हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८१-
सिंह बोला—'हे शुभचिंतक ! मुझे बड़ी शंका दुःख दे रही है।' फिर दमनक
अपने जीमें कहने लगा—'जो यह न होता तो राज्यका सुख छोड़ कर दूसरे
स्थानमें जानेके लिये मुझसे क्यों कहते हो?' प्रकट बोला-'महाराज ! जब तक
मैं जीता हूं तब तक भय नहीं करना चाहिये, परन्तु करटक आदिकोभी भरोसा
दे दीजिये, क्योंकि विपत्तिके प्रतिकार ( उपाय)के समय पुरुषोंका इकट्ठा होना
दुर्लभ है।'
ततस्तौ दमनककरटकौ राज्ञा सर्वस्वेनापि पूजितौ भयप्रती-
कारं प्रतिज्ञाय चलितौ । करटको गच्छन् दमनकमाह—'सखे !
किं शक्यप्रतीकारो भयहेतुरशक्यप्रतीकारो वेति न ज्ञात्वा
भयोपशमं प्रतिज्ञाय कथमयं महाप्रसादो गृहीतः ? यतोऽनुप-
कुर्वाणो न कस्याप्युपायनं गृह्णीयाद्विशेषतो राज्ञः ।
तब राजाने तन, मन, और धनसे उन दोनोंका सत्कार किया और वे दोनों
दमनक, करटक भयके उपायकी प्रतिज्ञा करके चले । चलते चलते करटकने
दमनकसे कहा—'मित्र ! भयके कारणका उपाय होनेके योग्य है अथवा उपाय
न होनेके योग्य है यह बिनाही जाने भयके दूर करनेकी प्रतिज्ञा करके कैसे यह
महाप्रसाद ( वस्त्र, आभूषण इत्यादि ) लेलिया ? क्योंकि अनुपकारी ( बिना
उपाय किये किसी)की भी भेंट नहीं लेनी चाहिये और विशेष करके राजाकी ।'
पश्य,—
यस्य प्रसादे पद्मास्ते विजयश्च पराक्रमे ।
मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयो हि सः ॥ ८१ ॥
देखो—जिसकी प्रसन्नतामें लक्ष्मी रहती है, पराक्रममें जय रहता है, और
क्रोधमें मृत्यु रहती है, वह ( राजा ) सचमुच तेजस्वी होता है ॥ ८१ ॥
तथा हि,—
बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति' ॥ ८२ ॥
और बालक होने पर भी राजाका मनुष्य समझकर अपमान नहीं करना
चाहिये, क्योंकि यह मनुष्यके रूपसे स्वयं बड़ी देवता है' ॥ ८२ ॥