हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-५५ ] सेवकका उचित कर्तव्य १०१
यतः,—
प्रस्तावसदृशं वाक्यं सद्भावसदृशं प्रियम् ।
आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः' ॥ ५१ ॥
क्योंकि—जो प्रसंगके समान वचनको, स्नेहके सदृश मित्रको और अपनी
सामर्थ्यके सदृश क्रोधको समझता है वह बुद्धिमान् है' ॥ ५१ ॥
करटको ब्रूते—'सखे ! त्वं सेवानभिज्ञः ।
करटक बोला—'मित्र ! तुम सेवा करना नहीं जानते हो ।
पश्य,—
अनाहूतो विशेद्यस्तु अपृष्टो बहु भाषते ।
आत्मानं मन्यते प्रीतं भूपालस्य स दुर्मतिः' ॥ ५२ ॥
देखो—जो मनुष्य विना बुलाये घुसे, और विना पूछे बहुत बोलता है, और
अपनेको राजाका प्रिय मित्र समझता है वह मूर्ख है' ॥ ५२ ॥
दमनको ब्रूते—'भद्र ! कथमहं सेवानभिज्ञः ?
दमनक बोला—'भाई ! मैं सेवा करना क्यों नहीं जानता हूं ?
पश्य,—
किमप्यस्ति स्वभावेन सुन्दरं वाप्यसुन्दरम्।
यदेव रोचते यस्मै भवेत्तत्तस्य सुन्दरम् ॥ ५३ ॥
देखो—कोई वस्तु स्वभावसे अच्छी और बुरी होती है, जो जिसको रुचती
है वही उसको सुन्दर लगती है ॥ ५३ ॥
यतः,—
यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम् ।
अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ५४ ॥
क्योंकि-बुद्धिमान्को चाहिये कि जिस मनुष्यका जैसा मनोरथ होय उसी
अभिप्रायको ध्यानमें रख कर एवं उस पुरुषके पेटमें घुस कर उसे अपने वशमें
कर ले ॥ ५४ ॥
अन्यच्च,—
कोऽत्रेत्यहमिति ब्रूयात्सम्यगादेशयेति च ।
आज्ञामवितथां कुर्याद्यथाशक्ति महीपतेः ॥ ५५ ॥