हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ हितोपदेशः [ संधिः ९९-
राजाह—'कथमेवं संभवति ?' । मन्त्री ब्रूते—'देव ! सत्वरं भवि-
ष्यति ।
यह सुन कर राजा बोला-'ऐसा कैसे हो सकता है ?' मंत्रीने कहा-'महा-
राज ! शीघ्र हो जायगा ।
पश्य,—
अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ॥ ९९ ॥
क्योंकि—मूर्ख सहजमें मिलाने योग्य है, और अधिक बुद्धिमान् और भी
सहजमें प्रसन्न कर लिया जा सकता है परन्तु थोड़ेही ज्ञानसे अभिमानी
मनुष्यको ब्रह्माभी प्रसन्न नहीं कर सकता है ॥ ९९ ॥
विशेषतश्चायं धर्मज्ञो राजा सर्वज्ञो मन्त्री च । ज्ञातमेतन्मया पूर्वं
मेघवर्णवचनात्तत्कृतकार्यसंदर्शनाच्च ।
और विशेष करके यह राजा धर्मशील और मंत्री सर्वज्ञ है। मैंने यह पहलेही
मेघवर्णकी बातसे और उनके किये हुए कार्योंके देखनेसे जान लिया था.
यतः,—
कर्मानुमेयाः सर्वत्र परोक्षगुणवृत्तयः ।
तस्मात् परोक्षवृत्तीनां फलैः कर्मानुभाव्यते' ॥ १०० ॥
क्योंकि—सर्वत्र परोक्षमें गुणोंसे युक्त अर्थात् अपने गुणोंको नहीं प्रकट
करने वाले पुरुष कर्मसे जाने जाते हैं। इसलिये जिनका आकार और हृदयका
भाव छुपा हुआ है ऐसे महान् पुरुषोंको कर्मके बलसे निश्चय करे' ॥ १०० ॥
राजाह—'अलमुत्तरोत्तरेण। यथाभिप्रेतमनुष्ठीयताम्।' एतन्म-
न्त्रयित्वा गृध्रो महामन्त्री 'तत्र यथार्हं कर्तव्यम्।' इत्युक्त्वा दुर्गा-
भ्यन्तरं चलितः । ततः प्रणिधि बकेनागत्य राज्ञो हिरण्यगर्भस्य
निवेदितम्—'देव ! संधिं कर्तुं महामन्त्री गृध्रोऽस्मत्समीपमा-
गच्छत्।' राजहंसो ब्रूते—'मन्त्रिन् ! पुनः संबन्धिना केनचिद-
त्रागन्तव्यम्।' सर्वज्ञो विहस्याह—'देव ! न शङ्कास्पदमेतत् ।
यतोऽसौ महाशयो दूरदर्शी। अथवा स्थितिरियं मन्दमतीनाम् ।
कदाचिच्छङ्कैक न क्रियते, कदाचित्सर्वत्र शङ्का।