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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 302 में से

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पृष्ठ 273
  • ९८ ] विचारसे कार्यसिद्धि और अविचारसे आपत्ति २५३
    अपरं च,—
    कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
    षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः' ॥ ९५ ॥
    और दूसरे—काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, तथा मद इन छः बातोंको
    छोड़ देना चाहिये, और इनके त्यागनेसे ही राजा सुखी होता है' ॥ ९५ ॥
    राजाह—'मन्त्रिन् ! एष ते निश्चयः ?' मन्त्री ब्रूते—'एवमेव ।
    राजा बोला—'हे मंत्री ! यह तेरा निश्चय है ? मंत्रीने कहा—'हां, ऐसाही है ।
    यतः,—
    स्मृतिश्च परमार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चयः ।
    दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिणः परमो गुणः ॥ ९६ ॥
    क्योंकि—धर्मके तत्त्वोंमें स्मरण, विवेक, बुद्धिकी स्थिरता, दृढ़ता, और मंत्रको
    गुप्त रखना ये मंत्रीके मुख्य गुण हैं ॥ ९६ ॥
    तथा च,—
    सहसा विदधीत न क्रिया-
    मविवेकः परमापदां पदम् ।
    वृणुते हि विमृश्यकारिणं
    गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ॥ ९७ ॥
    औरभी कहा है—एकाएक बिना विचारे कोई काम न करना चाहिये, क्योंकि
    अविवेक याने विवेकका न होना आपत्तियोंका मुख्य स्थान है. और गुणको
    चाहने वाली संपत्तियां विचार कर करने वाले(सदसद्विवेकी पुरुष)के पास
    आपसे आप चली आती हैं ॥ ९७.॥
    तद्देव ! यदिदानीमस्मद्वचनं क्रियते तदा संधाय गम्यताम् ।
    इसलिये हे महाराज ! जो अब मेरी बात मानों तो मेल करके चलिए ।
    यतः,—
    यद्यप्युपायाश्चत्वारो निर्दिष्टाः साध्यसाधने ।
    संख्यामात्रं फलं तेषां सिद्धिः साम्नि व्यवस्थिता' ॥ ९८ ॥
    क्योंकि—यद्यपि मनोरथके सिद्ध करनेमें चार उपाय ( साम, दाम, दंड और
    भेद ) कहे हैं तथापि उन उपायोंका फल, केवल गिनतीही है परन्तु कार्यका
    साधन मेलमें रहता है, अर्थात् मेलसेही कार्य बन जाता है ॥ ९८ ॥