हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१०६ ] सबका स्थानत्याग और कछुएसे मिलन ४७
यतः,-
परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् ।
धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित्तु महात्मनः ॥ १०३ ॥
क्योंकि-दूसरोंको उपदेश करना सब मनुष्योंको सहज है, परन्तु आपका
धर्म पर चलना किसी विरलेही महात्मासे होता है ॥ १०३ ॥
स च भोजनविशेषैर्मां संवर्धयिष्यति ।' हिरण्यकोऽप्याह—'तत्कि-
मत्रावस्थाय मया कर्तव्यम् ?
और वह विविध प्रकारके भोजनोंसे मेरा सत्कार करेगा' । हिरण्यक भी
बोला—'तो मैं यहां रह कर क्या करूंगा ?
यतः,-
यस्मिन्देशे न संमानो न वृत्तिर्न च बान्धवः ।
न च विद्यागमः कश्चित्तं देशं परिवर्जयेत् ॥ १०४ ॥
क्योंकि—जिस देशमें न सन्मान, न जीविकाका साधन, न भाई ( या संबंधी )
और कुछ विद्याका भी लाभ न हो उस देशको छोड़ देना चाहिये ॥ १०४ ॥
अपरं च,-
लोकयात्राऽभयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥ १०५ ॥
और दूसरे-जीविका, अभय, लज्जा, सज्जनता तथा उदारता, ये पांच बातें
जहां न हो वहां नहीं रहना चाहिये ॥ १०५ ॥
तत्र मित्र ! न वस्तव्यं यत्र नास्ति चतुष्टयम् ।
ऋणदाता च वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी ॥ १०६ ॥
और हे मित्र ! जहां ऋण देने वाला, वैद्य, वेदपाठी और सुन्दर जलसे भरी
नदी, ये चार न हो वहां नहीं रहना चाहिये ॥ १०६ ॥
ततो मामपि तत्र नय ।' अथ वायसस्तत्र तेन मित्रेण सह विचि-
त्रालापैः सुखेन तस्य सरसः समीपं ययौ । ततो मन्थरो दूरादव-
लोक्य लघुपतनकस्य यथोचितमातिथ्यं विधाय मूषकस्यातिथि-
सत्कारं चकार ।
इसलिये मुझे भी वहां ले चल ।' पीछे कौवा उस मित्रके साथ अच्छी अच्छी
बातें करता हुआ बेखटके उस सरोवरके पास पहुंचा । फिर मन्थरने उसे