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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 302 में से

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पृष्ठ 199

-५६] भेदी कौएका राजाके पास आना १७९
तदाहूयतां सारसः ।' तथानुष्ठिते सत्यागतं सारसमालोक्य
राजोवाच—'भोः सारस ! त्वं सत्वरं दुर्गमनुसंधेहि ।' सारसः
प्रणम्योवाच—'देव ! दुर्गे तावदिदमेव चिरात्सुनिरूपितमास्ते
महत्सरः । किंत्वत्र मध्यवर्तिद्वीपे द्रव्यसंग्रहः क्रियताम् ।
इसलिये सारसको बुलाओ ।' ऐसा करने पर सारसको आया देख राजा
बोला—'सारस ! तू शीघ्र गढ़को बना ।' सारसने प्रणाम करके कहा—'महाराज !
गढ़ तो बहुत कालसे देखाभाला यही बड़ा सरोवर ठीक है । परन्तु इस बीचके
द्वीपमें सामग्री इकट्ठी कर दी जावे;
यतः,—
धान्यानां संग्रहो राजन्नुत्तमः सर्वसंग्रहात् ।
निक्षिप्तं हि मुखे रत्नं न कुर्यात्प्राणधारणम् ॥ ५५ ॥
क्योंकि—हे राजा ! सब तरहके संग्रहसे अन्नका संग्रह श्रेष्ठ है, क्योंकि
मुखमें रक्खा हुआ रत्न अर्थात् धन प्राणोंकी रक्षा नहीं कर सकता है ॥ ५५ ॥
किंच,—
ख्यातः सर्वरसानां हि लवणो रस उत्तमः ।
गृहीतं च विना तेन व्यञ्जनं गोमयायते ॥ ५६ ॥
और—सब रसोंमें प्रसिद्ध नोन रस सचमुच उत्तम है कि जिसके विना
ग्रहण ( भक्षण ) भोजनका किया हुआ पदार्थ गोबर-सा (स्वादरहित) लगता
है ॥ ५६ ॥
राजाह—'सत्वरं गत्वा सर्वमनुतिष्ठ ।' पुनः प्रविश्य प्रतीहारो
ब्रूते—'देव ! सिंहलद्वीपादागतो मेघवर्णो नाम वायसः सपरिवारो
द्वारि तिष्ठति । देवपादं द्रष्टुमिच्छति ।' राजाह—'काकाः पुनः
सर्वज्ञा बहुद्रष्टारश्च । तद्भवति संग्राह्य इत्यनुवर्तते ।' चक्रो ब्रूते—
'देव ! अस्त्येवम् । किंतु काकः स्थलचरः । तेनास्मद्विपक्षे नियुक्तः
कथं संग्राह्यः ?
राजा बोला—'शीघ्र जा कर सब तयारी कर ।' फिर द्वारपाल आ कर बोला—
'महाराज ! सिंहलद्वीपसे आया हुआ मेघवर्ण नाम कौवा कुटुम्बसमेत द्वार पर
बैठा है । महाराजका दर्शन करना चाहता है ।' राजा बोला—'क्या कहना है !
काक तो सब जानने वाले और ऊँच नीच विचार कर काम करने वाले होते हैं ।
इसलिये उनको ( अपने पक्षमें ) रखना ऐसा ( ठीक ) जान पड़ता है ।' चक्रवा