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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 302 में से

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पृष्ठ 195

-४० ] साम, दान, दण्ड और भेदका महत्त्व १७५
राजा विचार कर बोला—'मुझे भेदिया तो उत्तम मिल गया।' मंत्री बोला—
'तो युद्धमें विजयभी मिला।'
अत्रान्तरे प्रतीहारः प्रविश्य प्रणम्योवाच—'देव! जम्बु-
द्वीपादागतो द्वारि शुकस्तिष्ठति।' राजा चक्रवाकमालोकते।
चक्रवाकेणोक्तम्—'तावद्गत्वावासे तिष्ठतु पश्चादानीय द्रष्टव्यः।'
प्रतीहारस्तमावासस्थानं नीत्वा गतः। राजाह—'विग्रहस्तावत्स-
मुपस्थितः'। चक्रो ब्रूते—'देव! प्रागेव विग्रहो न विधिः।
इस बीचमें द्वारपालने प्रविष्ट हो कर प्रणाम कर कहा—'महाराज! जंबूद्वीपसे
आया हुआ तोता द्वार पर बैठा है।' राजाने चक्रवेकी ओर देखा। चकवेने
कहा—'पहले जा कर डेरेमें बैठे बाद मुझे ला कर दिखलाना।' द्वारपाल उसे
ले कर डेरेको गया; राजा कहने लगा—'लड़ाई तो आ पहुँची।' चकवा
बोला—'महाराज! पहलेसेही युद्ध योग्य नहीं है,
यतः,—
स किंभृत्यः स किंमन्त्री य आदावेव भूपतिम्।
युद्धोद्योगं स्वभूत्यागं निर्दिशत्यविचारितम्॥ ३८॥
क्योंकि—जो पहलेही राजाको बिना विचारे युद्धके उद्योगका और अपनी
भूमिके त्यागका उपदेश करता है वह निन्दित सेवक तथा निन्दित मंत्री है ३८
अपरं च,—
विजेतुं प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचन।
अनित्यो विजयो यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः॥ ३९॥
और दूसरे-दोनों युद्ध करने वालोंकी जीत निश्चय नहीं दीखती है इसलिये
कभी भी (पहलेही) युद्ध करनेका यत्न न करना चाहिये॥ ३९॥
अन्यच्च,—
साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्।
साधितुं प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचन॥ ४०॥
और प्रथमतः मीठे वचनसे, धन दे कर और तोड़ फोड़ करके इन तीनोंसे
एक साथ ही अथवा अलग अलग शत्रुओंको वश करनेके लिये यत्न करना
चाहिये पर युद्धसे कभी न करना चाहिये॥ ४०