हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८४-
'क्षुद्रशत्रुर्भवेद्यस्तु विक्रमान्नैव लभ्यते ।
तमाहन्तुं पुरस्कार्यः सदृशस्तस्य सैनिकः' ॥ ८४ ॥
'जो छोटा शत्रु हो और पराक्रमसेभी न मिले तो उसको मारनेके लिये
उसके (चाल और बलसे) समान घातक उसके आगे कर देना चाहिये' ॥८४॥
इत्यालोच्य तेन ग्रामं गत्वा विश्वासं कृत्वा दधिकर्णनामा बिडा-
लो यत्नेनानीय मांसाहारं दत्त्वा स्वकन्दरे स्थापितः । अनन्तरं
तद्भयान्मूषिकोऽपि बिलान्न निःसरति । तेनासौ सिंहोऽक्षत-
केसरः सुखं स्वपिति । मूषिकशब्दं यदा यदा शृणोति तदा तदा
मांसाहारदानेन तं बिडालं संवर्धयति ।
यह विचार कर उसने गांवमें जा और भरोसा दे कर दधिकर्ण नाम बिलावको
यत्नसे ला मांसका आहार दे कर अपनी गुहामें रख लिया । पीछे उसके भयसे
चूहाभी बिलसे नहीं निकलने लगा—कि जिससे यह सिंह बालोंके नहीं कटनेके
कारण सुखसे सोने लगा । जब जब चूहेका शब्द सुनता था तब तब मांसके
आहारसे उस बिलावको तृप्त करता था ॥
अथैकदा स मूषिकः क्षुधापीडितो बहिः संचरन्बिडालेन
प्राप्तो व्यापादितश्च । अनन्तरं स सिंहोऽनेककालं यावन्मूषिकं न
पश्यति तत्कृतरावमपि न शृणोति तदा तस्यानुपयोगाद्विडाल-
स्याप्याहारदाने मन्दादरो बभूव । ततोऽसावाहारविहारविरहा-
दुर्बलो दधिकर्णोऽवसन्नो बभूव । अतोऽहं ब्रवीमि—“निरपेक्षी
न कर्तव्यः” इत्यादि' ॥ ततो दमनककरटकौ संजीवकसमीपं
गतौ । तत्र करटकस्तरुतले साटोपमुपविष्टः ।
फिर एक दिन भूखके मारे बाहर फिरते हुए उस चूहेको बिलावने पकड़ लिया
और मार डाला । पीछे उस सिंहने बहुत काल तक जब चूहेको न देखा और
उसका शब्दभी न सुना तब उसके उपयोगी न होनेसे बिलावके भोजन देनेमेंभी
कम आदर करने लगा । फिर, वह दधिकर्ण आहारविहारसे दुर्बल हो कर मर
गया । इसलिये मैं कहता हूं-“अपेक्षा रहित नहीं करना चाहिये” इत्यादि'.
इसके अनन्तर दमनक और करटक दोनों संजीवकके पास गये । वहां करटक
पेड़के नीचे बड़े अहंकारसे बैठ गया ।