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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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१०२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ५६-
और दूसरे-यहां कौन है ? मैं हूं; कृपा कर आज्ञा कीजिये, ऐसा कहना
चाहिये और जहां तक हो सके राजाकी आज्ञाको सफल करनी चाहिये ॥ ५५ ॥
अपरं च,-
अल्पेच्छुधृतिमान् प्राज्ञश्छायेवानुगतः सदा ।
आदिष्टो न विकल्पेत स राजवसतो वसेत्' ॥ ५६ ॥
और थोड़ा चाहने वाला, धैर्यवान्, पण्डित तथा सदा छायाके समान पीछे
चलने वाला और जो आज्ञा पाने पर सोच विचार न करे, अर्थात् यथार्थरूपसे
आज्ञाका पालन करे ऐसा मनुष्य राजाके घरमें रहना चाहिये' ॥ ५६ ॥
करटको ब्रूते—'कदाचित्त्वामनवसरप्रवेशादवमन्यते स्वामी' !
स आह—'अस्त्वेवम् । तथाप्यनुजीविना स्वामिसान्निध्यमवश्यं
करणीयम् ।
करटक बोला-‘जो कभी कुसमय पर घुस जानेसे स्वामी तुम्हारा अनादर
करे' ॥ वह बोला-‘ऐसा हो तो भी सेवकको स्वामीके पास अवश्य जाना
चाहिये ।
यतः,—
दोषभीतेरनारम्भस्तत्कापुरुषलक्षणम् ।
कैरजीर्णभयाद्भ्रातर्भोजनं परिहीयते ? ॥ ५७ ॥
क्योंकि—दोषके डरसे किसी कामका आरंभ न करना यह कायर पुरुषका
चिन्ह है; हे भाई ! अजीर्णके डरसे कौन भोजनको छोड़ते हैं ? ॥ ५७ ॥
पश्य,—
आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं
विद्याविहीनमकुलीनमसंगतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च
यः पार्श्वतो वसति तं परिवेष्टयन्ति' ॥ ५८ ॥
देखो-पास रहने वाला कैसाही विद्याहीन, कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य
क्यों न हो राजा उसीसे हित करने लगता है, क्योंकि राजा, स्त्री और बेल ये
बहुधा जो अपने पास रहता है, उसीका आश्रय कर लेते हैं' ॥ ५८ ॥