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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 302 में से

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पृष्ठ 194

१७४ हितोपदेशः [ विग्रहः ३५-
और वह दूसरे विश्वासी पुरुषको साथ ले जाय, जिससे वह आप वहाँ
अपनेको ठहरा कर दूसरेको वहाँका मंत्रकार्य गुप्त लगा कर इसको समझा कर
बिदा करदे ।
तथा चोक्तम्,—
तीर्थाश्रमसुरस्थाने शास्त्रविज्ञानहेतुना ।
तपस्विव्यञ्जनोपेतैः स्वचरैः सह संवदेत् ॥ ३५ ॥
जैसा कहा है—तीर्थ, आश्रम और देवताके स्थानमें शास्त्रके ज्ञानके छलसे
तपस्वियोंके रूपको धारण किये हुए अपने भेदियोंके द्वारा राजाको शत्रुके
राज्यका भेद जानना चाहिये ॥ ३५ ॥
गूढचारश्च यो जले स्थले चरति । ततोऽसावेव बको नियुज्य-
ताम्। एतादृश एव कश्चिद्बको द्वितीयत्वेन प्रयातु । तद्गृहलोकाश्च
राजद्वारे तिष्ठन्तु, किंतु देव ! एतदपि सुगुप्तमनुष्ठातव्यम् ।
और गुप्त भेदिया वह है जो जलमें और थलमें जाता है; फिर इस बगुले-
कोही नियुक्त कीजिये । ऐसाही कोई दूसरा बगुला जाय । और उसके घरके
लोग राजद्वारमें रहें । परंतु हे महाराज ! यह कार्यभी अत्यन्त गुप्त करना
चाहिये ।
यतः,—
षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रस्तथा प्राप्तश्च वार्तया ।
इत्यात्मना द्वितीयेन मन्त्रः कार्यो महीभृता ॥ ३६ ॥
क्योंकि—छः कानमें गुप्त बात जानेसे तथा अन्यसे विदित हुई बात खुल
जाती है, इसलिये राजाको केवल एकहीसे अर्थात् अकेले मंत्रीसेही (एकांतमें)
विचार करना चाहिये ॥ ३६ ॥
पश्य,—
मन्त्रभेदेऽपि ये दोषा भवन्ति पृथिवीपतेः ।
न शक्यास्ते समाधातुमिति नीतिविदां मतम्' ॥ ३७ ॥
देखो,—हे राजन् ! मन्त्रका भेद खुल जाने पर जो बुराइयाँ होती हैं वे
सुधर नहीं सकती हैं यह नीति जानने वालोंका मत है' ॥ ३७ ॥
राजा विमृश्योवाच—‘प्राप्तस्तावन्मयोत्तमः प्रणिधिः ।' मन्त्री
ब्रूते—‘तदा संग्रामविजयोऽपि प्राप्तः ।’