हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-४९ ] नीति जानने वालोंकी प्रशंसा १७७
और दूसरे-किसीके वचनको न सहना यह सब सिद्धियोंका सचमुच मुख्य
विघ्न है, जैसे ठंडा जलभी क्या पहाड़को नहीं उखाड़ डालता है ? अर्थात्
पुरुषको ठंडे दिलसे दूसरेका वचन सुन लेना चाहिये, फिर योग्य हो सो करें,
इस तरह वह जरूर सिद्धि पा सकता है ॥ ४५ ॥
विशेषतश्च महाबलोऽसौ चित्रवर्णो राजा ।
और विशेष करके वह चित्रवर्ण राजा बड़ा बलवान् है ।
यतः,—
बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् ।
तद्युद्धं हस्तिना सार्धं नराणां मृत्युमावहेत् ॥ ४६ ॥
इसलिये-बलवान्के साथ लड़ना यह शूरताका चिह नहीं है, क्योंकि
मनुष्योंको हाथीके साथ लड़ना मृत्युको पहुँचाता है ॥ ४६ ॥
अन्यच्च,—
स मूर्खः कालमप्राप्य योऽपकर्तरि वर्तते ।
कलिर्बलवता सार्धं कीटपक्षोद्यमो यथा ॥ ४७ ॥
और जो अवसरके बिना पाये शत्रुसे भिड़ जाता है वह मूर्ख है, और
बलवान् के साथ कलह करना चेंटीके पक्ष निकलनेके समान है ॥ ४७ ॥
किंच,—
कौर्मं संकोचमास्थाय प्रहारमपि मर्षयेत् ।
प्राप्तकाले तु नीतिज्ञ उत्तिष्ठेत्क्रूरसर्पवत् ॥ ४८ ॥
और नीति जानने वाला कछुएके मुख सिकोड़नेके समान प्रहारको भी सहे
और अवसर मिलने पर क्रूर सर्पके समान उठ बैठे ॥ ४८ ॥
महत्यल्पेऽप्युपायज्ञः सममेव भवेत्क्षमः ।
समुन्मूलयितुं वृक्षांस्तृणानीव नदीरयः ॥ ४९ ॥
उपायका जानने वाला बड़े और छोटे शत्रुके नाश करनेमें समान समर्थ होता
है, जैसे नदीका वेग तृण और वृक्षोंको जड़से उखाड़नेको समर्थ होता है ॥४९॥
अतस्तद्दूतोऽप्याश्वास्य तावद्ध्रियतां यावद्दुर्गः सज्जीक्रियते ।
इसलिये उसके दूतको विश्वास दिला कर तब तक रुकवा लीजिये कि जब तक
गढ़ सज जाय;
हि० १२