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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 302 में से

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पृष्ठ 196

१७६ हितोपदेशः [ विग्रहः ४१-
अपरं च,—
सर्व एव जनः शूरो ह्यनासादितविग्रहः ।
अदृष्टपरसामर्थ्यः सदर्पः को भवेन्न हि ॥ ४१ ॥
और विग्रह(युद्ध)में गये विना सभी मनुष्य शूर हैं, क्योंकि शत्रु की सामर्थ्य को
नहीं जानने वाला ऐसा कौन है जो घमंडी न होय ? ॥ ४१ ॥
किंच,—
न तथोत्थाप्यते ग्रावा प्राणिभिर्दारुणा यथा ।
अल्पोपायान्महासिद्धिरेतन्मन्त्रफलं महत् ॥ ४२ ॥
और पत्थर की शिला जैसी कि काठके यंत्रसे उठाई जाती है ऐसी प्राणियोंसे
नहीं उठाई जाती है, इसलिये छोटे उपायसे बड़ा लाभ होना यह बड़े मंत्रका ही
फल है ॥ ४२ ॥
किंतु विग्रहमुपस्थितं विलोक्य व्यवह्रियताम् ।
परंतु विग्रहको उपस्थित देख कर उपाय कीजिये;
यतः,—
यथा कालकृतोद्योगात्कृषिः फलवती भवेत् ।
तद्वन्नीतिरियं देव ! चिरात्फलति रक्षणात् ॥ ४३ ॥
क्योंकि—जैसे ठीक समय पर उद्योग करनेसे (अर्थात् हल इत्यादि चलाने
तथा बीज बोनेसे ) खेती फलती है वैसेही हे राजा ! यह नीतिभी बहुत काल
तक रक्षा करनेसे फलती है ॥ ४३ ॥
अपरं च,—
महतो दूरभीरुत्वमासन्ने शूरता गुणः ।
विपत्तौ च महाँल्लोके धीरतामनुगच्छति ॥ ४४ ॥
और संसारमें बुद्धिमानोंको आपत्तिमें, दूरसे डर लगता है, पास आने पर अपनी
शूरताका गुण दिखाते हैं, और महात्मा पुरुष विपत्तिमें धीरज धरते हैं ॥ ४४ ॥
अन्यच्च,—
प्रत्यूहः सर्वसिद्धीनामुत्तापः प्रथमः किल ।
अतिशीतमप्यम्भः किं भिनत्ति न भूभृतः ? ॥ ४५ ॥