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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 302 में से

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पृष्ठ 110

९० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः २०-
तिष्ठते ?' । करटको ब्रूते-'मित्र दमनक ! अस्मन्मतेनास्य सेवैव
न क्रियते । यदि तथा भवति तर्हि किमनेन स्वामिचेष्टानिरूपणे-
नास्माकम् ? यतोऽनेन राज्ञा विनाऽपराधेन चिरमवधीरिताभ्या-
मावाभ्यां महद्दुःखमनुभूतम् ।
और वह एक दिन प्याससे व्याकुल होकर पानी पीनेके लिये यमुनाके किनारे
पर गया । और वहां उस सिंहने नवीन कृन्ततुकालके मेघकी गर्जनाके समान
संजीवकका डकराना सुना । यह सुन कर पानीके बिना पिये वह घबराया-सा
लौट कर अपने स्थान पर आ कर 'यह क्या है ?' यह सोचता हुआ चुपसा
बैठ गया । और उसके मंत्रीके बेटे दमनक और करटक दो गीदड़ोंने उसे वैसा
बैठा देखा । उसको इस दशामें देख कर दमनकने करटकसे कहा-'भाई करटक !
यह क्या बात है कि, प्यासा स्वामी पानीको बिना पिये डरसे धीरे धीरे आ
बैठा है ?' करटक बोला-'भाई दमनक ! हमारी समझसे तो इसकी सेवाही नहीं
की जाती है । जो ऐसे बैठा भी है तो हमें स्वामीकी चेष्टाका निर्णय करनेसे
क्या प्रयोजन है ? क्योंकि इस राजासे बिना अपराध बहुत काल तक तिरस्कार
किये गये हम दोनोंने बड़ा दुःख सहा है ॥
सेवया धनमिच्छद्भिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् ।
स्वातन्त्र्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम् ॥ २० ॥
सेवासे धनको चाहने वाले सेवकोंने जो किया सो देख कि शरीरकी स्वतंत्र-
ताभी मूर्खोंने हार दी है ॥ २० ॥
अपरं च,—
शीतवातातपक्लेशान्सहन्ते यान्पराश्रिताः ।
तदंशेनापि मेधावी तपस्तप्त्वा सुखी भवेत् ॥ २१ ॥
और दूसरे—जो पराधीन हो कर जाड़ा, हवा और धूपमें दुःखोंको सहते
हैं उस दुःखके छोटेसे छोटे भागसे तप ( खलही दुःख सहन ) करके बुद्धिमान्
सुखी हो सकता है ॥ २१ ॥
अन्यच्च,—
एतावज्जन्मसाफल्यं यदनायत्तवृत्तिता ।
ये पराधीनतां यातास्ते वै जीवन्ति के मृताः ॥ २२ ॥