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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 302 में से

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पृष्ठ 198

१७८ हितोपदेशः [विग्रहः ५०-
यतः,—
एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।
शतं शतसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विशिष्यते ॥ ५० ॥
क्योंकि—किले पर बैठा हुआ एक धनुषधारी सैकड़ों मनुष्योंसे युद्ध कर सकता
है, और सैंकड़ों मनुष्य एक लाख मनुष्योंसे लड़ाईमें भिड़ सकते हैं, इसलिये
गढ़ अधिक है अर्थात् युद्धमें वह एक बलवत्तर साधन माना गया है ॥ ५० ॥
किंच,—
अदु र्गो विषयः कस्य नारेः परिभवास्पदम् ।
अदुर्गोऽनाश्रयो राजा पोतच्युतमनुष्यवत् ॥ ५१ ॥
और गढ़से रहित राजा किस शत्रुके पराजयका विषय नहीं होता है ? अर्थात्
बिना गढ़के एवं आश्रयशून्य राजा सहजहीमें जीता जा सकता है, इसलिये गढ़
बिना आश्रयहीन राजा नावसे (जलमें) गिरे हुए निराधार पुरुषके समान है ॥
दुर्गं कुर्यान्महाखातमुच्चप्राकारसंयुतम् ।
सयंत्रं सजलं शैलसरिन्मरुवनाश्रयम् ॥ ५२ ॥
पहाड़, नदी, निर्जलदेश और गहरे वनके पास बड़ी गहरी खाई तथा ऊँचे
परकोटेसे युक्त और तोप-गोले तथा बारूद और जल इनसे युक्त किला बनाना
चाहिये ॥ ५२ ॥
विस्तीर्णताऽतिवैषम्यं रसधान्येध्मसंग्रहः ।
प्रवेशश्चापसारश्च सप्तैता दुर्गसंपदः' ॥ ५३ ॥
लंबा, चौड़ा, ऊँचा, नीचा, जल, अन्न और ईंधन इनका संग्रह, और जाने
तथा आनेका मार्ग, ये गढ़की सात प्रधान सामग्रियाँ हैं ॥ ५३ ॥
राजाह—'दुर्गानुसंधाने को नियुज्यताम् ?' ।
राजा बोला—'गढ़ बनानेमें किसे नियुक्त करना चाहिये ?'
चक्रो ब्रूते—
'यो यत्र कुशलः कार्ये तं तत्र विनियोजयेत् ।
कर्मस्वदृष्टकर्मा यः शास्त्रज्ञोऽपि विमुह्यति ॥ ५४ ॥
चकवा बोला—'जो जिस काममें चतुर हो उसको उस काममें नियत कर
देना चाहिये, क्योंकि जिसको कामका अनुभव नहीं है ऐसा बुद्धिमान् होता हुआ
भी (समयपर) गड़बड़ा जाता है ॥ ५४ ॥