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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

-८३ ] अनपेक्षित कार्य करनेका परिणाम १११
दमनको विहस्याह—'मित्र ! तूष्णीमास्यताम् । ज्ञातं मया भय-
कारणम् । बलीवर्द्दनर्दितं तत् । वृषभाश्चास्माकमपि भक्ष्याः । किं
पुनः सिंहस्य ? ।' करकटको ब्रूते—'यद्येवं तदा किं पुनः स्वामित्रा-
सस्तत्रैव किमिति नापनीतः ?' । दमनको ब्रूते—'यदि स्वामित्रा-
सस्तत्रैवमुच्यते तदा कथमयं महाप्रसादलाभः स्यात् ?
दमनक हंस कर बोला-'मित्र ! तुम चुप बैठे रहो, मैंने भयका कारण जान
लिया है । वह बैलका नाद था । और बैल तो हमाराभी भोजन है, फिर
सिंहका क्या कहना है ?' करटक बोला—'जो ऐसा ही है तो फिर स्वामीका
भय वहांही क्यों नहीं दूर कर दिया ?' दमनकने कहा—'जो स्वामीका भय वहां
ऐसे कह देता तो यह सुंदर वस्त्र आभूषणोंका लाभ कैसे होता ?
अपरं च,—
निरपेक्षो न कर्तव्यो भृत्यैः स्वामी कदाचन ।
निरपेक्षं प्रभुं कृत्वा भृत्यः स्याद्दधिकर्णवत्' ॥ ८३ ॥
और दूसरे—सेवकोंको चाहिये कि स्वामीको कभी निचला न बैठने दें,
अर्थात् कुछ न कुछ झगड़ा लगातेही रहें, क्योंकि सेवक स्वामीको अपेक्षारहित
करके दधिकर्ण बिलावके समान मारा जाता है' ॥ ८३ ॥
करटकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति—
करकट पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ?' दमनक कहने लगा।—
कथा ४
[ सिंह, चूहा और बिलावकी कहानी ४ ]
'अस्त्युत्तरापथेऽर्बुदशिखरनाम्नि पर्वते दुर्दान्तो नाम महा-
विक्रमः सिंहः । तस्य पर्वतकन्दरमधिशयानस्य केसराग्रं कश्चिन्मू-
षिकः प्रत्यहं छिनत्ति । ततः केसराग्रं लूनं दृष्ट्वा कुपितो विवरा-
न्तर्गतं मूषिकमलभमानोऽचिन्तयत्—
'उत्तर दिशाके मार्गमें अर्बुदशिखर नाम पर्वत पर दुर्दांत नाम एक बड़ा
पराक्रमी सिंह रहता था. उस पर्वतकी कंदरामें सोते हुये सिंहकी लटाके बालोंको
एक चूहा नित्य काट जाया करता था, तब लटाओंके छोरको कटा देख क्रोधसे
बिलके भीतर घुसे हुये चूहेको नहीं पा कर ( सिंह ) सोचने लगा,—