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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 343 में से

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पृष्ठ 272

अ.-२, आ.-४, का.-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४९
एकवारं तावत् महानसे प्रत्यक्षानुपलम्भबलेनाग्न्याभासधूमाभासयोः कार्यकारणभावो
गृहीतः। तत्र विज्ञानवादिनो दर्शने प्रतिसन्तानमन्यश्चाभासः, —इति स्वाभासयोरेव कार्यकारणता
गृहीता न तु सन्तानान्तरगतयोस्तदीयवृत्तान्तस्यासंवेदनात्; ततश्चेदानीमनुमानं न भवेत् स्वसन्तान-
गतात् धूमाभासात् कृमिसर्वज्ञादिप्रमातृसन्तानान्तरनिष्ठस्याग्न्याभासस्य, —इति निश्चयः ।
इह तु दर्शने व्याप्तिग्रहणावस्थायां यावन्तस्तद्देशसंभाव्यमानसद्भावाः प्रमातारस्तावतामेकोऽसौ
धूमाभासश्च वह्न्याभासश्च बाह्यनये इव, तावति तेषां परमेश्वरेणैक्यं निर्मितम्, —इति हि
उक्तम् । ततः स्वपरसन्तानविशेषत्यागेन धूमाभासमात्रं वह्न्याभासमात्रस्य कार्यम्, —इति
व्याप्तौ गृहीतायां, भूयोऽपि पर्वते यो धूमाभासः सोऽपि वह्न्याभासादेव, —इति व्याप्तिं स्मृत्वानु-
मिमीते 'अत्र पर्वते अग्न्याभास' इति । तावति धूमाभासविशेषे प्रमात्रन्तरैः सहैकीभूय वह्न्या-
भाससामान्यांशे परोक्षरूपांशसहिते विशेषाभासान्तरविविक्ते प्रमात्रन्तरैः साकमेकीभवति, —इति
यावत् । 'भूय' इति व्याप्तिं गृहीत्वा पुनरपि यो धूमाभास आदिग्रहणादङ्कुराभासादिर्गृह्यते
माध्यम से और परोक्ष स्वामी के द्वारा नूतन-नूतन धूमाभासादिकों का अनुमान भी हो
जायेगा ॥ १२ ॥
इसका अव्यभिचारी कार्य हेतु होता है । जैसा कि पहले एक बार पाकशाला में प्रत्यक्ष
अनुपलब्धि के बल से अग्नि के आभास और धूम के आभास का कार्य-कारणभाव ग्रहण कर लेने
पर वहाँ विज्ञानवादियों के दर्शन में प्रत्येक संघात में दूसरे-दूसरे आभास होते हैं । इस प्रकार धूम
और अग्नि के स्वाभाविक आभास से ही कार्य-कारणता गृहीत होती है; क्योंकि दूसरे सन्तानों में
उसका संवेदन नहीं है । इसलिए इस समय में होनेवाला अनुमान अपने सन्तान के नहीं आये हुए
धूमाभास से अनुमान नहीं हो सकता, इस प्रकार कीट-पतंग से लेकर सर्वज्ञादि तक प्रमाताओं के
भिन्न-भिन्न संघात में रहनेवाले अग्नि के आभास का अनुमान नहीं हो सकता है—यह निश्चय
है । हम लोगों के दर्शन में तो व्याप्तिग्रहण के काल में जितने भी उस देश में होनेवाले प्रमाता
होंगे, उन सबों के एक ही धूमाभास और वह्न्याभास वाह्य दर्शन की नीति में नैयायिकों के
समान इतने से परमेश्वर में ऐक्य कर दिया रहता है; क्योंकि इसका हमने पूर्व में ही प्रतिपादन
कर दिया है । इसलिए अपना या दूसरे का सन्तान विशेष के त्याग से धूमाभास मात्र वह्न्याभास
मात्र का कार्य होगा, इस व्याप्ति के ग्रहण करने पर पर्वत में जो पुनः धूमाभास गृहीत होगा,
वह भी वह्न्याभास से ही होगा, इस प्रकार व्याप्ति का स्मरण करके अनुमान करने पर “अत्र
पर्वते अग्न्याभासः” यह ज्ञान उतने ही धूमाभास विशेष में दूसरे प्रमाताओं के साथ एकीभाव
होकर सामान्य वह्न्याभास के अंश में परोक्षरूप अंशों के सहित भिन्न-भिन्न विशेषाभास से अलग
होकर दूसरे प्रमाताओं के साथ एकीभूत हो जाता है, यही सिद्ध होता है ।
भूयो अर्थात् बारम्बार प्रत्यक्ष करने पर व्याप्ति ज्ञान को ग्रहण करके पुनः भी भूमाभास
का ज्ञान कर लिया जाता है, आदि ग्रहण से अङ्कुराभास भी गृहीत होता है । वह आभास भी
१, यत्राप्यनुमितार्लिङ्गाल्लिङ्गिनि ग्रहणं भवेत् ।
तत्रापि मौलिकं लिङ्गं प्रत्यक्षदेव जायते ॥
जहाँ पर भी अनुमित लिङ्ग से लिङ्गी का ग्रहण होगा; वहाँ पर भी मूल लिङ्ग का ज्ञान तो
प्रत्यक्षात्मक ही हो जाता है ।
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