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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 302 में से

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पृष्ठ 120

१०० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४८-
यात्यधोऽधो व्रजत्युच्चैर्नरः स्वैरेव कर्मभिः ।
कूपस्य खनिता यद्वत्प्राकारस्येव कारकः ॥ ४८ ॥
मनुष्य अपनेही कर्मोंसे कुएके खोदने वालेके समान नीचे और राजभवनके
बनाने वालेके समान ऊपर जाता है; अर्थात् मनुष्य अपना उच्च (अच्छे) कर्मोंसे
उन्नतिको और हीन (खराब) कर्मोंसे अवनतिको पाता है ॥ ४८ ॥
तद्भद्रम् । स्वयत्नायत्तो ह्यात्मा सर्वस्य ।' करटको ब्रूते—'अथ
भवान्किं ब्रवीति ?' । स आह—'अयं तावत्स्वामी पिङ्गलकः
कुतोऽपि कारणात्सचकितः परिवृत्योपविष्टः ।' करटको ब्रूते—
'किं तत्त्वं जानासि ?' । दमनको ब्रूते—'किमत्राविदितमस्ति ?
इसलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपनेही यत्नके आधीन रहती है।'
करटक बोला-'तुम अब क्या कहते हो?' वह बोला-'यह स्वामी पिंगलक किसी
न किसी कारणसे घबराया-सा लौट करके आ बैठा है।' करटकने कहा-'क्या
तुम इसका भेद जानते हो?' दमनक बोला-'इसमें नहीं जाननेकी क्या बात है ?
उक्तं च,—
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते
हयाश्च नागाश्च वहन्ति देशिताः ।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४९ ॥
और कहा है—जताए हुए अभिप्रायको पशुभी समझ लेता है और हांके हुए
घोड़े और हाथीभी बोझा ढोते हैं। पण्डित कहे बिनाही मनकी बात तर्कसे जान
लेता है; क्योंकि पराये चित्तका भेद जान लेनाही बुद्धियोंका फल है ॥ ४९ ॥
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारेण लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ५० ॥
आकारसे, हृदयके भावसे, चालसे, कामसे, बोलनेसे और नेत्र और मुंहके
विकारसे, औरोंके मनकी बात जान ली जाती है ॥ ५० ॥
अत्र भयप्रस्तावे प्रज्ञाबलेनाहमेनं स्वामिनमात्मीयं करिष्यामि ।
इस भयके सुझावमें बुद्धिके बलसे मैं इस स्वामीको अपना कर लूंगा ॥