ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२१
जातं,—य एव तथाचिकीर्षुस्तस्यैव सा चिकीर्षा बहिष्पर्यन्ततां प्राप्ता 'क्रिया' इत्यभिधीयते, सैव
च कर्तृता तदेव हेतुत्वं नान्यत् किंचित् । तेन 'घटस्तिष्ठति' इत्ययमर्थः—घटात्मना तिष्ठासुः
स्वातन्त्र्यात् स्थानमभ्युपगच्छन् न तु तद्रूपमसहमानो यो महेश्वरः प्रकाशः स तिष्ठते—इति ।
घटपटाद्याभासरूपं यत्किल जगत् तदात्मना यः 'तथा' इति तेन तेन तज्जगद्गतजन्मस्थित्यादि-
भावविकारतद्भेदक्रियासहस्ररूपेण यः स्थातुमिच्छुः स्वतन्त्रः, तस्य या एवमिति विचित्ररूपेच्छा
सैव क्रिया,—इति संबन्धः । तेन महेश्वर एव भगवान् विश्वकर्ता,—इति शिवम् ॥ २१ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां
श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां
क्रियाधिकारे कार्यकारणतत्त्वनिरूपणं नाम
चतुर्थमाह्निकम् ॥ ४ ॥
भगवान् की इच्छा बाहर में करने तक क्रिया कही जाती है, वही कर्तृता है एवं उसे ही हेतुता
कहते हैं इससे दूसरे किसी को नहीं कहते । 'घटः तिष्ठति' इसका अर्थ यह है कि घटरूप में रहने
की इच्छा रखनेवाले भगवान् अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से घटरूप में जो प्रकाश है, उसी रूप में
महेश्वर हो जाता है । घट-पटादि जितना भी आभासरूप जगत् दिखायी दे रहा है उन-उन रूपों
से युक्त जगत् में होनेवाले जन्म-स्थिति-प्रलय आदि भाव-पदार्थों के विकार और उसके भेद हजारों
क्रियारूप में रहने का इच्छुक स्वतन्त्र भगवान् है । मैं ऐसा हो जाऊं; ऐसी जो विचित्ररूप बनने
की इच्छा है, वही क्रिया है, यह संबन्ध सिद्ध हुआ । इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् महेश्वर
ही इस विश्व का एकमात्र कर्ता है ॥ २१ ॥
चतुर्थ आह्निक समाप्त
इतिसर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता
द्वितीयक्रियाधिकारहिन्दीव्याख्या
शिवरञ्जनी
इति द्वितीयः क्रियाधिकारः समाप्तः