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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 343 में से

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पृष्ठ 60

अ.-१, आ.-२, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३७
अर्थस्य दण्डिवत्, सर्वत्र अयम्—इति प्रत्ययप्रसङ्गात्; किन्तु अनुभवप्रकाश एव स्मृतौ प्रधानम्,
अनुभवस्य तु अर्थप्रकाशात्मकत्वात् अनुभवप्रकाशनान्तरीकयोऽर्थावभासः—इति। सर्वथा यदि
अनुभवो ध्वस्तः, तदा तत्प्रकाशरूपा कथं स्मृतिस्तद्वारेण अर्थविषया स्यात्, तया च सर्वो
व्यवहारः क्रियमाणो दृष्टः—इत्यसौ स्वरूपेण अनपह्नवनीया, सति अनुभवस्य नाशे, किञ्चित्
अविनष्टम् आवेदयति। तदेव च अनुभवकर्तृ अनुभवितृरूपम्, आत्मा अनुभावको नित्यः—इति
इयदेव च आत्मसिद्धेर्जीवितम्। तत्तु न अधिकम् इहैव उन्मीलितम् आचार्येण, वक्तव्यशेषविवक्षया
पूर्वपक्षो मा तावत् समापत्—इत्याशयेन 'कथं भवेत्' इति। अर्थस्तावत् तस्याम् अकिञ्चित्करः।
अनुभवश्च ध्वस्तः—इति न केनचित्प्रकारेण स्मृतिः स्यात्, तदभावे च संकेतशब्दस्मृत्या-
यत्ता अपि अस्तङ्गताः सर्वे विकल्पाः, निर्विकल्पं च अन्धमूकबधिरप्रायम्—इति हन्त निराक्रन्दम्
अवसीदेत् विश्वम्—इति ॥ ३ ॥
इह कार्यव्यतिरेकेण तादृक् कल्पनीयं यत् कार्यसिद्धये पर्याप्नोति, न चैवम् आत्मा, अर्थो
हि तावत् स्मर्यते, स च अनुभवप्रकाशमुखेन, अनुभवश्च ध्वस्तः-इत्युक्तं; यदि आत्मा कश्चिदस्ति,
किं तेन। एतदपि हि वक्तव्यम्—आकाशमपि अस्ति—इति। अथ उच्यते—न केवलेन आत्मना
दण्डीपुरुष की तरह प्रकाश होता है, किन्तु स्मृति में अनुभव प्रकाश ही प्रधान है, अनुभव तो
अर्थप्रकाशात्मक है अनुभव प्रकाश के बिना अर्थ का अवभास नहीं होता, यदि सब प्रकार से
अनुभव का ध्वंस हो जायेगा, तब तो अनुभवसे प्रकाशित होनेवाली स्मृति अर्थविषयक कैसे
सम्भव हो सकेगी, और उस स्मृति से ही समस्त क्रियमाण व्यवहार होता हुआ देखा जाता है,
इसलिए इसको स्वरूप से हटा नहीं सकते हो, अनुभव के नाश हो जाने पर कुछ अविनष्ट
संस्कार का ज्ञापन होता है, इसीलिए उसे अनुभवकर्ता और अनुभविता कहा जायेगा, आत्मा
अनुभव करने वाला नित्य है और इतना ही आत्मसिद्धि का जीवन है। इससे अधिक नहीं है,
इसी में आचार्य ने दिखाया है, अभी करने के लिए कुछ शेष रह गया है इस विवक्षा से पूर्वपक्ष
प्रायः समाप्त न हो जाय; इस अभिप्राय से 'कथं भवेत्' यह पद दिया गया है। अर्थ उस स्मृति
में कुछ भी नहीं है, विषय की सत्ता स्मृति में अनपेक्षणीय है, और अनुभव तो विनष्ट हो गया,
तब फिर स्मृति कैसे सम्भव हो सकेगी, अर्थात् स्मृतिका किसी भी प्रकारसे होना सम्भव नहीं
दीखता, और स्मृति का अभाव हो जाने पर संकेत शब्द स्मृति के आधीन होता हुआ भी सभी
विकल्प नष्ट ही हो जाते हैं, और निर्विकल्प तो फिर अन्धे एवं बहरे के जैसा ही प्रायः हो जाता
है; बड़े दुःख की बात है। अब इसके लिए चिल्लाना निरर्थक ही है यह विश्व दुःखमय
हो जायेगा ॥ ३ ॥
कार्य से भिन्न ऐसा जो कार्यानुकूल उस कार्यको पैदा करनेवाले कारण की कल्पना
करनी चाहिए जो कि सिद्धि के लिए पर्याप्त हो, और जो आत्मा नहीं है, अर्थ विषय का ही
स्मरण किया जाता है और वह अर्थप्रकाश अनुभवप्रकाश के माध्यम से होना चाहिए, किन्तु
अनुभवप्रकाश विनष्ट हो जाता है, इस विषय में जो कहना था सो कह दिया गया है; यदि
आत्मा नाम की कोई वस्तु है तो फिर उससे किसी का कुछ भी प्रयोजन सिद्ध होता नहीं