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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 302 में से

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पृष्ठ 66

४६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १०२-
दुर्जनोंके मनमें कुछ, वचनमें और काममें कुछ; और सज्जनोंके जीमें, बच-
नमें और काममें एक बात होती है ॥ १०१ ॥
तद्भवतु भवतोऽभिमतमेव।' इत्युक्त्वा हिरण्यको मैत्र्यं विधाय
भोजनविशेषैर्वायसं संतोष्य विवरं प्रविष्टः । वायसोऽपि स्वस्थानं
गतः। ततः प्रभृति तयोरन्योन्याहारप्रदानेन कुशलप्रश्नैर्विश्रम्भा-
लापैश्च कालोऽतिवर्तते ।
इसलिये तेरा ही मनोरथ हो।' यह कह कर हिरण्यक मित्रता करके विविध
प्रकारके भोजनसे कौवेको संतुष्ट करके बिलमें घुस गया। और कौवाभी अपने
स्थानको चला गया। उस दिनसे उन दोनोंका आपसमें भोजनके देने-लेनेसे,
कुशल पूछनेसे और विश्वासयुक्त बातचीतसे समय कटने लगा।
एकदा लघुपतनको हिरण्यकमाह - 'सखे ! कष्टतरलभ्याहार-
मिदं स्थानं परित्यज्य स्थानान्तरं गन्तुमिच्छामि।' हिरण्यको
ब्रूते-'मित्र ! क्व गन्तव्यम् ?
एक दिन लघुपतनकने हिरण्यकसे कहा-'मित्र ! इस स्थानमें बड़ी मुश्किलीसे
भोजन मिलता है, इसलिये इस स्थानको छोड़ कर दूसरे स्थानमें जाना
चाहता हूं'। हिरण्यकने कहा-'मित्र ! कहां जाओगे ?
तथा चोक्तम् ,—
चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् ।
नाऽसमीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत्' ॥ १०२ ॥
ऐसा कहा है कि-बुद्धिमान् एक पैरसे चलता है और दूसरेसे ठहरता
है । इसलिये दूसरा स्थान निश्चय किये विना पहला स्थान नहीं छोड़ना
चाहिये ॥ १०२ ॥
वायसो ब्रूते-'अस्ति सुनिरूपितस्थानम् ।' हिरण्यकोऽवदत्- 'किं
तत् ?' । वायसो ब्रूते - 'अस्ति दण्डकारण्ये कर्पूरगौराभिधानं
सरः । तत्र चिरकालोपार्जितः प्रियसृहन्मे मन्थराभिधानः
कच्छपो धार्मिकः प्रतिवसति ।
कौवा बोला- 'एक अच्छी भांति देखा भाला स्थान है'। हिरण्यक बोला-
'कौनसा है ?'. कौआ कहने लगा - 'दण्डकवनमें कर्पूरगौर नाम एक सरोवर है,
उसमें मन्थरनाम एक धर्मशील कछुआ मेरा बड़ा पुराना और प्यारा मित्र रहता है.