हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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- ९८ ] विचारसे कार्यसिद्धि और अविचारसे आपत्ति २५३
अपरं च,—
कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः' ॥ ९५ ॥
और दूसरे—काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, तथा मद इन छः बातोंको
छोड़ देना चाहिये, और इनके त्यागनेसे ही राजा सुखी होता है' ॥ ९५ ॥
राजाह—'मन्त्रिन् ! एष ते निश्चयः ?' मन्त्री ब्रूते—'एवमेव ।
राजा बोला—'हे मंत्री ! यह तेरा निश्चय है ? मंत्रीने कहा—'हां, ऐसाही है ।
यतः,—
स्मृतिश्च परमार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चयः ।
दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिणः परमो गुणः ॥ ९६ ॥
क्योंकि—धर्मके तत्त्वोंमें स्मरण, विवेक, बुद्धिकी स्थिरता, दृढ़ता, और मंत्रको
गुप्त रखना ये मंत्रीके मुख्य गुण हैं ॥ ९६ ॥
तथा च,—
सहसा विदधीत न क्रिया-
मविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं
गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ॥ ९७ ॥
औरभी कहा है—एकाएक बिना विचारे कोई काम न करना चाहिये, क्योंकि
अविवेक याने विवेकका न होना आपत्तियोंका मुख्य स्थान है. और गुणको
चाहने वाली संपत्तियां विचार कर करने वाले(सदसद्विवेकी पुरुष)के पास
आपसे आप चली आती हैं ॥ ९७.॥
तद्देव ! यदिदानीमस्मद्वचनं क्रियते तदा संधाय गम्यताम् ।
इसलिये हे महाराज ! जो अब मेरी बात मानों तो मेल करके चलिए ।
यतः,—
यद्यप्युपायाश्चत्वारो निर्दिष्टाः साध्यसाधने ।
संख्यामात्रं फलं तेषां सिद्धिः साम्नि व्यवस्थिता' ॥ ९८ ॥
क्योंकि—यद्यपि मनोरथके सिद्ध करनेमें चार उपाय ( साम, दाम, दंड और
भेद ) कहे हैं तथापि उन उपायोंका फल, केवल गिनतीही है परन्तु कार्यका
साधन मेलमें रहता है, अर्थात् मेलसेही कार्य बन जाता है ॥ ९८ ॥