से तण्डुलों की ही उत्पत्ति होती है; इसलिए जब आपका कारण सत् हैं तो कार्य भी स्वयं सत्
हो ही जाता है एवं प्रकाश को दिखाने के लिए दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं समझी जाती,
वह तो स्वयं सिद्ध ही है।
असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणैः सत्त्वसङ्गिभिः ।
असंबद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥
यदि कार्य असत् है तो सत् कारण से उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता, और असम्बद्ध कार्य की
उत्पत्ति मानने पर व्यवस्था ही नहीं बनेगी अर्थात् तन्तुओं से पट ही होता है घट नहीं होता, क्यों ?
ऐसे प्रश्नों के उत्तर में समाधान यही है कि अनर्गल बकनेवालों की बात ही न सुनी जाये ।
निरात्मकत्वात् सर्वेषामसतामविशिष्टता ।
विशेषणं च भिन्नं ते सत्त्वमभ्युपगम्यताम् ॥
यदि घट कपालात्मक नहीं है और ऐसे घट की उत्पत्ति कपालों से देखी जाती है, तो केवल
घट की ही क्यों ? पट की भी उत्पत्ति होनी चाहिए, जबकि अकपालरूपता तो दोनों की समान ही है;
इसलिए ऐसी आपत्ति न हो इसके लिए कार्य को कारणात्मना प्रथमतः ही विद्यमान मानना चाहिए ।

अ.-२, आ.-४, का.-१८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५५
गतमङ्कुरात्मना वर्तते, अङ्कुरीभूतमयमङ्कुरस्तत्, — इत्येवं प्रधानं महदादिधरान्तीभूतं यावद्वितती-
भूतमन्तस्सर्गप्रलयपरस्परात्मतां प्राप्तम्, — इति विततग्राहिणी प्रतीतिः; भागाभिनिवेशवशात्
तु कार्यकारणतापरिकल्पनं तस्यैव भावस्य विशसनप्रायम्, — इत्याशङ्क्याह—
एकात्मनो विभेदश्च क्रिया कालक्रमानुगा ।
तथा स्यात्कर्तृतैवैवं तथापरिणमत्तया ॥ १८ ॥
इह दीर्घदर्शिना प्रत्यक्षानुमानागमान्यतमप्रमाणमूलां प्रत्यभिज्ञामाश्रित्य तदेवेदं सुख-
दुःखमोहसाम्यमनन्तप्रकारवैषम्यावलम्बनेन विश्वीभूतम्, — इति समर्थ्यते । तत्र प्रत्यभिज्ञानबलेन
यदेकात्मकमेकस्वभावं तस्य यो भेदोऽन्यान्यरूपता इयमेव सा क्रियोच्यते, यतः काललक्षणेन
क्रमेणानुगता, ते हि अन्यान्यस्वभावा युगपत् न भान्ति, पूर्वापरीभूतरूपतैव च क्रियोच्यते; यत
एवं क्रिया 'तथा' इति तेन प्रकारेण प्रधानादेः क्रियाविशेषलक्षणेन कर्तृतैव स्यात्, न तु शुष्कं
कारणतामात्रं, यतो हेतोः 'तथा' इति तेन तेन महदादिप्रकारेण सततमेव क्रमिकां तथाभासन-
रूपां परिणामलक्षणां क्रियामाविशतः परिणमत्ता किंचिद्रूपं परिवर्ज्य त्यक्त्वा व्यावर्य्यमनुवर्त-
यितव्यं च व्यवस्थाप्य निवर्त्यमानतृतीयरूपप्रह्वता प्रधानादेस्तया हेतुभूतया ॥ १८ ॥
प्रश्न करने पर उत्तर न देनेवाला कहता है कि कहीं पर भी नहीं चला गया है। वह तो अङ्कुररूप
में परिणित हो गया है। जब यही बीज अङ्कुरित हो जाता है तब उसको अङ्कुर शब्द से कहा
जाता है। इस प्रकार एक प्रकृति जिसे प्रधान कहते हैं वह महत्तत्त्व, पञ्चतन्मात्र, पञ्चमहाभूत
होता हुआ पृथ्वी तक जितने भी इस संसार में प्राणी [ सर्ग ] हैं सृष्टि-स्थिति-प्रलयरूप में रहने-
वाला संसार बन जाता है। यही विस्तार ग्राहिणी प्रतीति कहलाती है, इसी में विभाग की
कल्पना करने पर उसी में कार्य-कारणभाव की कल्पना होती है उसी भाव की विलीन अवस्था
को ही कहा जाता है। इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं—
एक पदार्थ का भिन्न-भिन्नरूप होना काल के क्रम से होनेवाली क्रिया तो है और कर्तृता
भी उसी के परिणाम स्वरूप हो जाने से मानी जाती है ॥ १८ ॥
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमशास्त्र के द्वारा इन प्रमाणों में से किसी एक प्रमाण को मूल
में रख कर पहचान होती है। उसके आश्रय से वही यह वस्तु है—ऐसा कह कर सुख, दुःख एवं
मोहादि अनन्त प्रकार के अवलम्बन से संसार बन जाता है, इसका महर्षि कपिलमुनि ने समर्थन
किया है। इसी कारण इन लोगों के दर्शन को परिणामवादी दर्शन कहा जाता है। क्रिया का
निर्वचन करते हैं कि क्रिया क्या वस्तु है ? उसमें प्रत्यभिज्ञान के बल से जो एकरूप, एक स्वभाव-
वाला पदार्थ भासता है उसका जो दूसरे-दूसरे रूपों में बोध होता है, वही एकप्रकार से क्रिया
है; क्योंकि वह कालरूप से क्रमशः उसमें व्याप्त रहती है। वे क्रिया-पदार्थ एकरूप में परस्पर नहीं
भासते हैं और पूर्वापरीभाव ही तो क्रिया है; जबकि ऐसी क्रिया है तभी तो, उस क्रिया का
प्रधान आदि में भी क्रिया के विशेष लक्षण से कर्तृता हो सकती है। केवल शुष्क कारण नहीं
हो सकता है; क्योंकि जिस प्रधान आदि हेतु के द्वारा उन-उन महदादि परिणाम के प्रकार से
निरन्तर क्रमरूप से भासित होना, परिणामरूप क्रिया में प्रवेश कर परिणत होना, अपने पूर्वरूप
को छोड़कर आगे आनेवाले परिणामरूप को रख कर होनेवाले तृतीयरूप में मिल जाना ही
प्रधानादि की हेतुता है ॥ १८ ॥

२५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१९
ननु प्रधानं परिणामक्रियायां कर्तृरूपमियता समर्थितम्,—इति को दोषो, न हि पुरुष-
वदस्याकर्तृत्वमिष्यत ? इत्याशङ्क्याह—
न च युक्तं जडस्यैवं भेदाभेदविरोधतः ।
आभासभेदादेकत्र चिदात्मनि तु युज्यते ॥ १९ ॥
एवमित्यभिन्नरूपस्य धर्मिणः सततप्रवहद्बहुतरधर्मभेदसंभेदस्वातन्त्र्यलक्षणं परिणमनक्रिया-
कर्तृत्वं यदुक्तं तत् प्रधानादेर्न युक्तं जडत्वात्, जडो हि नाम परिनिष्ठितस्वभावः प्रमेयपदपतितः
स च रूपभेदाद्भिन्नो व्यवस्थापनीयो नीलपीतादिवत्, एकस्वभावत्त्वाच्चाभिन्नो नीलवत्, न तु
स एव स्वभावो भिन्नश्चाभिन्नश्च भवितुमर्हति विधिनिषेधयोरेकत्रैकदा विरोधात् । कश्चित्
स्वभावो भिन्नः कश्चित् त्वभिन्नः,—इति चेत्, द्वौ तर्हि इमौ स्वभावावेकस्य स्वभावस्य भवेताम्,
न चैवं युक्तं—'भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना सर्ववस्तुषु ।' इति न्यायात् एवं जडस्य 'इदम्' इति
परिनिष्ठिताभासतया सर्वतः परिच्छिन्नरूपत्वेन प्रमेयपदपतितस्य नायं स्वभावभेद एकत्वे
सत्युपपद्यते । यत्तु प्रमेयदशापतितं न भवति किं तु चिद्रूपतया प्रकाशपरमार्थरूपं चिदेकस्वभावं
स्वच्छं, तत्र भेदाभेदरूपतोपलभ्यते; अनुभवादेव हि स्वच्छस्यादर्शादेरखण्डितस्वस्वभावस्यैव
पर्वतमत्तङ्गजादिरूपसहस्रसंभिन्नं वपुरुपपद्यते । न च रजतद्विचन्द्रादि यथा शुक्तिकैकचन्द्रस्वरूप-
अच्छा तो, परिणामरूप क्रिया में प्रधान प्रकृति को कर्तारूप से समर्थन किया गया है—
इस प्रकार आशङ्का कर उत्तर देते हैं—
इस प्रकार जडभाव का कर्तृत्व नहीं बन सकता है। भेद और अभेद की एक में सत्ता नहीं
बन सकती; क्योंकि आभास का भेद होता है, किन्तु चिदात्मा में एकत्र दोनों का आभास हो
सकता है ॥ १९ ॥
इस प्रकार अभिन्नरूप धर्मी का (निरन्तर) प्रवाह में बहुत प्रकार के भिन्न-भिन्न धर्म
भेदवाले अपने-अपने लक्षण के परिणाम स्वरूप क्रियाओं के कर्ता आपने प्रधान-प्रकृति को बना
रखा है, वह नहीं हो सकता है; क्योंकि प्रधान जड है और वह एक निश्चित परिच्छिन्न स्वभाव-
वाला कहलाता है एवं अपने स्वरूप के भेद से ही भिन्न-भिन्न नील-पीतादि के समान व्यवस्थित
होता है । एक स्वभाववाला होने से अपने आप में अभिन्न ही रहता है, नील के समान । वह एक
स्वभाववाला भिन्न और अभिन्न ये दोनों एक बार विधि-निषेध के समान विरोधी होने से एक
जगह नहीं रह सकते । किसी का स्वभाव भिन्न होता है तो किसी का अभिन्न होता है, ऐसा यदि
कहो तो ये दोनों एक स्वभाव के ही हैं, यह नहीं हो सकता । 'भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना
सर्ववस्तुषु ।' अर्थात् सभी वस्तुओं में भेद और अभेद की व्यवस्था ही उच्छिन्न हो जायेगी इस
न्याय से । इस प्रकार 'इदम्' जड का यह स्वभाव है—ऐसा निश्चित स्वरूप से, सर्वत्र परिच्छिन्न
रूप में प्रमेयपदवी को प्राप्त होकर एकता में स्वभावभेद नहीं बन सकता है [ जड अनेक
रूप नहीं हो सकता है। प्रमेय स्वरूप होने से नीलादि के जैसा ] जो कि प्रमेय दशा में
नहीं आता, वही चेतनरूप होने से प्रमेयार्थ रूप में प्रकाशित होकर स्वच्छ चेतनस्वभावरूप
में रहता है। उस दशा में भेद और अभेद ये दोनों रूपों में उपलब्ध होते हैं। जैसे—
स्वच्छ दर्पण में पर्वत, हाथी आदि सहस्र प्रकार के रूप प्रतिबिम्बित होते हैं। शुक्तिका में

अ.-२, आ.-४, का.-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५७
तिरोधानेन वर्तते, तथा दर्पणे पर्वतादि; दर्पणस्य हि तथावभासे दर्पणतैव सुतरामुन्मीलति
'निर्मलोऽयमुत्कृष्टोऽयं दर्पण' इत्यभिमानात् । न हि पर्वतो बाह्यस्तत्र संक्रामति स्वदेशत्यागप्रसङ्गा-
दस्य, न चास्य पृष्ठेऽसौ भाति दर्पणानवभासप्रसङ्गात्, न च मध्ये निबिडकठिनसंप्रतिघस्वभावस्य
तत्रानुप्रवेशसंभावनाभावात्, न पश्चात् तत्रादर्शनात् दूरतयैव च भासनात्, न च तन्निपतनोत्फलित-
प्रत्यावृत्ताश्चाक्षुषा मयूखाः पर्वतमेव गृह्णन्ति, बिम्बप्रतिबिम्बयोरुभयोरपि पर्वतपार्श्वगतदर्पणाव-
भासेऽवलोकनात् । तस्मात् निर्मलतामाहात्म्यमेतत् यदनन्तावभाससंभेदश्चैकता च । गिरिशिखरो-
परिवर्तनैश्चकत्रैव बोधे नगरगतपदार्थसहस्राभासः,–इति चिद्रूपस्यैव कर्तृत्वमुपपन्नम्, अभिन्नस्य
भेदावेशसहिष्णुत्वेन क्रियाशक्त्यावेशसंभवात् ॥ १९ ॥
नन्वेतावता विज्ञानमेव ब्रह्मरूपमिमां विश्वरूपतावैचित्रीं परिगृह्णातु किमीश्वरतापरि-
कल्पनया ? इत्याशङ्क्याह—
वास्तवेऽपि चिदेकत्वे न स्यादाभासभिन्नयोः ।
चिकीर्षालक्षणैकत्वपरामर्शं विना क्रिया ॥ २० ॥
चिद्रूपस्यैकत्वं यदि वास्तवं भेदः पुनरयमविद्योपप्लवात्,—इत्युच्यते कस्यायमवि-
द्योपप्लवः,—इति न संगच्छते । ब्रह्मणो हि विद्यैकरूपस्य कथमविद्यारूपता, न चान्यः कश्चिदस्ति
रजत, एक चन्द्रमा में दो चन्द्रमा जैसे एक शुक्तिका और एक चन्द्रमा के स्वरूप को तिरोहित
कर प्रतिभासित नहीं होता है । उसी प्रकार दर्पण में पर्वत, शिखर, नदी, हाथी आदि; क्योंकि
दर्पण का उसी प्रकार आभास करना अपना स्वभाव ही उन्मीलित होता है । जैसा कि दर्पण के
विषय में कहा गया है । 'यह निर्मल दर्पण बहुत ही उत्कृष्ट स्वच्छ है' दर्पण में पर्वत बाहर से
जाकर उसमें नहीं बैठता है । ऐसा होता तो बाहर में पर्वत नहीं रहता; क्योंकि पीछे रहता तो
दर्पण का ही भान नहीं रहता और न बीच में ही बैठता है । अत एव दर्पण एक पतली सी वस्तु
है, उसके बीच में कोई पदार्थ कैसे रह सकेगा और न दर्पण पर पड़े हुए चाक्षुष से टकरा जाने
पर लौटी हुई ज्योति पर्वत को ग्रहण करती है; क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्ब ये दोनों तो पर्वत
के पास में रखनेवाले दर्पण में ही दिख पड़ते । इसीलिए दर्पण की निर्मलता का माहात्म्य यह
है कि अनन्त प्रकार की परछाईं पड़ना और एक-सा मालूम होना । इसी प्रकार पर्वत के शिखर
पर रहनेवाले एक ही ज्ञान से नगर में रहनेवाले हजारों पदार्थों का अवभास कर लेना, यह
चेतन के बिना नहीं हो सकता । इसलिए सब चेतनरूप कर्ता के ही भेद आवेश को सहनेवाली
क्रिया-शक्ति का अभिन्न आवेश ही संभव है ॥ १९ ॥
अच्छा तो, इतने प्रबन्ध से विज्ञानरूप ब्रह्म को इस विश्वरूप की विचित्र-चित्ररूपता
करनेवाला मान लिया जाय तो फिर ईश्वर की कल्पना करने की क्या आवश्यकता है ? ऐसी
आशङ्का कर उत्तर देते हैं—
वास्तव में चेतन के एक होने पर भी भिन्न-भिन्न आभासों का चिकीर्षारूप एकमात्र
परामर्श के बिना क्रिया नहीं होगी ॥ २० ॥
यदि चेतनरूप एकात्मा वस्तुतः सत्य है और भेद अविद्या के व्यापार से होता है तो यह
अविद्या का उपद्रव किसका है, यह नहीं ठीक से बैठ रहा है, क्योंकि ब्रह्म तो विद्यारूप है । वह
३३

२५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२०
वस्तुतो जीवादिर्यस्याविद्या भवेत् । अनिर्वाच्येयमविद्या,–इति चेत्, कस्य अनिर्वाच्या,–इति न
विद्मः; स्वरूपेण च भाति, न चानिर्वाच्या,–इति किमेतत् ?; युक्त्या नोपपद्यते,–इति चेत्
संवेदनतिरस्कारिणी का खलु युक्तिर्नाम अनुपपत्तिश्च भासमानस्य कान्या भविष्यति । सद्‌रूपमेव
ब्रह्माभिन्नं चकास्त्यविकल्पेन, विकल्पबलात्तु भेदोऽयम्,–इति चेत्, कस्यायं विकल्पनव्यापारो
नाम ? ब्रह्मणश्चेत् अविद्यायोगो न च अन्योऽस्ति; अविकल्पकं च सत्यं विकल्पकमसत्यम्,–इति
कुतो विभागो भासमानत्वस्याविशेषात् । भासमानोऽपि भेदो बाधितः,–इति चेत्, अभेदोऽपि
एवं भेदभासनेन तस्य बाधात् । विपरीतसंवेदनोदय एव हि बाधो नान्यः कश्चित् । बाधोऽपि च
भासमानत्वादेव सन् नान्यतः,–इति भेदोऽपि भासमानः कथमविद्या । भासनमवधीर्य आगमैक-
प्रमाणकोऽयमभेदः,–इति चेत् आगमोऽपि भेदात्मक एवावस्तुभूतः प्रमातृप्रमाणप्रमेयविभागश्च,–
इति न किंचिदेतत् । तस्मात् वास्तवं चिदेकत्वमभ्युपगम्यापि तस्य कर्तृत्वलक्षणाभिन्नरूपसमा-
वेशात्मिका क्रिया नोपपद्यते; परामर्शलक्षणं तु स्वातन्त्र्यं यदि भवति तदोपपद्यते सर्वम् । परामर्शो
हि चिकीर्षारूपेच्छा, तस्यां च सर्वमन्तर्भूतं निर्मातव्यमभेदकल्पेनास्ते,–इत्युक्तं ‘स्वामिनश्चात्म-
संस्थस्य....।’ (१।५।१०) इत्यत्र । तेन स्वात्मरूपमेव विश्वं सत्यरूपं प्रकाशात्मतापरमार्थमनुटित-
अविद्यारूप में कैसे हो सकता है और कोई दूसरा जीवादि तो है नहीं, जिसको कि अविद्या लगे ।
यह अविद्या अनिर्वचनीयरूपा है । यदि ऐसी बात है तो यह किसके लिए अनिर्वचनीयरूपा है ।
यह नहीं बता सकते हैं और जो स्वरूप से भासता है, उसे अनिर्वचनीय कैसे कहा जायेगा—
यही तो बेतुकी बात कह रहे हो ? यह युक्ति से नहीं सिद्ध हो रहा है । ऐसा यदि कहो तब ज्ञान
को छिपानेवाली जो अविद्या है—वही यह है । इसमें युक्ति और अनुपपत्ति क्या कहते हो जो
वस्तु भासित हो रही है, इसके लिए युक्ति और अनुपपत्ति क्या दिखाई जाय । वह सद्रूप है जो
ब्रह्म से अभिन्न है और अविकल्प के लिए क्या युक्ति और अनुपपत्ति हो सकती है । विकल्प के
बल से यह भेद होता है, यदि यह भी कहो तो, यह विकल्प फिर किसका व्यापार है ?
यदि ब्रह्म को मानते हो, तो उसका अविद्या से सम्बन्ध अन्य (जीवादि) संभव नहीं है
और कोई अन्य जीव भी तो यहाँ पर नहीं है । अविकल्प सत्य होता है एवं विकल्प असत्य होता
है । अविशेषरूप में भासित होने से इसका विभाग ही कैसे हो सकेगा ? यदि कहो कि भासमान
होता हुआ भी भेद बाधित हो जायेगा तब तो अभेद भी भेदाभास से बाधित हो जायेगा; क्योंकि
विपरीत ज्ञान का उदय होना ही बाध कहलाता है, दूसरी अन्य कोई वस्तु नहीं होती और
बाध भी भासित होने के कारण सत्य ही है, दूसरे कारण से नहीं है,–इसलिए भासमान होता
हुआ भेद भी कैसे अविद्या का विषय होता है ? प्रकाशित होने का तिरस्कार करके आगम को
प्रमाण मान कर इसको अभेद कहेंगे; यदि ऐसा मानते हो, तो आगम भी भेदात्मक होकर अवस्तु
हो जायेगा । प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि के विभाग भी अवस्तु हो जाने से यह कुछ नहीं है ।
इसलिए एक चेतन प्रमाण को मान करके भी उसकी कर्तृत्वरूपा अभिन्न आवेश में होनेवाली
क्रिया नहीं बैठती है; यदि परामर्शरूप स्वातन्त्र्य होता है तो सब कुछ बैठ जायेगा । परामर्श को
ही चिकीर्षारूपा इच्छा कही जाती है और उसमें अभेद तुल्य रहता है वह निर्माण है—ऐसा कहा
भी गया है 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य....।' (१-५-१०) । अर्थात् अपने आप में रहनेवाले स्वामी का ।
इसलिए स्वात्मरूप सत्यस्वरूप विश्व का ही प्रकाश परमार्थ है, जिसका प्रकाश कभी नष्ट

अ.-२, आ.-४, का.-२१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५९
प्रकाशाभेदेनैव सत् प्रकाशपरमार्थेनैव भेदेन प्रकाशयति महेश्वरः,—इति तदेवास्यातिदुर्घट-
कारित्वलक्षणं स्वातन्त्र्यमैश्वर्यमुच्यते । आभासभिन्नयोरिति क्रियापेक्षा संबन्धसामान्ये षष्ठी,
पश्चाद्वयोचितं विभज्यते । आभासेन भिन्नौ जडाजडाभासौ, जडो घटादिः कर्मरूपश्चिदाभासः
कर्तृरूपः,—इति तयोः क्रिया, एकस्य क्रियमाणत्वमपरस्य कर्तृत्वं न भवेत् । चिकीर्षारूपेण
निर्मातव्यभाववर्गभेदपरामर्शात्मना विना, एका चासौ क्रिया कथं भिन्नयोः स्वभावभूता भवेत् ।
कार्यकारणताप्रस्तावात् कर्तृकर्मणो उक्ते, कारकान्तराण्यपि तु एककर्तृत्वानुप्रवेशीनि पर-
मार्थतोऽन्यथा करणादौ भिन्ने कारकत्राते कथमभिन्ना सा । यदि वा आभासेन यौ भिन्नौ
जडचेतनौ तयोर्या चिकीर्षा एकस्यैष्यमाणतापरापरस्यैषितृता तत्स्वभावमेकत्वपरामर्शं विना,—इति ।
यद्वा आभासभिन्नयोः 'अहमिदम्' इति यः परामर्श एकविश्रान्तिरूपश्चिकीर्षात्मा तं विना,—
इति । आभासभिन्नयोरेकपरामर्शं विना चिकीर्षालक्षणा कथं क्रिया,—इति वा । एवं क्रियां वा
चिकीर्षां वा परामर्शं वा अपेक्ष्य षष्ठी नित्यसापेक्षत्वाच्च समासः ॥ २० ॥
एतत् उपसंहरति—
इत्थं तथा घटपटाद्याभासजगदात्मना ।
तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ॥ २१ ॥
यतो न जडस्य कारणता न कर्तृता, तथानीश्वरस्य चेतनस्यापि,—इत्यनेनैव हेतुप्रकारेणेदं
नहीं होता है किन्तु प्रकाश परमार्थ से भिन्न होता हुआ भी महेश्वर से प्रकाशित रहता है, उसी
को महेश्वर का अति दुर्घटकारी स्वातन्त्र्य ऐश्वर्य कहा जाता है। 'आभासभिन्नयोः' इसमें जो
षष्ठी विभक्ति है वह सम्बन्ध सामान्य में चिकीर्षा की अपेक्षा करके हुई है बाद में कर्ता एवं कर्म
के द्वारा विभक्त होती है । आभास से जड और अजड का भेद प्रतीत होता है । जड घटादि पदार्थ
कर्मरूप है और चिदाभास कर्तारूप है । कर्म और कर्ता इन दोनों की क्रिया में एक की क्रिय-
माणता रहती है दूसरे में कर्तृत्व क्यों नहीं रहेगा ? निर्माण होनेवाले भाववर्ग के भेद से परामर्श-
रूपी चिकीर्षारूप के बिना, एक ही क्रिया कैसे भिन्नरूपों में भासित होकर उसका स्वभाव
ग्रहण करेगी ? कार्य और कारण के प्रस्ताव से कर्म और कर्ता के विषय में कह दिया । अन्य
कारक तो एक ही कर्ता में रहने के कारण परमार्थतः करणादि कारक के भेद होने पर भी
कार्य-कारणता कैसे भिन्न हो सकती है। यदि आभास से भिन्न जड और चेतन है तो उनकी जो
करने की इच्छा है—वह तो, अभीष्ट किसी दूसरे में एक स्वभाव के इष्ट परामर्श के बिना नहीं हो
सकती अथवा भिन्न आभासों का 'अहमिदम्' जो यह परामर्श है, वह एक विश्रान्ति चिकीर्षा के
बिना असंभव ही है। भिन्न आभासों का एक परामर्श के बिना चिकीर्षारूप क्रिया भी तो कैसे
हो सकती है, इसी प्रकार क्रिया या चिकीर्षा अथवा परामर्श इन्हीं तीनों को अपेक्षा से षष्ठी
विभक्ति होती है और नित्य सापेक्ष होने के कारण समास भी हो जाता है ॥ २० ॥
अब इसका उपसंहार किया जाता है।
इस प्रकार वैसा घट-पटादि सारे विश्व के आभासरूप जगत् स्वरूप में रहने की इच्छा
रखनेवाले भगवान् की इच्छा में ही हेतुता, कर्तृता और क्रिया रहती है ॥ २१ ॥
जडभाव में न तो कारणता रहती है और न कर्तृता ही रहती है। इस प्रकार असमर्थ-
शाली चेतन जीव की भी कर्तृता एवं हेतुता सिद्ध होती है। इसलिए जो वैसा कर सकता है उसी

२६० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२१
जातं,—य एव तथाचिकीर्षुस्तस्यैव सा चिकीर्षा बहिष्पर्यन्ततां प्राप्ता 'क्रिया' इत्यभिधीयते, सैव
च कर्तृता तदेव हेतुत्वं नान्यत् किंचित् । तेन 'घटस्तिष्ठति' इत्ययमर्थः—घटात्मना तिष्ठासुः
स्वातन्त्र्यात् स्थानमभ्युपगच्छन् न तु तद्रूपमसहमानो यो महेश्वरः प्रकाशः स तिष्ठते—इति ।
घटपटाद्याभासरूपं यत्किल जगत् तदात्मना यः 'तथा' इति तेन तेन तज्जगद्गतजन्मस्थित्यादि-
भावविकारतद्भेदक्रियासहस्ररूपेण यः स्थातुमिच्छुः स्वतन्त्रः, तस्य या एवमिति विचित्ररूपेच्छा
सैव क्रिया,—इति संबन्धः । तेन महेश्वर एव भगवान् विश्वकर्ता,—इति शिवम् ॥ २१ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां
श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां
क्रियाधिकारे कार्यकारणतत्त्वनिरूपणं नाम
चतुर्थमाह्निकम् ॥ ४ ॥
भगवान् की इच्छा बाहर में करने तक क्रिया कही जाती है, वही कर्तृता है एवं उसे ही हेतुता
कहते हैं इससे दूसरे किसी को नहीं कहते । 'घटः तिष्ठति' इसका अर्थ यह है कि घटरूप में रहने
की इच्छा रखनेवाले भगवान् अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से घटरूप में जो प्रकाश है, उसी रूप में
महेश्वर हो जाता है । घट-पटादि जितना भी आभासरूप जगत् दिखायी दे रहा है उन-उन रूपों
से युक्त जगत् में होनेवाले जन्म-स्थिति-प्रलय आदि भाव-पदार्थों के विकार और उसके भेद हजारों
क्रियारूप में रहने का इच्छुक स्वतन्त्र भगवान् है । मैं ऐसा हो जाऊं; ऐसी जो विचित्ररूप बनने
की इच्छा है, वही क्रिया है, यह संबन्ध सिद्ध हुआ । इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् महेश्वर
ही इस विश्व का एकमात्र कर्ता है ॥ २१ ॥
चतुर्थ आह्निक समाप्त
इतिसर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता
द्वितीयक्रियाधिकारहिन्दीव्याख्या
शिवरञ्जनी
इति द्वितीयः क्रियाधिकारः समाप्तः

अथ तृतीयः आगमाधिकारः
अथ तृतीये आगमाधिकारे तत्त्वनिरूपणाख्यं
प्रथममाह्निकम्
यं प्राप्य सर्वागमसिन्धुसङ्घः पूर्णत्वमभ्येति कृतार्थतां च ।
तं नौम्यहं शांभवतत्त्वचिन्तारत्नौघसारं परमागमब्धिम् ॥
श्रीमत्सदाशिवोदारप्रारम्भं वसुधान्तकम् ।
यदन्तर्भाति तत्त्वानां चक्रं तं संस्तुमः शिवम् ॥
एवमधिकारद्वयेन ज्ञानक्रियास्वरूपं वितत्य निर्णीतम्, अथेद्ं वक्तव्यं क्रिया नाम
विश्वपदार्थावभासनलक्षणा,—इत्युक्तं समनन्तरमेव, के च ते विश्वे पदार्थाः,—इति । तत्राभास-
रूपा एव जडचेतनलक्षणाः पदार्थास्ते च कियता रूपेण संगृह्यन्ते, नहि प्रत्यक्षं मायाप्रमातुः सर्वत्र
समस्त आगमशास्त्ररूपो नदी समूह जिसको प्राप्त होकर पूर्णता और कृतार्थता का अनुभव
करने लगता है उस शाम्भवतत्त्व चिन्तामणिरत्नों के सारभूत परम आगमरूप सागर महेश्वर
को मैं नमस्कार करता हूँ ।
जिसके गर्भ में सदाशिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त तत्त्वों का समुदाय झलकता है, उस
परमशिव की हम स्तुति करते हैं ।
इस प्रकार ज्ञानाधिकार और क्रियाधिकार इन दोनों के द्वारा ज्ञान का स्वरूप तथा क्रिया
का स्वरूप विस्तारपूर्वक बता दिया गया । अब यह कहना होगा कि क्रिया विश्व के समस्त पदार्थ-
तत्त्व को अवभासित करनेवाली होती है, इसलिए यह ‘विश्ववैचित्र्यचित्रस्य समभित्तिलोपमे’
इत्यादि (२।३।१५) में कह भी दिया गया है । वे पदार्थतत्त्व कितने और कौन-कौन से हैं, ये आभास-
रूप जड-चेतनलक्षणवाले पदार्थ हैं वे किस रूप से संगृहीत किये गये हैं, माया प्रमाता देहादि
अहंभाववाले होने के कारण सर्वत्र प्रत्यक्षरूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं अर्थात् प्रत्यक्ष का विषय
१. यान्युक्तानि पुराण्यमूनि विविधैर्भेदैर्देहेष्वन्वितं
रूपं भाति परप्रकाशनिबिडं देवः स एकः शिवः ।
तत्स्वातन्र्त्त्यवशात्पुनः शिवपदाद्भेदे विभाते परं
यद्रूपं बहुधानुगामि तदिदं तत्त्वं विभोः शासने ॥
जिसके भीतर तृण से लेकर ब्रह्मपर्यन्त तत्त्वसमूह भासित होता है। यह सारा का सारा
संसार ही परम शिव का प्रकाश है। इस प्रकार विविध भेदों से युक्त प्राणियों के अनेक शरीर कहे हुए
हैं, उन सबों में जो सर्वोत्तम निबिड घनरूप पर प्रकाश भासित होता है उसी के [ परम स्वातन्त्र्य के
कारण ] उस परम शिव तत्त्व से भेद दिखने पर भी उन सबों में भी जो सामान्यरूप से तत्त्व भासता
है । वही परम शिव तत्त्व है यही प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का सिद्धान्त है ।

२६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-१
क्रमते, अनुमानमप्येवं, नहि यद्यदस्ति तत्र तत्र लिङ्गव्याप्त्यादिग्रहणसंभवः । आगमस्त्वपरि-
च्छिन्नप्रकाशात्मकमाहेश्वरविमर्शपरमार्थः किं न पश्येत्, —इति तदनुसारेण पदार्थनिर्णयं विश्वं-
प्रमेयीकरणप्रतिलब्धतद्विश्वोत्तीर्णप्रमातृपदहृदयङ्गमीकरणाभिप्रायेण निरूपयितुमाचार्य आगमा-
धिकारं तृतीयमारभते । तत्र श्लोकैकादशकेन 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' इत्यादिना 'स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः'
इत्यन्तेनागमसिद्धं शिवादिधरणोपान्तमेकैकाभासरूपतात्मकं दर्शनान्तरे 'सामान्यम्' इति यद्वयव-
हृतं, यस्य सामानाधिकरण्ययोगादनन्तस्वलक्षणावभासनव्यूहविशेषपूर्वकंः समस्तोऽयं शरीर-
भुवनादिविभवः, तं परमेश्वरागमसिद्धं युक्त्याप्यनुगतं प्रतीकस्तस्तत्त्वग्रामं दर्शयति, — इत्याह्निक-
तात्पर्यम् । तत्राधिकारसंगतिं योजयन् पूर्वपक्षप्रतिक्षेपं चोपसंहरन् शिवतत्त्वस्वरूपमेव
दर्शयितुमाह—
नहीं है और न तो अनुमान प्रमाण से भी उसका ग्रहण हो सकता है, जो जो वस्तु है उस उसमें
हेतु और व्याप्तिज्ञान संभव नहीं हो सकता है। किन्तु आगमशास्त्र तो अपरिच्छन्न प्रकाशात्मक,
माहेश्वर विमर्शरूप, परमार्थ होने के कारण क्या नहीं देख लेता है ? इसलिए आगम के अनुसार
पदार्थों के निर्णय करने के लिए आचार्य आगमाधिकार नामक तृतीय अधिकार प्रारम्भ करते हैं;
क्योंकि सभी पदार्थों का ज्ञान हो जाने पर ही पदार्थों के ऊपर जो प्रमातृपद है उसका हृदयङ्गम
होना संभव है ।
इस आह्निक में ग्यारह श्लोकों के द्वारा 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' यहाँ से लेकर 'स्थूलसूक्ष्मत्व-
भेदतः' वहाँ तक आगमशास्त्र में सिद्ध पदार्थतत्त्व जो शिव आदि से लेकर पृथिवी पर्यन्त हैं,
वे सब के सब आभासरूप से ही मात्र झलकते हैं जब कि अन्य दर्शन में इसे 'सामान्यम्' ऐसा
कह कर व्यवहार किया गया है; जिसका यह सारा का सारा शरीर, भुवनादि ऐश्वर्य-वैभव माना
जाता है । जो कि सामानाधिकरण्य [ घट-पटादि ] रूपों में असंख्य प्रकार से विशेषता को लिए
हुए स्वलक्षणसमुदाय के रूप में अवभासित होते हैं, परमेश्वर आगम से सिद्ध होता हुआ भी युक्ति
के द्वारा अनुगत होता है, प्रतीकरूप से उस तत्त्वसमूह को दिखाते हैं, इस आह्निक का इतना
ही तात्पर्य है । अधिकार सङ्गति को जोड़ते हुए पूर्वपक्ष के द्वारा दिये गये आक्षेप का निराकरण
और उपसंहार करते हुए शिवतत्त्व के स्वरूप को दिखाने के लिए अब कहते हैं—
१. प्रकृत प्रसंग के अनुसार प्रत्यभिज्ञा के स्वरूप के विषय में विवेचन करना चाहिए, और विश्व को
प्रमेयरूप में प्रकाशित करना इस स्थल में उपयोगी नहीं दिखता इसी कारण 'विश्व' ऐसा कहा जाता
है; क्योंकि विश्व को प्रमेयीकरण करने में प्रमेय पद से उत्तीर्ण होकर, अन्तःकरण में पूर्णभाव प्राप्त
कर लेना ही सत्य प्रमातृत्ता को हृदयङ्गम किया हुआ माना जायेगा । इस विषय में स्पन्द शास्त्र भी
कह रहा है—
दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते ।
तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥
किसी भी वस्तु-पदार्थ को देखने की उत्कट इच्छा का होना ही 'दिदृक्षा' कहा जाता है ।
इस देखनेवाली उत्कट इच्छा की दशा में अवस्थित होकर, जब साधक समस्त भाव-पदार्थों में अपने
स्वरूप से व्याप्त होकर स्थित होता है तब अपने स्वभाव स्वरूप [ तत्त्व ] स्पन्द की अनुभूति कर लेता
है । इस विषय में विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती है ।

अ.-३, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६३
एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा ।
मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥ १ ॥
एवमिति, यतः परदर्शनोक्तः कार्यकारणभावो जडरूपप्रतिष्ठो न कथंचिदुपपन्नः, किन्तु
चिद्रूप एवान्तर्बहिरात्मना प्रकाशपरमार्थेनापि वपुषा तदाभासरूपेण वर्तमानः कालक्रममाक्षिपन्
क्रियाभिधीयते तस्य प्रमातुरेव ज्ञानशक्तिवपुषो धर्मः; 'तत्' इति तस्मादवियुक्तं ज्ञानं क्रिया च ।
इस प्रकार बाह्य और आन्तरवृत्ति ही क्रमिक अवभास [ कालक्रम ] का आक्षेप करती
हुई क्रिया कही गयी है । इसीलिए परस्पर अवियुक्त ज्ञान और क्रिया ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का
धर्म माना जाता है ॥ १ ॥
'एवमिति' यह जो श्लोक में दिया गया है इससे द्योतित होता है कि अन्य दर्शन में कहा
गया कार्य-कारणभाव जडरूप होने के कारण किसी तरह भी उपपन्न नहीं होता, किन्तु भीतर
और बाहर में चिद्रूप ही सर्वत्र व्याप्त है, परमार्थ प्रकाश उस धर्मिरूप आभास से विद्यमान रहता
है जो क्रमिक अवभास कालक्रम का आक्षेप करता हुआ क्रियारूप बन जाता है अर्थात् उसीको
क्रिया कहा जाता है उस ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का ही धर्म है, 'तत्' शब्द जो श्लोक में दिया है यह
बताता है कि इसलिए ज्ञान और क्रिया ये दोनों परस्पर एक दूसरे अविभक्त मिले हुए रहते हैं ।
१. परम शिव ही दूसरों को प्रकाशित करनेवाले होते हैं उनकी उन्मुखरूपता इच्छा ही क्रिया शुद्ध विद्या
विमर्शमयी है जब वे शिव ज्ञान मात्र से, बिना किसी अन्तर किये भी विश्व का अपने आप में ही
अपने से निर्माण कर सर्जन करते हैं तब अन्तर भाव के उद्रेक से ज्ञान-शक्तिरूप सदाशिव में अवस्थित
हो जाते हैं, किन्तु जब बाहर में सृष्टि की रचना की प्रधानता से सर्जन करते हैं तब बहिर्भाव के उद्रेक
से क्रिया-शक्तिरूप ईश्वर में क्रिया-शक्तिरूप से अवस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार विवेचन किया भी
गया है—
उत्तरोत्तरमवग्रहग्रहैः पश्यतोऽप्यधरमुत्तरस्य यः ।
साधनस्य निजभावनामहो हेतुरत्र भवतो मरीचयः ॥
जो उत्तरोत्तर पृथक्ता को द्योतन करनेवाली अवग्रह-शक्ति के द्वारा ऊपर नीचे देखनेवाले
साधक की अपनी भावना से ग्रहण करने पर आपकी रश्मियों का ही इसमें कारण दिखता है ।
इस प्रकार आगम शास्त्र में भी इस पर उल्लेख किया गया है—
तस्मिन्नैश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः ।
शिवेच्छानुमता सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥
परमेश्वर उसी ईश्वर तत्त्व में अवस्थित रहते हैं । शिव की इच्छा-शक्ति से ही अनुमत होकर
वे सभी जगत् के उत्पादक बनते हैं ।
२. ज्ञान और क्रिया का सम्बन्ध अवियुक्त रहता है; क्योंकि वह आन्तर तत्त्व का प्रकाश करनेवाली होने से
ज्ञान-शक्ति कहलाती है और बाह्यरूप से पदार्थों का क्रमशः विस्तार करती है इसलिए क्रिया-शक्ति
है इस विषय में आगम शास्त्र का भी प्रमाण है—