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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 343 में से

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पृष्ठ 61

३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-४-५
एतत् सिद्धयति, अपितु अनुभवसंस्कारोऽपि अत्र उपयोगी—इति, तर्हि स एवास्तु, किम्
आत्मना ?—तत् एतत् दर्शयति—
सत्याप्यात्मनि दृङ्नाशात्तद्द्वारा दृष्टवस्तुषु ।
स्मृतिः केन
'दृष्टेषु' अनुभूतेषु 'वस्तुषु' या 'स्मृतिः' तस्याम् अनुभवो दृगात्मा 'द्वारम्' अर्थांशस्पर्शी,
स च 'सत्यपि आत्मनि' नष्टोऽनुभवः तस्य हि अनाशे इदम्—इत्येष एव अत्रुटितः प्रकाशः—इति
का स्मृतिः, तदनुभविता किं स्मृतेः कुर्यात्—इति ॥
अथ यत्रैवानुभवस्तत्पदैव सा ॥ ४ ॥
'यत्रैव' विषये 'अनुभवो' वृत्तः 'तदेव' तस्या स्मृतेः 'पदं' स्मर्यमाणम् । तत्पदा—इति
बहुव्रीहिः, 'सा' इति स्मृतिः ॥ ४ ॥
ननु ज्ञानान्तरस्य विषयेण कथं तस्याः विषयित्वाभिमानः—इत्याशङ्कयाह—
यतो हि पूर्वानुभवसंस्कारात्स्मृतिसंभवः ।
दिखाई देता; यह भी कहना चाहिए कि आकाश भी कोई वस्तु है ? ऐसी स्थिति में यही कहा
जाता है कि—आत्मा से कुछ भी सिद्ध होनेवाला नहीं है, अपितु अनुभव संस्कार ही इसमें
उपयोगी होगा, तब तो, अनुभव संस्कार ही स्मृति में उपयोगी रहे, आत्मा से क्या सिद्ध होने
वाला होगा ? उसे दिखाया जाता है—
आत्मा के ही रहने से दृष्टि के नष्ट हो जाने पर भी दृष्ट वस्तु का स्मरण होता है, यदि
आत्मा को नहीं मानते हो तो फिर कौन स्मरण करेगा ॰॰॰॰॥
'दृष्टेषु' दृष्ट—अनुभूत वस्तुओं में जो स्मृति होती है उस स्मृति में अनुभव ज्ञानात्मा
अर्थविषयक अंश का द्वार है, और वह 'सत्यपि आत्मनि' आत्मा के रहने पर भी अनुभव नष्ट
हो जाता है, उस अनुभव के नित्य रहने पर यह घट-पद है—ऐसा लगातार प्रकाश होता
रहेगा । अतः स्मृति की क्या जरूरत रह जायेगी ? हम अनुभव को ही नित्य मान लेंगे और
इसीसे हमारा कार्य सम्पन्न हो जायेगा । स्मृति में अनुभवकर्ता को मान कर क्या करागे ।
जिस अर्थ विषय में अनुभव होता है उस विषय के अर्थ की ही स्मृति होती है ॥ ४ ॥
'यत्रैव' जिस विषय में अनुभव होता है । जैसे घट-पद का अनुभव हुआ तो घट-पद का
स्मरण भी घट-पद से हो होगा । और उसी विषय का स्मरण होता है, जो पद अनुभव का
विषय है वही पद स्मृति का भो विषय होता है, 'तत्पदं यस्यां स्मृतौ सा तत्पदा स्मृतिः',
कारिका में 'सा' यह स्मृतिपद से लिया हुआ है ॥ ४ ॥
अब शङ्का करते हैं कि जो अनुभव का विषय है वह स्मृति का विषय कैसे बनेगा, क्योंकि
अनुभव तो नष्ट हो गया फिर उसका विषय स्मृति नहीं बनेगी, इस आशङ्का के उत्तर में
कहते हैं—
क्योंकि पूर्व के अनुभव-संस्कार से ही स्मृति सम्भव है ।